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Showing posts from 2017

#पदमावती के बारे में वे क्या जाने जो धूप-छाया से समय जानना भूल गए

# पदमावती  फिल्म से उपजा विवाद अतीत की अच्छाइयों को भूला देने का नतीजा है। धर्म-कर्म से बड़ी कोई शक्ति नहीं ये सीख मेवाड़ के घर-घर में आज भी दी जाती है। ऐसे में हकीकत को नकार किसी के वजूद को हिलाने का गुस्सा जौहर स्थल सहित चारों तरफ दिखा है।  शासक कोई भी हो वो अपने निशान छोड़ता है और ऐसे इंतजाम करता रहा की आने वक्त में भी उसका वजूद रहा ये लोग जाने। सब तरफ से निराशा हावी होने पर चिकित्कीय उपचार लेते हुए देव*देवियों,पितर थान,स्थानों पर पीड़ित कोई राहत पाने के लिए नतमस्तक हुआ दिखता,फि र भी कुछ आधुनिक बातों वाले ऐसा कुछ नहीं को ढोंग रचते हैं। कोई भी एक नजर नहीं आता जो टीका टोपी से दूर रहता होगा फिर भी अतीत में कोई शक्ति रही उसको कबूलता नहीं। मेवाड़ की धरा पर अभी भी ऐसे निशान मिल जाएंगे जिनके शोध हो जाएँ तो इतिहास को विकृत करने वालों के कालिख पुत जाए। आज इतिहास पुनरावकलोकन की दौड़ है और वोटों की चाहत में फायदा कौनसा पन्ना पुराना लिखा देगा ये होड़ है। लोग सवाल करते हैं की पदमावती थी भी क्या पर ऐसे लोग स्वयं में झांककर ये बताना नहीं चाहेंगे की उन्होंने अंतिम बार धूप-छाया से समय का अंदा...

खुद को जबरन सलाम ठुकवाने की आदतों का त्याग करोगे तो ही जनता का भला होगा

खुद को जबरन सलाम ठुकवाने की आदतों का त्याग करोगे और सामने वाले को जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाओगे तो ही जनता का भला होगा।  मीटिंगों, अभियानों, आदेश-निर्देशों के अम्बार लगाकर जनता का भला करने का दावा चंद पल भी अटूट नहीं रह पा रहा।  तेज रफ़्तार से किये जा रहे दौरों ने आमजन की जीवन की अति आवश्यकता शिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था को अव्यवस्था में बदलते हुए तोड़ सा दिया।  चिकित्सा से जुड़े सिस्टम को अभियानों, हड़तालों में धकेल दिया।  चिकित्साकर्मियों और मरीजों का व्यवहार एक दूसरे के प्रति खिन् नता उतपन्न करने सा होने के बावजूद सुधार का जमीनी स्तर पर प्रयास नहीं करते। उपचार से संतुष्ट नहीं होने वाला आरोपों की बौछार करता है तो उसकी बात को नकारता रहता है प्रशासन। जनता को राहत देने के लिए रात्रि चौपाल, प्रशासन आपके संग, सरकार आपके द्वार सहित ना जाने कितने तामझाम किये जाते हैं पर नतीजा ढाक के तीन पात से आगे नहीं बढ़ पाते। इंसान स्वस्थ-शिक्षित रहे तो बाकी के सारे दोष दूर करने में स्वयं ही सक्षम हो सकता है पर ऐसी सकारात्मक पहल करने से पैसा नहीं कमाया जा सकता। जब अर्थ युग में पैसे की माया हो तो...

#दंड बिन कोई प्रावधान सुरक्षित नहीं ?

# दंड  बिन कोई प्रावधान सुरक्षित नहीं ? वैसे भी आजकल कोई राजा हरिशचन्द्र या भरत बनना नहीं चाहता। देश में परिवर्तन की मांग और व्यवस्थाओं में व्याप्त खामियों में सुधार ना चाहने वाले सारी हदें पार कर चुके हैं, फिर भी अपना-पराया की मोह माया में हमारे हुक्मरान-सिरमौर उलझे पड़े हैं।  घर-मोहल्ले से लेकर सरकारी मामलों में घिरे लोग अदालतों में घनचककर बने घूमते दिखते हैं, लेकिन ये दिलासा देने वाला कोई नहीं मिलता की मुकदमे का अंत कब होगा। कोई भी मामला-बात हो उसमें पक्ष-विपक्ष होता है और ज् यादा ही काढ़ खोज हो तो मध्यस्थ भी साथ होता है। जब किसी मामले में पक्ष-विपक्ष होते हैं तो यकीनन दोषी भी इनमें से कोई होता ही होगा। अब किसी मामले में कोई आरोपी बाइज्जत-सशर्त बरी किया जाता है तो उस मामले में दोषी कौन ये तय करने की भूल बार बार कैसे होती है,ये उलझन आज तलक सरकारी स्तर पर नहीं सुलझी लगती है? कब कैसे कहां क्यों किसने किया की चटखारे भरी बातें भले ही कागजों को भरने का काम करती होंगी पर किसी व्यवस्था से लाभ पीड़ितों को मिलेगा ये सुनिश्चित नहीं होता लगता है। किसी भी मामले का इंद्राज करते ही सुनिश्चि...

