लोकतंत्र भीड़तंत्र में खोता नहीं ,कहने को बहुत कुछ है पर हम आप ही सच स्वीकारने को राजी नहीं
बात बात पर धरना देने ,इस्तीफे सामूहिक सौंपने ,जनता की अदालत का मजमा लगाने के आदि हो चुके नेता ईवीएम का विरोध तो करने में लगे हैं पर चुनाव का बहिष्कार या फिर जीती सीटें छोड़कर कोई धरना प्रदर्शन आंदोलन का रास्ता अपनाने से क्यों हिचखिचा रहे हैं।
पक्ष तो अपने मन की करेगा फिर विपक्षी बार बार उसके जाल में फंसने क्यों चले जा रहे हैं। हर चुनाव में मशीनरी पर पराजित दोष लगाता है फिर भी सुधार नहीं होता, इसका हल्ला मचाने से सब बचते क्यों ,सिस्टम बनाने वाले भी पक्ष विपक्ष, फिर भी असल गलती कब कैसे किससे हुई ये आमजन तलक पहुंचातें क्यों नहीं।
कितने भी घोटाले हो जाए पर नेताजी के असर नहीं और कोई गरीब पकड़ा जाए तो घर बार बिक जाए।
आजादी के बाद से किसी सवाल,बात,समस्या का कोई हल निकल कर आया हो ये कहीं दिखा नहीं। एक सवाल सुलझता नहीं दूजा आता जाता है।लोकतंत्र की विश्वसनीयता का आधार धरातल है किधर अब।
अगर लोकतंत्र की विश्वसनीयता ही बची रहती तो जन प्रतिनिधि बनने वालों की संख्या ही ना बढ़ती। लोकतंत्र की विश्वनीयता बनाये रखने के लिए सत्ता या विरोधी अपने हित छोड़ना नहीं स्वीकारेंगे इस हकीकत से हम अंजान रहकर चर्चाएं करंगे तो विवाद दर विवाद ही होंगे।
पढाया जाता है की जब तलक कोई सवाल हल ना कर लो तब तलक अगला सवाल पर ध्यान ना दो, सवाल हल नहीं होता तो आगे का सवाल लो। यहां देश में सवाल तो आते हैं पर सवालकर्ता और जवाबकर्ताओं की कलाकारी से वो अनसुलझे ही रहते हैं।
हाथ से मुहर लगाने पर बवाल,ईवीएम पर बवाल और जैसे तैसे चलाते रहें सरकार का मजा लेना कोई छोड़ना चाहता नहीं और कोई भी सवाल रात गई बात गई जैसे पाता जाता है मुकाम।
हम चिल्लाते जब ही हैं जब हमारे पास विरोधी से निपटने के रास्ते नहीं बचते,नहीं तो विरोधी के पीछे दौड़ते हैं। कुछ ऐसा ही हाल देश में है की सत्ता के खिलाफ जमीन पर लड़ने का जनाधार विरोधियों के पास बचा नहीं। अगर जनाधार होता तो शहीद स्मारकों सहित जहां चाहते विरोधी धरना प्रदर्शन करते दिखते।
विरोध करना सवाल करना कोई बुराई नहीं पर उसे बीच रास्ते में ही भूल जाना मानसिक बीमारी से कम नहीं। गुजरात सीएम पद पर रहने के दौरान मोदी पर दागे सवाल भी अधूरे हैं और अब पीएम बनने के उछले सवाल भी अधूरे।
सवाल अपनी संख्याएं जिस तेजी से बढा रहे हैं उसी तेजी से मोदी के नेतृत्व में भाजपा बढ़ने में लगी है और विरोधी निचे ही निचे जाए जा रहे हैं। अगर जनाधार ही है तो ये सवाल सुलझाते क्यों नहीं।
बात जनाधार की है कांग्रेस के पास जनाधार था तब उसने राज किया और अब भाजपा के पास है तो राज कर रही ,ये हकीकत स्वीकारने से परहेज क्यों।
अगर जनता विपक्षी दलों को चाहने लगेगी तो ये विपक्षी दल धरना प्रदर्शन करने में जरा सी देर नहीं लगाएंगे ,ये ही हकीकत है जिसे किसी पार्टी या विशेष का विरोध करने का चश्मा पहन लेने से स्वीकारने में शायद परेशानी होती है।
सही-गलत क्या का अंतर ही रखते हुक्मरान तो आज आरक्षण सहित भांत भांत की समस्याएं नहीं पनपती ,मुफ्त में देंगे के नारे लगाकर सरकारें नहीं बनती।
