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Showing posts from November, 2016

खुद का धन छिपाओ दूजों का जमा करवाओ

आजकल घर,गली मोहल्ले,सड़क तलक पर रंगों के चर्चों के हल्ले मचे हैं। काला-सफेद जैसा भी हुआ धन उसके लिए बैंकों-एटीएम पर लोगों के लगते रैले हैं। समाचार पत्र हो या चैनल सब पर कालाधन कालाधन के लिए आमजन से लेकर तथाकथित विशेषज्ञों के मेले लग रहे हैं। बैंकों में जमा हो रहा अधिकतर आमजन-मेहनतकश का धन और हो हल्ले अब निकेलगा कालाधन के हो रहे हैं। हालात आठ-दस दिनों से दिखे उससे कहीं भी ये लगता नहीं की किसी बड़े धन्ना सेठ का धन बैंकों में अतिरिक्त जमा हुआ या किसी को सदमा पहुंचा हो। जनजीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति का भाव देखे तो अभी तलक जिनके पास अथाह धन भंडार है उनके बैंक तलक पहुंचे या कब तलक पहुंचेगे ये बताने को कोई नहीं लगता तैयार। सरकार के आदेश की पालना में आमजन तो जोरों से जुटा है,लेकिन कुछ ख़ास बना दिए गए गलियां निकालकर शायद आराम फरमाने के मुड़ में लगे हैं। अब जिसके पास ना कालाधन ना ही समुचित सफेद झक धन हो तो उसका मन विचलन करता हुआ आसपास व्याप्त हालातों पर कुछ अपने सवालों का हल भी चाहेगा,ये अलग बात की स्वार्थपूर्ति की खातिर उन सवालों को चाहे लोग कर देते होंगे दरकिनार। काला हो सफेद धन इससे बड़ी ब...
देश के प्रधानमंत्री ने 500-1000 के मामले में मन की बात जाहिर कर सम्पूर्ण जनजीवन में हलचल एकाएक मचा दी। सेना के अध्यक्षों की गुफ्तगूं और भारतीय मुद्रा के सर्वाधिक चलन वाले नोटों का इंतकाल की खबर देश-विदेश में पड़ने वाले असर की जोरों से चर्चाएं शुरू करवा चुकी हैं। हालात आधी रात तलक ऐसे दिखने लगे की आमतौर पर बत्ती गुल रखने वाले पेट्रोल पंपों पर भी पूरी रोशनी और लग्जरी वाहनों की कतार जुटी है। एटीएम भी लोगों की भीड़ से आबाद हैं तो जिसको भी नोटों के चलन पर आने वाले दिनों के कार्यक्रम की जैसी तैसी जानकारी है बस चर्चा करने की पड़ी है। सरकारी आदेशों जैसा हश्र ना हुआ तो पीएम का ये काम भारतीय अर्थ,राजनीती,विदेश सहित आमजन की नीतियों के लिए मील का पत्थर साबित होते देर ना लगेगी। द्र्ढ इच्छा शक्ति रखते हुए मन की बात लागू करवा दिया तो देश की कई समस्याओं का आने वाले साल में नामों निशान ही ना रहेगा और एक बारगी फिर से नमो नमो की गूंज सुनाई देते देर भी ना लगेगी। शुरआती लम्हों में तो मेहनतकश पेशोपेश में पड़े हैं और इधर-उधर से लक्ष्मी जमा करने वाले सुन्न। तत्काल कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा,वैसे भी ...
प्रकृति को मारते मारते थके नहीं तो प्रकृति ने खुद दिल्ली का हाल बुरा कर गम्भीर चेतावनी दी है ? बातों का हल्ला, कागजी हेराफेरी,फोटो खिंचवा के नम्बर बढ़ाने, बार बार बजट हड़पने से त्रस्त प्रकृति घोर नाराजगी प्रकट करने लगी ? पर्यावरण दूषित करने में सामूहिक योगदान और दोष किसी एक को थोप खुद करें आराम जैसे हथकण्डों से परेशान पर्यावरण भी इंसान को तंग करने का फार्मूला अख्तियार करने से चूकता नहीं लग रहा है। स्वार्थपूर्ति की खातिर दूजों को खराब-कबाड़ करने की बढ़ती लालसा का ही असर है की समस्याओं में इजाफा होते रहने के बाद भी समाधान की तरफ बढ़ते नहीं कदम हमारे। दिल्ली में सर्दी के शुरुआत में ही सूर्यदेव के दर्शनों को तरसते रहना तो अग्रिम चेतावनी जैसा है,बाकी तो आदतों में नहीं किया हमने सुधार तो अंजाम के बारे में कोई नहीं जानता होगा। पर्यावरण प्रदूषण को संतुलित करने में माना की काफी समय लगेगा,परंतु ध्वनि,जल सहित कई अन्य प्रदूषणों का हुक्मरान चाहे तो फटाफट निकाल सकते हैं समाधान। इच्छा शक्ति को मजबूत रखते हुए अपने पराये समान कर ठोस कार्रवाइयां किये बिन कुछ अच्छा हो नहीं पायेगा। प...