ऑनलाइन खरीददारी बंद करवा दीजिये और बाजारों में खरीददार बढ़वा दीजिये

ऑनलाइन खरीददारी बंद करवा दीजिये और बाजारों में खरीददार बढ़वा दीजिये। ये जीएसटी का असर जैसा रोना धोना छोड़कर कोई तो हकीकत क़बूलिये।  बचत को ऑनलाइन कंपनियां लील गई तो खरीददारी करने कैसे पहुंचेगा कोई बाजारों में। अधिकतर का हाल इससे ही पता चलता है की गुंजाइश नहीं होते हुए भी दस बीस हजार का मोबाइल रखना आम बात। खर्चे आमदनी से ज्यादा करके बैंकों-कंपनियों के कर्जदार बन चुके हैं बाजार के उपभोक्ता फिर भी इस कड़वे सच को दरकिनार कर सरकारी निति को कोसना हमने नहीं छोड़ा है।  देश-विदेश में अर्थश ास्त्री बड़े बड़े होंगे पर सर्वे और कागजों के दम पर चलते-चलाते रहने का उनका हुनर वास्तविकता सामने आने नहीं देता और सब मिलकर झूठ को बढ़ाते हुए अधिक दारुण परिस्थितियों का निर्माण करने कराने के सहभागी बनते हैं। किसी भी बात तथ्य में विरोधाभास का कोई स्थान नहीं होता, जहां विरोधाभास होने लगता है वहां सच झूठ से छिपता नजर आता है। कुछ बातें हैं अगर उनको सही माने तो मंदी कहीं नहीं हे,वरन हमारी जेब ही ठंडी पाई जा रही है। जन्म-मृत्यु ,खानपान,रहनसहन,आवाजाही सहित तमाम सुविधाएं ऑनलाइन उपलब्ध हैं और जिसकी जितनी गुंजाइश उसक...

हो हल्ले के बाद भी नहीं निकलता समाधान

वर्तमान में महिला सशक्तिकरण का आये दिन शोर मचने से तो लगता है की महिलाएं आज ये कहने की स्थिति में नहीं हैं की उनके साथ समानता, हक रोजगार जैसी कोई समस्या नहीं रही।  आये दिन महिला उत्पीड़न,लिंग भेद,दहेज जैसी लाइलाज समस्याओं का हो हल्ला रहता है।  कहने को तो सरकारें और नाना भांत के संग़ठन मौका मिलते ही या मौका प्रायोजित करके महिला अधिकार दिलाने का दम भरते हैं। ये दम भी कुछ दिनों बाद कहीं घूमने जैसे गुम होता नजर आता है।  फिर से महिला लाचार बेबस बनाने का जिक्र छिड़ता है तो महिला सश क्तिकरण की कसमें इरादे मंचों सड़कों से दिखाए जाते हैं पर महिलाओं से जुडी किसी भी समस्या का निदान नहीं हो पाता है। तरह तरह के आयोगों संगठनों के बावजूद एक ही बात बार बार दोहराया जाना कहीं कहीं उन परोकारों में ही कमियां दर्शा जाता है। वास्तव में महिलाओं को सशक्त बनाना है तो उनके लिए रोजगार की व्यवस्था कर दे सरकार तो बाद में कुछ भी करने की जरूरत ना पड़े। सरकारी नौकरियों में महिलाओं की उम्र की बाध्यता हटाने की आवाज उठे तो महिला आत्म विश्वास से लबरेज रहे। महिलाओं से संबन्धित्त विभागों में केवल महिला को ही नियु...

#सवाईसिंहधमोरा , समाज हित के अलावा खुद का निज हित नही देखा

#सवाईसिंहधमोरा चकाचोंध भरे रास्तों पर #सादगी सम्पूर्ण जीवन में रही। #स्वच्छ्ता विचारों की कूट कूट के भरी। ज्ञान का भंडार फिर भी कोई गुमान नहीं। छोटे बड़े में कोई भेद ना करते हुए मार्गदर्शन करते रहना बड़प्पन रहा। अकेले दिखते तो भी विशाल दिखते और भीड़ में भी विशाल ही दिखते। साथ आया उसे आगे बढ़ाने के रास्ते ही तैयार किये चाहे खुद जहां थे वहीं खड़े रहे। खुद #सवाईसिंहधमोरा साहेब ने कभी जो किया उसका जिक्र ना किया पर यदा कदा उनके साथी रहे आदरणीयों के थोड़े बहुत लिखे से उनका कद विशालकाय ही उभर कर सामने आया। भारत सरकार के प्रसार मंत्रालय का आकाशवाणी हो या सामाजिक क्षेत्र धमोरा साहेब हर जगह सर्वश्रेष्ठ नजर आये। आजाद राजस्थान का कोई सा भी आंदोलन रहा उसमें भागीदारी रही। सर्वाधिक लोगों को स्नेह देने और सम्पर्क सूत्र बाँधने में भी आगे रहे। पद कद की लालसा लिए जमाने में किसी संत की भांति जीवन यापन करने वाला कोई धमोरा साहेब की तरह नजर भी नहीं आता लगता है अब। #श्रीपालजीशक्तावत के कहे गए शब्द और पीड़ा अब ह्रद्य को कटोच रही है। धमोरा साहेब को याद करते हुए श्रीपालजी ने चिं...

#आजादी का दिन है फिर भी मन #खिन्न है

#आजादी का दिन है फिर भी मन #खिन्न है। #मतलब परस्तों की बढ़ती तादात से अब तो कुछ अच्छा होगा की नहीं बची लगती कोई #आस हर साल के मुखिया सिरमोरों के मुख्य भाषण से लक्ष्य पूर्ति के साल वैसे के वैसे ही अधूरे रह जाते हैं, फिर भी भाषण देने वाले और उनके समर्थक #शर्मिंदा नहीं होते ? #लानतें तो नाकारापन के लिए बहुत जमा है पर लेने वाला लेने को तैयार नहीं ऐसे में मन मसोसकर दिन विशेष का जश्न मनाते हैं और फिर से अपने अपने गोरख धंधों में पिसते जाते हैं। खैर ये सब तो जगजाहिर सी बातें हैं जिनको करके कुछ होना जाना नहीं। आज तो पुरानी यादें भी बड़ी अच्छी लगती है,जबकि आधुनकिता रग रग में नासूर बनके डस चुकी है। वर्षों पहले आजादी के तराने गूंजते थे तब राह चलते भी अपना काम धाम छोड़ देश भक्ति के रंग में स्वयं को रंगते रहे ,आजकल तो स्वतः कार्यक्रम में कोई आता नहीं और बुलावों से आने वाले हाथ घड़ी या मोबाइल में समय देख देख कार्यक्रम कब खत्म हो और कब निकले की होड़ में लगे रहते हैं। चारदीवारों में होने वाले आयोजन सबंन्धितों तलक सिमट गए हैं और राह चलते अंदर ना घुस पाएं के पुख्ता बंदोबस्त आय...

