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Showing posts from October, 2016

एनकाउंटर पर बवाल मचता है, लेकिन अवाम की सुख शान्ति की शायद कोई चिंता नहीं लगती।

एनकाउंटर पर बवाल मचता है, लेकिन अपराधी-भगोड़े को देखते मार देना न्यायोचित ही लगता है। वैसे भी अदालतों में मुकदमों के अम्बार लगे हैं,एक आरोप पर फैसला हो नहीं पाता उससे पहले ही दस आरोपी और बढ़ जाते हैं। ऐसा ही चलता रहना अवाम की सुख शान्ति को लीलता रहता पर किसी को शायद कोई चिंता नहीं लगती। देश में कानून व्यवस्था बनाये रखने की खातिर ही बनाये गए हैं, लेकिन जब इनका ही कोई मजाक उड़ाए और तोड़े तो ये राजद्रोह समान हो जाता है। आरोपी या अपराधियों के कानून तोड़ने से बनी स्तिथियां में उनको तत्काल दंड दिया जाना ही सर्वश्रेष्ठ है,ताकि भविष्य में कोई भी कानून तोड़ने से डरे। भगोड़े का अंत होने से अच्छा कुछ हो नहीं सकता क्योंकि ये भगोड़े देश को बहुत नुक्सान देते रहे हैं। एनकाउंटर पर विवाद होते हैं और मृतक को पीड़ित साबित करने के प्रयास, ये सब मेरे हिंदुस्तान में पक्ष-विपक्ष का पुराना राग-बिमारी है जिसका भी समुचित उपचार होना चाहिए। वर्तमान दौर कुछ ऐसा हो चला है की कोई भी स्वार्थ पूर्ति के लिए अपने कदम आगे पीछे करेगा और ये तो जेल से भागने और सुरक्षाकर्मी की हत्या करने का जघन्य अपराध है ,ऐसे में ...
रामजी भला मानो रामलीला वालों का जो अभी तलक भी तुमको गृह प्रवेश करवा रहे हैं।  वैसे हम भी प्रायोजित कार्यक्रमों में तुम्हारे जयकारे लगाने में पीछे नहीं रहते हैं।  तुम इंसानी फितरत बस्तियों को गौर से देख लो तो माथा दुखने लग जाएगा। दीपावली-दशहरा तुम्हारे कारण मनाते हैं, फिर भी दूसरों का गुणगान कर जाते हैं। तुम को तो नींव के अंदर छुपा कर मतलबपरस्ती की इमारतें बड़े ही शातिराना अंदाज में खड़ी करते जाते हैं।  दशहरा पर राम नाम जपकर अगले दिन ही तुम्हे भूल अपना घर चमकाने में लग जाते हैं। तुम किस रस्ते से आ रहे हो कब तक आओगे उसकी चिंता छोड़कर बाजारों में घूमने पहुंच जाते हैं। व्यापारी भी तुम्हारी घर वापसी के मौके को भुनाने के लिए नई नई स्कीमें बाजारों में सजावट करके लाते हैं। तुम को भूल हम तो धन धन पाने की खातिर लक्ष्मी मैया की शरण में पहुंच जाते हैं। तुम आओगे तो रहोगे कहां इसका इंतजाम किये बिना अपना पेट भरने का खूब जुगाड़ जोरों से चलाते जाते हैं। अभी तक तो कहीं तुम्हारे रहने का आजीवन पट्टा जारी होता नजर आता नहीं है और तुम्हारी मर्यादा के कारण किरायानामा बनता भी नहीं लगता है। झूठ का सह...
