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Showing posts from April, 2018
आये दिन के धरने-प्रदर्शनों से लोकतंत्र की नींव ही झूठ के सहारे डली हुई जैसे लगने लगती है ? हक अधिकारों के लिए हर जात धर्म के झंडे तले सरकारी सहित अवाम की निजी सम्पतियों को नुकसान पहुंचाया जाना तो संविधान की किसी धारा-लाइन में लिखा नहीं ?फिर भी आधुनिक जमाने के माने जाने वाले पढ़े लिखे भी प्राचीन जमाने के लोगों से भी बदतर दिखते हैं।  सम्पूर्ण भारत देश के कोने-कोने का इतिहास टटोल लेने पर भी देश के योगदान में सवर्णों का योगदान ही उभरकर आता है,इस बात को अनदेखा करते हुए स्वयं को कोई ऊंचा अच्छा दिखाना चाहे तो वो मुमकिन नहीं लगता। ऐसे में जात धर्म के झंडे तले एकजुटता से जबरन कोई किस्सा कहानी लिखने का हठ बर्बादी के रस्ते ही बनाता रहेगा।  राजनेताओं और जातीय नेताओं के शिकंजे में फंसे लोग पहले से ज्यादा अब पीड़ित होने लगे हैं,लेकिन खुद की मां को डाकन कोई बताना नहीं चाहता और बुराई छिपाने के लिए नए हथकंडे अपनाकर अधिकतरों की परेशानी का सबब बनना आम बात हो चुकी लोकतंत्र में।  ज्यादा बड़ी बात नहीं अगर थोड़ा सा भी मगज पर जोर डालें तो ये ही लगेगा की राजीनामे से मिले हक अधिकारों में भी स...