आयोजन के वक्त हल्ले बाकी वक्त सुन स्पाट

ओलम्पिक में अभी तलक पदक नहीं मिला, ये जुमला-यादें हर ओलम्पिक के वक्त दोहराई जाती है।  खेलों-खिलाडियों के प्रति हमारी भावनाएं रात बीती बात बीती से भी गई गुजरी सी लगती है।  विदेशी खिलाडी से हमारे खिलाड़ियों की तुलना करके हम उम्मीदें तो बड़ी-बड़ी बांधते हैं पर धरातल पर खिलाड़ियों को प्रोत्साहन कितना देते हैं ये चर्चा करना ही नहीं चाहते हैं ? हमारे खिलाड़ियों की उम्र से आधे उम्र का विदेशी खिलाड़ी पदकों के ढेर लगाता है तो केवल मात्र खिलाड़ी की कमी तो हम देख लेते हैं,पर उस विदेशी और हमारे  बीच की आधारभूत सुविधाओं का आंकलन निष्पक्ष तरीके से हम करते ही नहीं। हमारे ओलम्पिक में पिछड़ने का सबसे बड़ा कारण हमारे खिलाडियों में भविष्य को लेकर व्याप्त असुरक्षा है। खिलाड़ी अपने जीवनयापन की दौड़ में ऐसा उलझता है की वो अपना अधिकतर बल उसी की चिंता में खत्म कर देता है। इसी असुरक्षा के कारण हमारे खिलाडी प्रथम चरण की बाधाएं पार पार करते अंतिम चरण में थक से जाते हैं। खेलों में प्रभुत्व बचपन से भविष्य को संवारने की चिंता में ही खो देते हैं तो किसी बड़ी प्रतियोगिता में पदक आएगा या नहीं ये अंतिम समय तलक सो...

शाह श्री के दौरे का सार, बरसात का भरा पानी और रोज की लूट पर नहीं कोई अंकुश ?

शाह श्री के दौरे का सार, बरसात का भरा पानी और रोज की लूट पर नहीं कोई अंकुश ? कार्यकर्ता ना होना निराश। जनता कार्यकर्ताओं को ना कहे क्योंकि संगठन अभी मजबूत करना है। चाहे अगले चुनाव में सत्ता से ही बाहर पटक देना ? संगठन मजबूत करके सत्ता फिर से पाने का पावर गेम चल रहा है, ऐसे में सरकार को कुछ कह नहीं सकते। धर्म-जात-अगड़ा पिछड़ा बाबाओं संग बंद कमरों में वार्तालाप, खाना पीना के शोर भले ही खबरचियों ने चीख चीखकर नॉनस्टॉप दिखाए होंगे, लेकिन बरसात के पानी में तैर रही जनता की पीड़ाएं-समस्याएं दब भी नहीं पाई। माननीय नेताजी ने संगठन को ऐसा मजबूत करने का मंत्र दिया की बैठक में आये एक जनप्रतिनिधि अस्पताल पहुंच गए ? माननीय शाह श्री किसी गरीब के घर खाने पर तो पहुंच गए पर सत्ता तलक पहुंचाने वाली माई बाप जनता के घरों में आसपास भरे पानी को देख पाने की फुरसत नहीं निकाल पाए। माननीय के दौरे के साथ शुरू हुआ बरसात आने का क्रम भी नहीं टूटा और ना ही सड़कों गली मोहल्लों में पानी भरने का चलन रुका। अपराधी भी ठेंगा जैसे निकाले ही घूम रहें हैं,जो साहेब के दौरे में व्यस्त प्रशासन को आज भी चुनौत...

अमित शाह का स्वागत लील गया जनता की परेशानी

अमित शाह हमारे राजस्थान की राजधानी में पधारे, पर क्या करने वो इतनी दूर से हवाई जहाज से उतरे वो पत्ते अभी तलक किसी ने पट्ठे ने नहीं उघाड़े हैं।  बड़ी बड़ी खबरें समाचार छन छन कर रहे हैं शाह सत्ता संगठन को मजबूती देंगे पर जहां एक तरफ भाजपाई संगठन और सरकार शाह को लुभाने में लगे रहें, वहीं दूजी तरफ अपराधी कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाकर बड़ी बैंक लूटों को बेखौफ अंजाम दे गए।  हाल में राजस्थान पुलिस सबसे तेज का दावा दो तीन की अजमेर-जैपुर की वारदातों से मंदिम सा हो गया।  ये भी संजोग जोरदा र रहा की शाह के दौरे के शुरुआत में ही प्रशासनिक कार्यों की खुल्ल्म खुल्ला पोल हर स्तर पर उधड़ी, ऐसे में शाह का कोई सार्वजनिक बयान सत्ता संगठन को फटकारने दुत्कारने का नहीं आना जनता की बदकिस्मती हो रहा। अभी भी कुछ नहीं बदला, अगर अमित शाह अपने स्वागत मालाओं तले दबे चक्षुओं को उभारें तो जनता के बुरे हाल उनको साफ़ साफ़ नजर आ जाएं। ज्यादा दूर नहीं जाना ना ही पैदल चलना बस जिस वाहन में विराजे हैं उसी से थोड़ा बाहर झांक लें दिल्ली से आये मेहमान तो सड़कों पर बहता पानी गंदगी नजर आ जायेगी। कानून व्यवस्था की खामी तो ...