रामराज की आस अर्थयुग में तुम्हारे अघोषित वनवास से अधूरी ? रामचन्द्रजी जय हो, कथाओं-इतिहास के अनुसार तुमने राक्षस राज का अंत कर ही दिया। अब वनवास के बाद घर वापसी की तैयारी भी जोरों से बाजारों में हो रही है, फिर भी प्रभु तुम रहोगे कहां ये समस्या पहले जितनी आज भी भारी है।  रामजी तुम्हें ही जब इतनी परेशानी है तो तुम्हारी प्रजा की कैसे-कहां सुनवाई होनी है।  तुम जंगल-जंगल राक्षसों का अंत करने में बिजी रहे तो राक्षस ने इंसानी बस्ती में ठिये बना लिए।  अब लौटोगे तो फिर से राक्षस राज का अंत करने का अनलिमिटेड युद्ध लड़ना पड़ेगा ? युद्ध लड़ने के लिए कोई ठौर-ठिकाना भी चाहिए पर तुम तो खुद घर-बदर हो तो कैसे क्या होगा ये चिंता अच्छाई की चिता सजाये जा रही है। प्रभु तुम हर साल सत्य की जीत का जश्न मनवाकर किधर अंतर्ध्यान हो जाते हो, असल समस्या क्यों नहीं बतलाते हो। तुम्हारे जाने के बाद से तो देश की कानून व्यवस्था बदल गई है ,अब लौटोगे तो तुम कहीं कानूनी दांवपेंचों में ही कहीं उलझ ना जाओ ये डर भी सताए है। वीजा,मूलनिवास, नागरिकता, आधार , वोटिंग कार्ड जैसी फॉर्मल्टीजीज (औपचारिकताओं) में तुम उलझकर...
इतिहास पुनर्लेखन का दौर-शोर भाजपा सरकार बनने के बाद से जोरों पर है?  जो कुछ अभी तक पढ़ा-लिखा उसमें से कुछ झूठा मानकर हटा दिया तो कुछ ना सुना-पढ़ा उसे सच मानते हुए पाठ्यक्रमों का हिस्सा बना डाला।  इतिहास लिखने का ये सिलसिला ऐसा लगता है की आने वाले समय में जिसकी होगी सरकार वो चलाएगा अपना पाठ्यक्रम ? सत्ता परिवर्तन के साथ होता रहेगा पन्नों में नाम परिवर्तन ? क्या सच है क्या झूठ उसको छोड़कर अभी तलक लगाए रट्टों को इतिहास का पुनर्लेखन करने वाले भुलाने की हलचल में लगे हैं।  ना जाने इतिहास में ऐसा क्या हुआ जो किताबें पढ़ते पढ़ते ये सवाल भी खड़े करता है की जो जान रहे हैं ,उसके पीछे के पन्ने तो लिखे ही नहीं गए और कहीं लिख दिए तो इस तरह से की वो पन्ना दबा दबा सा लगता है।  कुछ सवाल तो सदा जेहन में आते रहते हैं पर उनका जवाब कोई पाठ्यक्रम में नहीं मिलता और लोकतंत्र में सरकारी ठप्पा लगे बिना कोई बात सच्ची नहीं ? शिक्षा के पाठ्यक्रमों में निष्पक्षता से इतिहास का समावेश होता तो शायद वर्तमान में गड़े मुर्दे का पुनः पोस्टमार्टम करके एफआर लगाने की नौबत ना आती ? हिन्दुस्तान का इतिहास राजस्थान ...
भाजपा के धुरंधर मंथन कर रहे हैं ,आयाराम के सहारे जीत के धागे बन रहे हैं ?रीता को शामिल कर लेंगे फिर भी वरुण गांधी गले की फांस बने हैं ? लेकिन वरुण गांधी की मौन महत्वाकांक्षा यूपी चुनाव तलक उनको अनचाहे नफा-नुकसान के चिंतन में डुबोये रखने को आतुर लगती है।  वरुण गांधी को आगे बढ़ाने से दिग्गज डरे डरे से लगते हैं , क्योंकि वो एक और मोदी जैसा नेता शायद अब नहीं चाहते हैं।  अटल-आडवाणी के राज में भी मोदी का पदार्पण हुआ उसने जो गुल खिलाया उससे जमे जमाए नेता को हाशिये पर डाला ? कुछ ऐसी ही आशंका भाजपा सहित अन्य दलों के नेताओं को वरुण गांधी के आगे बढ़ने से होती लगती ? वैसे तो कई राज्यों में चुनाव होंगे,पर यूपी की सत्ता पाना भाजपा की प्राथमिकता में तो राजनाथ का हाथ किस तरफ बढ़ता है ये कोई ना जाने ? योगी, साध्वी ,दलित, ब्राह्मण, राजपूत,पिछड़ा का वोट बैंक दिखाकर हर कोई खुद को सीएम दावेदार बनाने में जुटा तो दुःसाहस, तेजतर्रार दिमाग के खेल से वरुण गांधी ने सबको चिंता में डाल रखा। भाजपाई कांग्रेस मुक्त वातावरण का सपना देख रहे और यूपी में ये केवल वरुण गांधी के सहयोग के बिन कहीं अधूरा ना रह जाए ,ये भ...