लोकतंत्र भीड़तंत्र में खोता नहीं ,कहने को बहुत कुछ है पर हम आप ही सच स्वीकारने को राजी नहीं होते।हर चुनाव की हार मतदान प्रक्रिया पर सवाल और मोदी सरकार बनने के बाद तो बहुत ज्यादा ऐसे में अगर जनाधार है तो पहले जो करते आये नेता वैसा क्यों नहीं करते आजकल।
पक्ष तो अपने मन की करेगा फिर विपक्षी बार बार उसके जाल में फंसने क्यों चले जा रहे हैं। हर चुनाव में मशीनरी पर पराजित दोष लगाता है फिर भी सुधार नहीं होता, इसका हल्ला मचाने से सब बचते क्यों ,सिस्टम बनाने वाले भी पक्ष विपक्ष, फिर भी असल गलती कब कैसे किससे हुई ये आमजन तलक पहुंचातें क्यों नहीं।
कितने भी घोटाले हो जाए पर नेताजी के असर नहीं और कोई गरीब पकड़ा जाए तो घर बार बिक जाए।
आजादी के बाद से किसी सवाल,बात,समस्या का कोई हल निकल कर आया हो ये कहीं दिखा नहीं। एक सवाल सुलझता नहीं दूजा आता जाता है।लोकतंत्र की विश्वसनीयता का आधार धरातल है किधर अब।
अगर लोकतंत्र की विश्वसनीयता ही बची रहती तो जन प्रतिनिधि बनने वालों की संख्या ही ना बढ़ती। लोकतंत्र की विश्वनीयता बनाये रखने के लिए सत्ता या विरोधी अपने हित छोड़ना नहीं स्वीकारेंगे इस हकीकत से हम अंजान रहकर चर्चाएं करंगे तो विवाद दर विवाद ही होंगे।
पढाया जाता है की जब तलक कोई सवाल हल ना कर लो तब तलक अगला सवाल पर ध्यान ना दो, सवाल हल नहीं होता तो आगे का सवाल लो। यहां देश में सवाल तो आते हैं पर सवालकर्ता और जवाबकर्ताओं की कलाकारी से वो अनसुलझे ही रहते हैं।
हाथ से मुहर लगाने पर बवाल,ईवीएम पर बवाल और जैसे तैसे चलाते रहें सरकार का मजा लेना कोई छोड़ना चाहता नहीं और कोई भी सवाल रात गई बात गई जैसे पाता जाता है मुकाम।
हम चिल्लाते जब ही हैं जब हमारे पास विरोधी से निपटने के रास्ते नहीं बचते,नहीं तो विरोधी के पीछे दौड़ते हैं। कुछ ऐसा ही हाल देश में है की सत्ता के खिलाफ जमीन पर लड़ने का जनाधार विरोधियों के पास बचा नहीं। अगर जनाधार होता तो शहीद स्मारकों सहित जहां चाहते विरोधी धरना प्रदर्शन करते दिखते।
विरोध करना सवाल करना कोई बुराई नहीं पर उसे बीच रास्ते में ही भूल जाना मानसिक बीमारी से कम नहीं। गुजरात सीएम पद पर रहने के दौरान मोदी पर दागे सवाल भी अधूरे हैं और अब पीएम बनने के उछले सवाल भी अधूरे।
सवाल अपनी संख्याएं जिस तेजी से बढा रहे हैं उसी तेजी से मोदी के नेतृत्व में भाजपा बढ़ने में लगी है और विरोधी निचे ही निचे जाए जा रहे हैं। अगर जनाधार ही है तो ये सवाल सुलझाते क्यों नहीं।
बात जनाधार की है कांग्रेस के पास जनाधार था तब उसने राज किया और अब भाजपा के पास है तो राज कर रही ,ये हकीकत स्वीकारने से परहेज क्यों।
अगर जनता विपक्षी दलों को चाहने लगेगी तो ये विपक्षी दल धरना प्रदर्शन करने में जरा सी देर नहीं लगाएंगे ,ये ही हकीकत है जिसे किसी पार्टी या विशेष का विरोध करने का चश्मा पहन लेने से स्वीकारने में शायद परेशानी होती है।
सही-गलत क्या का अंतर ही रखते हुक्मरान तो आज आरक्षण सहित भांत भांत की समस्याएं नहीं पनपती ,मुफ्त में देंगे के नारे लगाकर सरकारें नहीं बनती।
लोकतंत्र भीड़तंत्र में खोता नहीं ,कहने को बहुत कुछ है पर हम आप ही सच स्वीकारने को राजी नहीं होते।हर चुनाव की हार मतदान प्रक्रिया पर सवाल और मोदी सरकार बनने के बाद तो बहुत ज्यादा ऐसे में अगर जनाधार है तो पहले जो करते आये नेता वैसा क्यों नहीं करते आजकल।
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