रामायण पढ़ा दी महाभारत करा दी फिर भी नहीं निकला समाधान

रामायण पढ़ा दी  महाभारत करा दी  फिर भी नहीं निकला समाधान  गीता की पुस्तकें भेंट करते करते खुद भी भूले और दूजे को भी नहीं मिला ज्ञान  गांधीजी को याद कर अहिंसा की बातें कर ली नहीं बनी बात / भगतसिंह-चंद्रशेखर आजाद तलक के बलिदान को भी लिया साथ फिर भी सामने वाले ने नहीं मानी बात / दूजों के घोटाले उजागर करने के फेर में खुद का घर साफ़ करने तक की नोबत आ गई / ईमानदारी की कसमें खाते खाते खुद पर बेईमानी का ठप्पा लगा बेठे / झूठ से नफरत नफरत हे कह कह कर सबसे बड़े झूठे बन बैठे/ दूजों को नाकारा बताते बताते खुद ही नालायक बनने का रास्ता चुनने लगे / दूजों के घरों में आग लगाने वाले आजकल खुद के घर को टूटने से बचाने में लगे हें / मोह माया से दूर रहने की नसीहत देने वाले खुद की सत्ता बचाने में जुटे / भ्रष्टाचार मिटाने का दावा करने वाले ही खुद पर गिरी चिंगारीयों से अब डरने लगे हें / वर्तमान हालातों से बुरे हालात तो कभी नहीं रहे पर इन्हें लिखते लिखते अब तो मेरे हाथों की अंगुलियां भी थकने लगी हें फिर भी कहीं ना कहीं सारी समस्याओं के समाधान की उम्मीदें अभी भी जिन्दा हे

बरस जा अब तो बरस जा । इतना मत तरसा-तडपा

बरस जा अब तो बरस जा । इतना मत तरसा-तडपा।  अब तो बरस जा का हल्ला सुन इन्द्रदेव भी अध्यधिक विचलित होकर कहाँ बरसे की सोच में पड़े । ये देख इंद्र के चेले चपाटी भी धरती वालों का पूरा बायोडाटा खंगालने लगे । इंद्र के थोड़ा सा बरसते ही चेले चपाटी उनको रोक कर बोलते राजन क्यों इन मक्कारों के लिए अपनी उर्जा व्यर्थ में बहाते हो । एक तो सभ्य कहलाना पसंद करने वाले को आपसे बात करनी की तमीज नहीं और दिखावा करने में भी करता हे यकीन । इंद्र अब ज्यादा परेशान हो के सोचने लगे तो उनकी मंडली इंसानी फितरत का ढोल पीटने लगी । राजन माना की धरतीपुत्र जल संकट से जूझ रहा हे पर उसकी गलती का बोझ हम क्यों उठाये । हमने तो कभी भी अपने कर्तव्य से मुहं नहीं मोड़ा । ये तो इंसान हे जो सब उजाड़ अपनी वाणी की मधुरता भी खो बेठा अब आपको आवाज देता हे वो भी देखो केसे अब तो बरस जा। अरे सीधा कह दे इंसान अब तो बरसता रहे तो क्या गलत होता । ये तो घर घर आये मेहमान को बेठाए बिना उसको विदाई देने समान बोली हे। अब इसमें इन्द्रदेव आप की क्या गलती जेसा इंसान चाहता हे वेसा ही करते हो। उसने बोला अब तो बरस जा और आप बरस कर चलते बने । अब इंसान करे...

राम रूठा राज रूठा तो लोगों का दिल टूटा?

राम रूठा राज रूठा तो लोगों का दिल टूटा? घायल अस्पताल से छुट्टी की बाट जोहे, मरने वाला अंतिम संस्कार को तरसे। इतना कुछ होने पर भी हर कोई अपनी अपनी रोटियां आजकल राजस्थान में सेंकने की जुगत में व्यस्त।  घर में शव रखा है, परिजनों समर्थकों का हाल बेहाल है एक तरफ तो दूजी तरफ घायल के स्वस्थ होने की प्राथनाएं जोरों पर।  न्याय-अन्याय के घालमेल के शब्द बाणों और मामला सुलटाकर नंबर बढ़ाने के कारनामों से मरने वाले और जिंदा दोनों को शर्मशार करने के काम करने से भी कुछ लोग बाज नहीं आ रहे ? मृ तक के लिए दिलों दिमाग से न्याय मांगने के लिए लोग स्वतः ही आगे बढ़ने लगे तो अब प्रायोजित कार्यक्रमों से कुछ लोग भीड़ आगामी दिनों में जुटाने के जुगाड़ में जुटे। सामाजिक विवशता ऐसी है की सच्चे लोगों के एक तरफ खाई तो दूजी तरफ कुआं जैसी विकट संकट वाली परेशानी सामने आई। हाल के घटनाक्रमों से हिंदुत्व का दावा फैलाने वालों की कार्यशैली पर कालिख सी पुती हुई है। अंतिम संस्कार को तरसती लाश और फिर राजनैतिक कलाबाजियां धर्म संस्कार संस्कृति का काल बनती नजर इन दिनों राजस्थान में नजर आती है।

आनंदपाल मामले में राजस्थान का मीडिया गाय बना ?