जानें जोखिम में डाल देने वाली करतूतों के हस्ताक्षर-उदघाटन कर्ताओं के खिलाफ कम से कम ३०७ और राजकोष को नुकसान, घोटाला हेराफेरी ठगी सहित तमाम अराजक अपराधों की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज क्यों नहीं होता और तत्काल गिरफ्तारियां क्यों नहीं होती ? सड़कें-पुलिया टूटती-धंसती हैं,फिर ज्यादा हल्ला मच जाए तो कम्पनी को ब्लेक लिस्टेड कर देंगे। अगर पूर्ववर्ती सरकार का काम हुआ घटिया तो जांच आयोग बैठा देंगे।  ऐसे मामलों में किसी दोषी की बर्बादी हुई हो ऐसा सुनने में आया नहीं, चाहे सरकारी खजाने की  कितनी ही लूट कमीशनखोरों ने कर ली हो। बरसात का दौर जारी है और देश के कई शहरों में कभी सड़क धँसी तो कभी पुलिया टूटने के घटनाक्रम हो रहे हैं। फिर भी सरकारी मुखियाओं की आंखें हकीकत नहीं देख पा रही ? बार बार सरकारी पैसे की बर्बादी होने के कारण-कारकों से वसूली करने का विधान नहीं होने-बनाने की वजह से लोगों की जानें भी संकट में पड़ सकती है। इन सड़ कों पुलियाओं को बनाने वालों की जगह अगर कोई वाहन या आम इंसान ऐसी गलतियां करता तो कब का उसके खिलाफ दण्ड विधान की तमाम धाराओं का इस्तेमाल हो चुका होता। सड़कों-पुलियाओं से हर...
ओलम्पिक गया तो रात गई बात गई जैसी ही उसकी चमक और हमारी तैयारी अनदेखी हो गई। ऐसे हालातों में अगले  ओलम्पिक का करो इन्तजार और उसमें कैसा रहे प्रदर्शन उसका ना करेगा कोई ख्याल,बस है तोबा मचाने का होता रहे आयोजन के वक्त धमाल? ओलम्पिक में अभी तलक पदक नहीं मिला, ये जुमला-यादें हर ओलम्पिक के वक्त दोहराई जाती है।  खेलों-खिलाडियों के प्रति हमारी भावनाएं रात बीती बात बीती से भी गई गुजरी सी लगती है।  विदेशी खिलाडी से हमारे खिलाड़ियों की तुलना करके हम उम्मीदें तो बड़ी-बड़ी बांधते हैं पर धरातल पर खिलाड़ियों को प्रोत्साहन कितना देते हैं ये चर्चा करना ही नहीं चाहते हैं ? हमारे खिलाड़ियों की उम्र से आधे उम्र का विदेशी खिलाड़ी पदकों के ढेर लगाता है तो केवल मात्र खिलाड़ी की कमी तो हम देख लेते हैं,पर उस विदेशी और हमारे  बीच की आधारभूत सुविधाओं का आंकलन निष्पक्ष तरीके से हम करते ही नहीं। हमारे ओलम्पिक में पिछड़ने का सबसे बड़ा कारण हमारे खिलाडियों में भविष्य को लेकर व्याप्त असुरक्षा है। खिलाड़ी अपने जीवनयापन की दौड़ में ऐसा उलझता है की वो अपना अधिकतर बल उसी की चिंता में खत्म कर देता है। इसी असुरक...
