जेल से भागे या भगाये गए इसकी जांच में बड़ा वक्त लग जाना,फिर भी पक्ष-विपक्ष जोरदार तमाशा बनाने में जुटा है।
न्याय प्रणाली पर प्रहार करती ऐसी घटनाएं विवाद बनती हैं पर रोजाना आमजन का होता शोषण,वार-त्योंहार पर वेतन-भत्ते नहीं मिलने जैसी जग जाहिर समस्याओं की प्रताड़ना झेलते हुए जैसे तैसे मांग-मनुहार कर जी रहे लोगों को न्याय दिलाने के वास्ते सबको सांप सा सूंघ जाता है ?
हाल में बीती दीपावली इस बार कुछ ख़ास लगी जब एक तरफ तो भोपाल जेल से भागे कैदियों की मौत पर हल्ला मचा,वहीं दीपावली से पहले मेहनतकशों को वेतन तलक के लाले पड़ गए पर हल्लाबाजों का मुख तलक नहीं खुला। इसी तरह खानापूर्ति के लिए आयोजित कार्यक्रमों में बढ़ चढ़कर बोलने वाले दीपावली की रात को मचे पटाखों के शोर-धुंए को रोकने के लिए नदारद दिखे और दूजे दिन से ही हो हल्ला में जुटे।
कुल मिलाकर ये ही लगता है की बड़े बुजुर्गों की कही बातें आज भी सत्य हैं जब ही तो हम सांप निकलने के बाद लकीर पीटने की परिपाटी पर अड़े हैं ?किसी भी बात-करामात का तत्काल फैसला हो तो वो वहीं की वही समाप्त हो जाए,अब ऐसे में कौनसी मुश्किल-स्वार्थ आड़े आता है की हमारे देश में ऑन दाँ स्पॉट निर्णय-एक्शन लेता नहीं और किसी ने अगर कभी लिया तो उसका पोस्टमार्टम तलक कर दिया जाता है।
कानून के शिकंजे में फंसे लोगों के लिए ऊंच-नीच की बातें होती रहती हैं,लेकिन रोजाना दिहाड़ी मंजूरी करके पेट भरने वालों की खातिर बोलने के लिए जबान तलक थक जाती है ?
एनकाउंटर फर्जी था या जायज ये बातें सालों से चली आ रही हैं पर कोई सकारात्मक समाधान नहीं निकाल पाया। अगर हो हल्ला ही मचाने है तो ऐसी व्यवस्था के निर्माण के लिए हो जिससे ना तो कोई कानून से खिलवाड़ कर पाए ना ही कोई एनकाउंटर पर अंगुलियां उठे ?
आम ख़ास का अंतर समाप्त करके सबको समान तत्काल न्याय दिलाने का हल्ला मचे ,न्याय व्यवस्था से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ हल्ला मचे। कहने को तो फटाफट कह देते हैं की तमाम बातें सुनियोजित हैं पर इसके पीछे कौन रहते हैं उनको बेनकाब नहीं किया जाता। विवाद पनपाने वाले मामलों में पैरवी करने वाले वकील भारी भरकम फीस लेते हैं तो उसे अदा करने वाला या किधर की कमाई है उसके बारे में भी कोई जांच की मांगे तो करे। देश में मामूली सा केस लड़ने में लोगों को पैसा परेशानी होती है और विवादों के साये वाले मामले बड़े बड़े वकील लड़ते देखे जाते हैं।
हल्ला,आरोप-प्रत्यारोप ही लगाने का खेल खेलना हो तो सम्पूर्ण जड़ से लेकर तमाम शाखाओं पर पनपे पत्तों की भी जांचें हो जाए तो ये सच-झूठ का अंतर साफ़ नजर आने लगे।
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