आजाद देश में रट्टू तोते से भी बदतर गुलामी भरे विचारों की मानसिकता लिए मन में आये उसके गुणगाण-लानतें तत्काल देने से हम बाज नहीं आते ? कोई किस आधार पर क्यों कैसे किसलिए कहता है और कहने वाला कैसा है ये जाने बुझे बताये बिन उसे हीरो या जीरो बनाने की चर्चाओं का बेमतलब दौर भी हमारे यहां खूब चलता है ? ऐसे दौर में मिडिया की हालत तो दुधारू गाय जैसी हो गई है की जब तलक उसका दूध मिलता रहे वो बड़ी अच्छी लगती है, नहीं दूध दे तो हर कोई थाप लगाता हुआ उसे दुत्कारता नजर आता है। हाल ही में राजस्थान की सारी बड़ी बातों यादों पर भारी पड़ रहे आनंदसिंह एनकाउंटर मामले पर उठ रहे सवालों के बीच भी मिडिया की भूमिका पर सवाल उठने लगे ? मिडिया की गलती इतनी सी रही की पुराने आंदोलनों में क्या क्या हुआ करने वाला कौन इसे इग्नोर अनदेखा करते हुए उक्त आंदोलनों में सर्वेसर्वा बने लोगों की हालिया आंदोलन के बारे में बातें उजागर कर दी। वीडियो बातें सार्वजनिक होते ही बेचारी मीडिया के पीछे लानतों की बौछारें लगा दी गई। माना की जख्म कईयों के तन मन को अशांत सा कर गया है, लेकिन कुछ तो सच होगा जो बार बार इन्हीं लोगों पर सवा...

सफलता-असफलता के अर्थों में उलझे हम कूछ भी बुरा होने का दोष फटाफट दूसरे के माथे मंड देते हैं

सफलता-असफलता के अर्थों में उलझे हम कूछ भी बुरा होने का दोष फटाफट दूसरे के माथे मंड देते हे / कभी ये नही सोचते की इसमें कही न कही व्यक्तिगत दोष भी सबसे बड़ा गुनहगार हे ? खुद के मरे ही स्वर्ग मिलता हे ये सुना हे पर रविन्द्र के सुनाये किस्से ने इसे पुख्ता किया? अपनी बिगडती दशा से परेशान बाल कटिंग की दुकान चलाने वाला जब देखो भगवान को कोसता रहता की इतनी पूजा पाठ के बाद ये तूने केसा हाल किया / रोज रोज के ओल्मे मिलने से भगवान भी दुखी रहने  लगा / अब भगवान परेशान हो चला तो उसने बाल कटिंग की दुकान चलाने वाले की समस्या का निदान करने की सोची और रूप बदल कटिंग कराने पहुच गया/ भगवान बाल कटा रहे हे और काटने वाला भगवान को कोसे जा रहा हे / भगवान ने उससे पूछा की भाई तुम भगवान को इतना कोसते क्यों हो / दूकान वाला दुगने वेग से बोलने लगा की इतनी पूजा पाठ करता हु पर वो मेरी सुनता नही हे सुध नही लेता हे / ये बात सुनकर भगवान ने उसे दुकान के बाहर बेठे एक फटेहाल भिखारी दिखाया और बोले इसके बाल देखे तुमने / दुकान वाला बोला बहुत बड़े हे / भगवान ने पूछा तुमने काटे क्यों नही तो दुकानवाला बोला ये मेरे पास आया नही इस...

कर्ता धर्ता बस नाम शोहरत के पीछे भागते रहते हैं और असमय ही लोगों की जानों पर बन आती है

ये आज के दौर की विडंबना ही मानो की  कर्ता   धर्ता बस नाम शोहरत के पीछे भागते रहते हैं और असमय ही लोगों की जानों पर बन आती है।    एसी  में बैठकर बैठकें लेते रहना ,दौरे दर दौरे करकर सब ठीक है या ठीक कर देंगे जैसे रट्टे लगाते रहना आजकल हुक्मरानों का नजरिया है।  कोई घटना हो जाए और मामला बढ़ने लगे तो एक आध तो एपीओ या निलम्बित करके जांच बैठा देना ही मानो सरकार-प्रशासन का धर्म-कर्म  बन चुका है। सरकार-नेता बड़ी बड़ी बातें कर जाती हैं लेकिन असहायों की मौतें होने पर अनजानापन दर्शाते हुए मासूम बन जाते हैं। अचरज तो जब होता है की ऐसी घटनाएं सर्वेसर्वाओं की नाक के नीचे हो जाती है और इनको छींक तलक नहीं आती। सत्तारूढ़ दल के प्रदेश अध्यक्ष का निर्वाचन इलाके में ये मौतें शर्मिंदा होने वाले नेता को तलाशती है लेकिन कोई नजर नहीं आता तत्काल। मामला तूल पकड़ने लगता है तो सब आरोप-प्रत्यारोप के राशन पानी की एक दूजे पर बौछार करते नजर आ जाएंगे पर ऐसी विदारक घटना के लिए तत्काल इंतजाम नहीं किये जायेंगे, सिवा जांच के आदेश देने के। रोना तो तब आता है जब कोई नेता जन प्रतिनिधि किसी समारोह ...

