बुराई चाव से दुलार कर अपनाते हैं और अच्छाई को दुत्कार करके

बुराई चाव से दुलार कर अपनाते हैं और अच्छाई को दुत्कार करके अनहोनी को अपने पास बुलाकर पछताते हैं। कोई भी सामाजिक बुराई सामने आते ही संस्कार-संस्कृति को पुनः आगे बढ़ाने का हो हल्ला करके बात ठंडी होते हुए ही घिसे पिटे पुर्जों की तरह समय काटंने लगते हैं। 
माना की समस्याएं गहरी हैं पर उनके जन्म की राहें भी आसपास से ही खुदी पड़ी हैं। 
घर से लेकर बाजार तलक आजादी मनमानी का झुनझुना थामे हम आये दिन किसी न किसी अत्याचार-अपराध का रोजना जोरों से रोते हैं,लेकिन कुछ दुविधा बनी सुविधाएं छोड़ शांति की प्राप्ति का छोटा सा जतन नहीं कर पाते हैं। 
कहने को तो कोई भी किसी को बुराई की राह पर चलने की सीख नहीं देता है,फिर भी ऐसा क्या घटता बढ़ता है जो बुराई में ही इंसान लिप्त होता जाता है। संस्कार भी ऐसे बुरे नहीं दिए जाते की कोई किसी का दुःख बढ़ाये,पर पल पल में कहीं ना कहीं दुःखदायी घटनाएं होती ही जाए है। 
शेष बातें फिर कभी हाल फिलहाल देनी है उपस्थिति कहीं ?

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