देश का भविष्य युवाओं के हाथों में सुरक्षित है, ये कहने-सुनने में बड़ा अच्छा लगता है ,वहीं जब इन्हीं युवाओं को खुद के भविष्य के प्रति असुरक्षित देखकर सब ख़्वाब डरावने से लगते हैं। देश में युवाओं को जोशीला,बुद्धिमान,प्रगति का कारक सहित तमाम विकास के लिए सहायक उपमाओं से नवाजा जाता है फिर भी युवा वर्ग आक्रोशित होते हुए दिग्भर्मित ज्यादा नजर आता है। किसी भी सिस्टम की रीढ़ युवा ही होता है, लेकिन ये युवा वर्तमान में टूटा टूटा सा लगता है। सरकारी सहित हमारे जीवन में व्याप्त तमाम सिस्टमों में युवाओं को वरीयताएं देने की बातें होते रहने के बावजूद युवाओं का बार बार विरोधी रवैया अख्तियार करना युवा वर्ग के असंतोष को उजागर-जाहिर करता रहता है।  युवाओं के अनवरत प्रतिरोध के रास्ते पर चलने की वजहें या तो हम दूर ही नहीं करना चाहते या डरते हैं की युवाओं को उनका मुकाम मिल गया तो बाकी वर्गों को अपने स्थान से हाथ धोना पड़ेगा ?  सामाजिक परिवेश----प्राचीन काल से युवा अपने मन में अपने अधिकार-हक प्राप्ति के लिए संघर्ष करते हुए वर्तमान में पहुंचा और ये बात उसको कुंठा की राह पर चलने का कारण बनती गई। महाभारत का...
चीन ने हमारी तरफ आने वाला पानी रोक लिया पर हमारी सरकार उस तरफ से आने वाला माल नहीं रुकवाती ? सरकारी बंदोबस्त नाकाफी हो जाएं अवाम गुस्साते हुए चीन का सामान हाथ-काम में ना लेने की जगी अलख में तो साथ दे।  यकीन मानो इस तरफ चायना का माल नहीं बिकने के समाचार उड़ने लगे तो दूजी तरफ चीन ने हमारा रोका पानी फटाक से छोड़ा।  बड़े बुजुर्गों ने कहा भी है जब शान्ति-बातचीत से सुलह ना हो तो हुड़दंग सहित तमाम घरेलू नुस्खों को अपनाकर दुश्मन को तड़पाओ।  मानते हैं की चीन के माल का बहिष्कार का कहना बहु त आसान पर अमल में लाना कठिन लगता है। असल बात तो ये है की हमने कभी इस पर अमल करने के बारे में असल में जोर दिया नहीं बस रात गई बात गई जैसे ही स्वीकार किया। ज्यादा कुछ नहीं कहना पर जो कहते हैं की चीन से सस्ता माल माल तो बाजार में लाओ,उनके लिए घरेलू नुस्खा है ,अगर वो अपनाते हैं तो सस्ता तो क्या पर्यावरण से लेकर सेहत के लिए भी बड़ा अच्छा रहेगा। किसी भी काम के असल मजे आएं,उसके लिए शरीर को थोड़ा कष्ट शुरुआत में देना पड़ेगा पर उसके बाद के वक्त में बड़ा आराम भी मिलता है। चीन के दिए-लाइट,रोशनी-पटाखे इत्यादि की तरफ...
खुद को जबरन सलाम ठुकवाने की आदतों का त्याग करोगे और सामने वाले को जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाओगे तो ही जनता का भला होगा।  मीटिंगों, अभियानों, आदेश-निर्देशों के अम्बार लगाकर जनता का भला करने का दावा चंद पल भी अटूट नहीं रह पा रहा।  तेज रफ़्तार से किये जा रहे दौरों ने आमजन की जीवन की अति आवश्यकता शिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था को अव्यवस्था में बदलते हुए तोड़ सा दिया।  चिकित्सा से जुड़े सिस्टम को अभियानों, हड़तालों में धकेल दिया।  चिकित्साकर्मियों और मरीजों का व्यवहार एक दूसरे के प्रति खिन् नता उतपन्न करने सा होने के बावजूद सुधार का जमीनी स्तर पर प्रयास नहीं करते। उपचार से संतुष्ट नहीं होने वाला आरोपों की बौछार करता है तो उसकी बात को नकारता रहता है प्रशासन। जनता को राहत देने के लिए रात्रि चौपाल, प्रशासन आपके संग, सरकार आपके द्वार सहित ना जाने कितने तामझाम किये जाते हैं पर नतीजा ढाक के तीन पात से आगे नहीं बढ़ पाते। इंसान स्वस्थ-शिक्षित रहे तो बाकी के सारे दोष दूर करने में स्वयं ही सक्षम हो सकता है पर ऐसी सकारात्मक पहल करने से पैसा नहीं कमाया जा सकता। जब अर्थ युग में पैसे की माया हो तो...