समस्या समस्या ना होकर जैसे कोई सुगंधित पुष्प होती है ,जिसे अंत नहीं बढ़ावा सरकारें देती लगती हैं।

समस्या समस्या ना होकर जैसे कोई सुगंधित पुष्प होती है ,जिसे अंत नहीं बढ़ावा सरकारें देती लगती हैं। पहले क्या हुआ क्या नहीं ये जान नहीं सकते ,लेकिन जब से किसी के आंख,कान नाक सुचारु हुए तब से उसके सम्मुख जो भी समस्या आई वो अभी तलक मुक्ति का मार्ग ही पूरा तय नहीं कर पा रही। कश्मीर हमारा सर है फिर भी बार बार उसके माथे से लहू की धारें फूटती हैं। वर्षों से काश्मीर एक मुद्दा सा बन गया लगता है ,वहां जो होता उसका हल्ला तो जानने,ना जानने वाले सारे देश में खूब मचाते हैं। कश्मीर जैसे ही हालात कई बार देश के अन्य राज्यों में भी खूब होते रहते हैं,पर हम तो ना जाने किस सोच से चलते सोचते हैं वो अनदेखा ही किये जाते हैं। काश्मीरी लोगों को क्या चाहिए,क्या नहीं नहीं जैसी बातें कभी हमारे सामने आ नहीं पाती और उससे पहले ही वहां के अलगाव,हुड़दंग की कहानियाँ जोरों से छा जाती हैं। कश्मीर की समस्या जैसे बरसों पुरानी होते हुए लोगों का लहू पीने में लगी है,वैसा ही कुछ देश के कुछ राज्यों में नक्सल वादी करने में लगे हैं। समस्या देश के कानून से खिलवाड़ की है पर कश्मीरी कुछ करता है तो अधिकतर लट्ठ लेकर जैसे...

लिंग भेद का कहर पालतू पशुओं सहित इंसानी बस्ती में मातम मचाये पर हम रहें मौन

लिंग भेद का कहर पालतू पशुओं सहित इंसानी बस्ती में अनदेखे मातम की इमारत बनाने पर अड़ा हे पर हम मौन हे? गो वंश बचाने का दावा करने वाले बहुत हे तो हकीकत में काम करने वाले भी हे पर उनकी दिशा धुंधलाई सी लगती हे / गाय दूध देती हे तब तलक बहुत प्यारी लगती हे ; जेसे ही दूध देना बंद किया आँखों में खटकने लगती हे ? बछडी हो जाये तो मालिक खुश बछड़ा होते ही दुःख / बछड़ो का उपयोग हमारे बड़े बुजुर्ग अच्छे से करना जानते थे पर वर्तमान में बछड़े का उ पयोग केवल चमड़े तलक रह गया लगता हे ? पर्यावरण सरक्षंण में बछड़ो की भूमिका काया पलट जेसी हे पर मेरे देश के पर्यावरणविद्ध और गोवंश बचाने की मुहिम से जुड़े लोग ध्यान नही देते / इको फ्रेंडली वातावरण तेयार करने के लिए नई नेइ स्कीम लाते हे फिर भी सफल नही हो पाते / अगर एक प्रयास बछड़ो को यातायात साधन बनाने में किया जाये तो क्या बुरा हे / रिक्शा ऑटो रिक्शा का चलन हे तो बछडा गाड़ी चला के हो सकती हे पर्यावरण सरक्षंण की कोशिश/ इस तरह के छोटे छोटे उपायों से स्वदेशी ; आत्म निर्भरता ; गोवंश बचाने; खाद उत्पादन; पर्यावरण सरक्षंण जेसे अभियानों को मदद मिलेगी बाकी मर्जी हल्ला मचाने वाल...

निंदा दर निंदा करने की लाइलाज बीमारी ने सारा डर मिटा दिया

निंदा दर निंदा करने की लाइलाज बीमारी ने सारा डर मिटा दिया ? अब तो एक पल निंदा की दूजे पल ही घर में आई खुशियों में सारी दिक्क्तें दूर हुई।  असर जिस पर हो उसकी निंदा करते तो अच्छे लगते हैं,लेकिन बेशर्मी की हदें पार कंरने वालों की निंदा करके वक्त जाया करने से क्या हासिल होगा,ये हम समझना नहीं चाहते ? हर समस्या का दोष विरोधी पर लादने की विकृत मानसिकता पाले खुद ने क्या किया ये भी भूलने लगते हैं। घर में खुद के आग लगे तो हम तमाम साधन झट से जुटा कर राहत पाते दिखते हैं ,लेकिन किसी और क ा घर जले तो अनजान बनकर अंत में अफ़सोस ही जाहिर करने के लतियल हो चले हैं। कर्तव्य निभाते हुए शहादत देने वालों की संख्या में इजाफा होने लगा है,फिर भी हमारा नाकारापन दोषियों पर अंकुश लगा नहीं पाता। शहीद तो गौरांवित करते जा रहे हैं,पर सिस्टम शर्मिंदगी उठाते हुए कोई सुधार नहीं कर पाता है ? छोटी छोटी बातों पर किसी ना किसी का सर कलम करवाने के घोषणकर्ता भी शहीदों की शहादत पर कुछ नहीं करते। सीमा पार की दहशत और आतंक से भी हम ढंग से निपट नहीं पाएं और घर में हमारे जवानों के खून सरे आम होने लगे हैं ? अभी तो शहीदों के घरों ...