दीपावली का खुमार उतरा ही नहीं की नवम्बर के प्रथम सप्ताह में होली के हुड़दंग सहित तमाम तरह के नजारे देश में दिखने लगे हैं।  वर्तमान दौर नित रोज नए विवाद-बातें लाता है और राजनीती के गलियारों से उछलते उछलते वो आमजन की चौखट पर धड़ाम सा गिरता है।  आजादी के बाद से जो नहीं हो पाया वो सब नरेंद्र मोदी के राज में होने का आतुर लगता है।  देश की राजनीती की हालत उस बकरे समान लगती है जिसे काटने से पहले खूब खिलाया पिलाया जाता है और बाद में कई जनों में वितरित। देश में नामुमकिन को मुमकिन करते हु ए मोदी पूर्ण बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बने पर पहले ही दिन इनको विरोध करने और कई समर्थन में रहने वाले भी अभी तलक स्वीकार नहीं पा रहे। हर सरकार के मुखिया की एक कार्य शैली होती है और हिंदुस्तान में पीवी नरसिम्हा राव के बाद नरेंद्र मोदी की कार्य शैली अभी तलक लोगों की समझ से परे लगती है,शायद इनके विरोध की असल वजह भी ये हो। भाजपा के विपक्षी दलों का विरोध करना तो समझ में आता है की लगातार चिख चिल्लाहट से ही वो जनता को खुद के भी होने का अहसास कराते हैं पर घुटन भाजपा कार्यकर्ताओं की भी कम नहीं,जिसे सामने लाते...
हम किसी से कम नहीं हैं की तर्ज पर हुक्मरानों के ध्रतराष्ट्र मॉडल पर काम करना देश की तमाम समस्याओं को नई नई ऊंचाइयां का भ्र्रमण करवा ही देता है। उदारीकरण की नीतियों का हवाला देकर पोल में ढोल बज रहे हैं ? अर्थव्यवस्था का हाल देखो तो हर उत्पाद-फसल, वस्तु अपना दाम बढ़वाने की होड़ में पीछे रहने को तैयार नहीं।  उसके दाम बढ़ गए तो इसके भी अब दाम बढ़ जाने की बीमारी का प्रसार बिना रोक टोक के हो रहा है।  जबसे मनमोहनजी ने उदारीकरण का पाठ लागू किया मानो तब से ही जनता की  सांसे सांसत में अटक कर रह गई। फिर चिदंबरम जी ने मनमोहन जी की मोहक नीतियों को परवान पर ऐसा चढ़ाया की वर्तमान में जेटलीजी भी कुछ नया कर पाने की सुध बुध में नहीं रहे। आर्थिक मसलों को चलाने वाले वाहन के टायर कांग्रेस के होने से भाजपा सरकार तो सवारी समान होती जा रही है ? अब उसके पास तो इस आर्थिक नीतियों के वाहन का टायर पिंचर हो जाने पर स्टेपनी तक का सामान नहीं। अब खुद की कोई नीति ना हो तो दूजों को राहत दे पाने की मंशा भी मन की बात बनकर आई गई हो जानी होती है। अर्थशास्त्र के नियम का हमें पता नहीं पर उसमें उदारीकरण का तड़का लगाना...
जेल से भागे या भगाये गए इसकी जांच में बड़ा वक्त लग जाना,फिर भी पक्ष-विपक्ष जोरदार तमाशा बनाने में जुटा है। न्याय प्रणाली पर प्रहार करती ऐसी घटनाएं विवाद बनती हैं पर रोजाना आमजन का होता शोषण,वार-त्योंहार पर वेतन-भत्ते नहीं मिलने जैसी जग जाहिर समस्याओं की प्रताड़ना झेलते हुए जैसे तैसे मांग-मनुहार कर जी रहे लोगों को न्याय दिलाने के वास्ते सबको सांप सा सूंघ जाता है ? हाल में बीती दीपावली इस बार कुछ ख़ास लगी जब एक तरफ तो भोपाल जेल से भागे कैदियों की मौत पर हल्ला मचा,वहीं दीपावली से पहले मेहनतकशों को वेतन तलक के लाले पड़ गए पर हल्लाबाजों का मुख तलक नहीं खुला। इसी तरह खानापूर्ति के लिए आयोजित कार्यक्रमों में बढ़ चढ़कर बोलने वाले दीपावली की रात को मचे पटाखों के शोर-धुंए को रोकने के लिए नदारद दिखे और दूजे दिन से ही हो हल्ला में जुटे। कुल मिलाकर ये ही लगता है की बड़े बुजुर्गों की कही बातें आज भी सत्य हैं जब ही तो हम सांप निकलने के बाद लकीर पीटने की परिपाटी पर अड़े हैं ? किसी भी बात-करामात का तत्काल फैसला हो तो वो वहीं की वही समाप्त हो जाए,अब ऐसे में कौनसी मुश्किल-स्वार्थ आड़े आता है की हमा...