बरसों पहले बनाये गये सविंधान की कुछ बातें वर्तमान में अनावश्यक

बरसों पहले आम नागरिको के हितो के लिए बनाये गये सविंधान की कुछ बातें वर्तमान में अनावश्यक सी होती जा रही हे /  मसलन किसी पद या काम के लिए ली जाने वाली सत्य-निष्ठा की शपथ की पालना व निभाने में बड़ी मुश्किलाते होने लगी हे / मन मारकर इंसान सत्य निष्ठा की बाते करता हे मोका आते ही सेवा भाव के फेर में जल्द से भूल भी जाता हे / अगर अतिशीघ्र इसे कानूनन तरीके से लुप्त कर दिया जाए तो सिस्टम से जुड़े जिम्मेदारी लेके बेठे लोगों को बड़ी राहत मिलेगी / ऐसा करते वक्त जनता की ना सोचना क्योंकि जनहित के जितने भी दावे इरादे बनाये गये हे वो पनपने से पहले ही मुरझाते देखे जा सकते हे / विद्यालयों में या किसी काम के कागजों में वर्णित सच्चाई इमानदारी के हलफनामा से भी समय खराब व दिमाग की नसों पर असर पड़ता हे क्योंकि कोई भी काम बेईमानी की मिलावट के बिना होना देश में बड़ा मुश्किलों से भरा हे /  बच्चा जन्मे या कोई मरे , विद्यालय में प्रवेश, नोकरी की मारामारी,शादी; तलाक,बिजली-पानी की जरूरत,बैंक, सरकारी-निजी कार्यालयों व जीवन यापन से सम्बन्धित कामों में नित रोज झूठ मक्कारी को सच बनाकर काम निकाला जाता हे / अब इससे ...

भूकम्प के झटके और किसान की मौत कुम्भ के मेले में बिछड़े भाइयो जेसे

आज के हालातों में भूकम्प के झटके और किसान की मौत कुम्भ के मेले में बिछड़े भाइयो जेसे लगते हे  दोनों को ही हल्के में लिया जाता हे फिर कोई हल्ला नुक्सान होता हे तो डेमेज कंट्रोल का किसी ने किसी को जिम्मा दिया जाता हे / दोनों ही बाते होने पर किसी की मौत पर शहनाई बजाने-बजवाने जेसा मक्कारी फेरब किया जाता हे / भूकम्प के झटकों की एसी तस्वीर पेश की जाती हे जेसे थाली में रखा भोजन बिना कुछ किये सीधे मुह में पहुच जाये / घर खर्च  चलाने के झटको के मुकाबले भूकम्प के झटके तो कुछ नही फिर भी खबरनवीस इतना हल्ला मचाते हे की अब तो मानो प्रलय से कोई नही बचेगा/ दहशत इतनी की डरने के बजाये लोग फ़ोन ले के अपने मिलने वालों को अपनी तस्वीर टीवी पर आने का संदेशा हंसते हंसते सुनाते हे / बिल्डिंगो से जान बचाकर दीवारों के सहारे ऐसे खड़े होते हे की बिल्डिंग भले ही गिर जाए पर दीवार हिलेगी तक नही / सुबह आये भूकम्प की दहशत शाम तलक बरकरार रखते हे / इस दोरान भूकम्प के झटकों से केसे बचा जाए ये कोई नही बताता उल्टा डराता रहता हे / जान बचाने वाले को कहा रुकने की फुर्सत रहती हे उसे तो हकीकत में केवल भागने की लगी रहती पर ...

बुराई चाव से दुलार कर अपनाते हैं और अच्छाई को दुत्कार करके

बुराई चाव से दुलार कर अपनाते हैं और अच्छाई को दुत्कार करके अनहोनी को अपने पास बुलाकर पछताते हैं। कोई भी सामाजिक बुराई सामने आते ही संस्कार-संस्कृति को पुनः आगे बढ़ाने का हो हल्ला करके बात ठंडी होते हुए ही घिसे पिटे पुर्जों की तरह समय काटंने लगते हैं।  माना की समस्याएं गहरी हैं पर उनके जन्म की राहें भी आसपास से ही खुदी पड़ी हैं।  घर से लेकर बाजार तलक आजादी मनमानी का झुनझुना थामे हम आये दिन किसी न किसी अत्याचार-अपराध का रोजना जोरों से रोते हैं,लेकिन कुछ दुविधा बनी सुविधाएं छोड़ शांति की प्राप्ति का छोटा सा जतन नहीं कर पाते हैं।  कहने को तो कोई भी किसी को बुराई की राह पर चलने की सीख नहीं देता है,फिर भी ऐसा क्या घटता बढ़ता है जो बुराई में ही इंसान लिप्त होता जाता है। संस्कार भी ऐसे बुरे नहीं दिए जाते की कोई किसी का दुःख बढ़ाये,पर पल पल में कहीं ना कहीं दुःखदायी घटनाएं होती ही जाए है।  शेष बातें फिर कभी हाल फिलहाल देनी है उपस्थिति कहीं ?

स्वच्छता अभियान फिर भी कूड़े कर्कट का मंजर आम

स्वच्छता अभियान फिर भी कूड़े कर्कट का मंजर आम,ऐसे में मेरा भारत में सरकारें भारी भरकम बजट को सफाई अभियान के सहारे करने लगी है बर्बाद। देश भर को खुले में शौच मुक्त कराने के जगह जगह प्रमाणपत्र पोस्टर इत्यादियों का अम्बार लगा दिया पर अतिक्रमण हटाए बिन खुले में शौच मुक्ति का अभियान अधूरा पड़ा है।  बड़े बड़े शहरों में बसी कच्ची बस्तियां जिनमें ना कोई सरकारी सुविधा ना ही नजर, वहां के लोग मन में आये वहीं निवृत हो आते हैं रोज। ऐसे अतिक्रमण वाले स्थानों पर ना तो कोई शौचालय है,फिर भी सरका री कारिंदे आंखें मूंद कागज भरने में जुटे लगते हैं। स्वच्छता अभियान के लिए फोटो खिंचवाने वाले और चुनाव में वोटों का जैसे तैसे जुगाड़ बिठाने वाले नेता भी नालों उजाड़ जमीन पर अतिक्रमण करके रहने वालों को खुले में शौच से रोकने की कोई पहल करना ही शायद भूल गए लगते हैं। खुले में शौच मुक्ति के लिए विज्ञापन से लेकर ढोल नगाड़े बजाए जा चुके हैं पर सर्वाधिक गंदगी वाले स्थानों पर ये अभियान चलाने वाले कोई सार्थक प्रयास करने में असमर्थ से नजर आते हैं। देश के बड़े भूभाग से गुजरने वाली रेल पटरियों के आजू बाजू पर रोजाना पसरने वाली ग...

खेतों में पांव गंदे करने नहीं,फिर भी किसानों के लिए रोना भाता खूब

किसान भूखे मर रहा है, बर्बाद हो गया जैसे ताने मारते धरना-प्रदर्शनकारी मेहनत करने वाले अन्नदाता के हितों की बातें गुमराहों में घुमाने का खेल बड़ा अच्छा रचते हैं, फिर भी हम खेल खलियानों की बिगड़ती दशा पर असल बात क्या उस पर चर्चा नहीं करते ? महंगाई के दौर में माना की खेती अब आसान काम नहीं माना जाता , लेकिन खेत-खेती से दूरी हमने कैसे कब क्यों बना ली ये जान लें तो खेती करना कुछ तो आसान हो जाएगा ? अर्थ युग में सुविधाओं के आश्रित ऐसे हुए की कोई मजबूरी होने पर खेत और किसानों के भले का  झंडा उठाने वाले लोग कभी किसी खेत की तरफ रुख करते होंगे। आजकल आधुनिकता भरे जीवन में टाइट जींस-टीशर्ट पहनने वाला नौजवान बच्चा बूढ़ा कई एकड़ बीघा जमीन का मालिक कागजों में भले ही होगा पर किसान मुक़्क़म्मल नहीं बन पाता है। बड़े लोग जो हल्ला किसानों के लिए मचाते हैं,उनके लिए तो खेत किसी आरामगाह जैसे होते हैं। आगे बढ़ने की होड़ में खेती भी ठेका प्रणाली का निवाला बन चुकी और लोग ज्यादा कमाने के फेर में खेत बेच आलीशान बिल्डिंगें बनवाने में रूचि रखते हैं। किसी किसान के हाल देखो पूछो तो साफ़ नजर आएगा की वर्तमान की अधिकतर पीढ़ियां...

कांग्रेसी बार बार की पराजय पर चर्चा मंथन किसी खुले स्थान पर करने के बजाए बंद कमरों में करके जलती आग में घी और डालने जैसे कामों में लगे हैं।

देश में सबसे ज्यादा सत्ता भोगने के बावजूद कांग्रेस अपने वजूद बचाने की जिद्दोजेहद में किसी चमत्कार की से बचने के भरोसे लगती है। कांग्रेस का जमीनी धरातल दिनोंदिन खिसकता ही गया पर ना तो कांग्रेस आलाकमान और ना ही इसके नेता उसे बचाने के लिए खुद पीछे हटने को तैयार होते लग रहे हैं।  शीर्ष कांग्रेस नेतृत्व की कार्यशैली के चलते आजादी के बाद से जिन जगह पर भाजपा का नामलेवा कोई नहीं होता था,उन जगह पर भी भाजपा के झंडे गड़ना आम हो चला है।  कांग्रेस अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है पर कांग्रेस ी बार बार की पराजय पर चर्चा मंथन किसी खुले स्थान पर करने के बजाए बंद कमरों में करके जलती आग में घी और डालने जैसे कामों में लगे हैं। देश तो बहुत बड़ा पर उसका एक राज्य राजस्थान में कांग्रेस की दशा से सम्पूर्ण कांग्रेस का वर्तमान हाल काम सामने आता है ? कांग्रेस में केवलमात्र एक हाथ में सत्ता रही तब तलक विजेता रही और जैसे ही समानांतर सत्ता के कथित केंद्र रचे तब से ही पराजयों से घिरती गई। सोनिया गांधी के सर्वेसर्वा रहते ना जाने कौनसी सलाहकार मंडली ने राहुल गांधी को भी सोनिया के बराबर कांग्रेस नेतृत्व का केंद्र...

देश में मोदी के बाद योगी, लेकिन राजस्थान में वसुंधरा राजे की रवानगी कब होगी अबूझ पहेली

देश में तो मोदी के बाद कौन की पहेली योगी ने आकर सुलझा सी दी है, लेकिन राजस्थान में वसुंधरा राजे की रवानगी कब होगी की गुत्थी एक अबूझ पहेली को दिनोंदिन बढ़ावा दिए जा रही है।  राजस्थान में ना जाने इस बार जब से वसुंधरा राजे की सरकार बनी तब से उनके जाने और ना जाने किस किस को संभावित सीएम के रूप में आगे बढाने की खूब होड़ चली है।  कभी वसुंधरा राजे दिल्ली चले जाए या फिर ओम माथुर राजस्थान आये तो सत्ता के बारे में चर्चाओं के चटखारों का बाजार बार बार गर्म होकर बर्फ से भी ज्यादा ठंडा होने का क्रम चलता रहता है। कोई सत्ता-संगठन की बातें करने केंद्र का नियुक्त पर्यवेक्षक आता है तो तमाम खबरची फटाफट अब वसुंधरा की सीएम से विदाई तय लगती है के सुर ताल बजा बैठते हैं,लेकिन बार बार की तरह फिर से अभी नहीं जायेगी वसुंधरा कहते हुए शायद कोई भूल सुधार की गुंजाइश भी तत्काल फैंकते हैं।  कयासबाजियों का खेल हालातों को अनदेखा करता है, हकीकत में सत्ता का मुखिया किसी जगह कौन होगा का अंजाम अप्रत्याशित चेहरों के शीर्ष पर आने के बाद पता चलता है।  राजस्थान में हाल फिलहाल भाजपा नेतृत्व के पास वसुंधरा जैसा क...