खुद का धन छिपाओ दूजों का जमा करवाओ
आजकल घर,गली मोहल्ले,सड़क तलक पर रंगों के चर्चों के हल्ले मचे हैं। काला-सफेद जैसा भी हुआ धन उसके लिए बैंकों-एटीएम पर लोगों के लगते रैले हैं।
समाचार पत्र हो या चैनल सब पर कालाधन कालाधन के लिए आमजन से लेकर तथाकथित विशेषज्ञों के मेले लग रहे हैं।
बैंकों में जमा हो रहा अधिकतर आमजन-मेहनतकश का धन और हो हल्ले अब निकेलगा कालाधन के हो रहे हैं। हालात आठ-दस दिनों से दिखे उससे कहीं भी ये लगता नहीं की किसी बड़े धन्ना सेठ का धन बैंकों में अतिरिक्त जमा हुआ या किसी को सदमा पहुंचा हो।
जनजीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति का भाव देखे तो अभी तलक जिनके पास अथाह धन भंडार है उनके बैंक तलक पहुंचे या कब तलक पहुंचेगे ये बताने को कोई नहीं लगता तैयार।
सरकार के आदेश की पालना में आमजन तो जोरों से जुटा है,लेकिन कुछ ख़ास बना दिए गए गलियां निकालकर शायद आराम फरमाने के मुड़ में लगे हैं।
अब जिसके पास ना कालाधन ना ही समुचित सफेद झक धन हो तो उसका मन विचलन करता हुआ आसपास व्याप्त हालातों पर कुछ अपने सवालों का हल भी चाहेगा,ये अलग बात की स्वार्थपूर्ति की खातिर उन सवालों को चाहे लोग कर देते होंगे दरकिनार।
काला हो सफेद धन इससे बड़ी बात ये आया किसी के पास कैसे ,ऐसी नासुलझी गुत्थियां सुलझा ले हुक्मरान तो लोगों की लाइनें लगे ही ना कभी।
अभी तलक किसने कितना जमा कराया कैसे जमा हुआ के पन्ने छोड़ कुछ ख़ास वर्गों का पंचनामा करके कर दी जाए चोट तो 30 दिसम्बर से पहले ही इस नबम्बर में बैंकों पर जुटने वाली भीड़ हो जाए कम और इन ख़ास वर्गों से जमा हुआ धन ही अभी तलक जमा आमजन से काफी ज्यादा आ जाएगा।
बातें हैं बातों का क्या,कभी टैक्स लगा बातों पर तो कर देंगे कम पर नहीं लगने तलक तो सवालों के नम्बर सहित हल तलाशेंगे ही ?
सर्वप्रथम तो देश के सर्वोच्च सदन के वर्तमान-अतीत के सदस्यों के काम काज,धन की पड़ताल का कोई जज्बा दिखा दे तो इनके अधीन सारा सिस्टम ही सुधर जाए। जन प्रतिनिधियों को भारी भरकम वेतन-भत्ते जनता को सुख सुविधा की खातिर दिए जाने का हवाला दिया जाता है? फिर भी जनता का दुःख दर्द कम होने के बजाए बढ़ता ही जाता ? किसी व्यापारी-कालाबाजारी की धन सम्पदा इतनी जोर से नहीं बढ़ती जितना की किसी जन प्रतिनिधि की बढ़ती है। आमजन काम करता है और सकारात्मक परिणाम देता है तो उसको पैसा मिलता है नहीं तो काम धंधा भी ठप्प पड़ जाता है,लेकिन काम करे या नहीं जन प्रतिनिधयों का कारोबार तो सैंकड़ों फीसदी के रिकार्ड तोड़ते हुए भी फलता फूलता है। एमएलए-एमपी बनने से पहले किसी को चाय-पानी पिलाने से भी कतराते हुए खुद के खर्चे पूरे करने को भागा फिरने वाला आदरणीय भी लाभ सहित कुर्सी मिलते ही अचानक एसी मकानों-गाड़ियों का लुफ्त उठाने लगता है,पर ऐसी गिरगिट के रंग से भी ज्यादा रंग बदलने वाली स्तिथियों पर चुपी क्यों सधी साधी जाती है ये जनता समझ नहीं पाती या ये जिंदाबाद ये मुर्दाबाद के हो हल्ले करके भूल जाना चाहती है ?
अधिकतर कहते हैं की व्यापारी काला धन जमा करता है,पर उस व्यापारी ने उस धन को जमा कैसे किया कितना जतन क्या ये अनदेखा किया जाता है।
विजय माल्या भाग गया पर उसके किसी कर्मचारी ने फांकाकसी में आकर आत्महत्या की हो ये कोई बता नहीं सकता और नेताओं-सरकारी सिस्टम से त्रस्त कई लोग छोटे से धन राशि नहीं मिलने से जान गंवाते रहते हैं ,फिर भी हम जोड़ जुगाड़ से धन्ना सेठों को कोसते हुए आम जनता की दुश्वारियां बढाने वाले गैर तरीकों से धन जमा करने वाले नेताओं की जोरों से जय जयकार करते हैं ?
दिहाड़ी मजदूर की मेहनत का पूरा पैसा मेहनताना नही देने वाले को हम रोजाना रामा श्यामा करते हुए सलाम करते हैं पर कभी भी उसका बुरा हो या वो किसी को दर्द ना दे ऐसा जतन नहीं करते।
हकीकत में काला धन किसी की मजूरी मारकर,बेगारी करवाकर जमा किया हुआ है जो की कुछ उल्लेखित ख़ास वर्गों के पास ही जमा है।
बरसों तलक लोगों की गाड़ियों में जगह बनाने को जूझने वाला सरपंच,एमएलए-एमपी बनते ही खुद की गाड़ियां खरीदते नजर आते हैं,लेकिन ये पैसा आया किधर किस कोने से ये तलाशने में हमारा सिस्टम नदारद नजर आते हैं ?
समाचार पत्र हो या चैनल सब पर कालाधन कालाधन के लिए आमजन से लेकर तथाकथित विशेषज्ञों के मेले लग रहे हैं।
बैंकों में जमा हो रहा अधिकतर आमजन-मेहनतकश का धन और हो हल्ले अब निकेलगा कालाधन के हो रहे हैं। हालात आठ-दस दिनों से दिखे उससे कहीं भी ये लगता नहीं की किसी बड़े धन्ना सेठ का धन बैंकों में अतिरिक्त जमा हुआ या किसी को सदमा पहुंचा हो।
जनजीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति का भाव देखे तो अभी तलक जिनके पास अथाह धन भंडार है उनके बैंक तलक पहुंचे या कब तलक पहुंचेगे ये बताने को कोई नहीं लगता तैयार।
सरकार के आदेश की पालना में आमजन तो जोरों से जुटा है,लेकिन कुछ ख़ास बना दिए गए गलियां निकालकर शायद आराम फरमाने के मुड़ में लगे हैं।
अब जिसके पास ना कालाधन ना ही समुचित सफेद झक धन हो तो उसका मन विचलन करता हुआ आसपास व्याप्त हालातों पर कुछ अपने सवालों का हल भी चाहेगा,ये अलग बात की स्वार्थपूर्ति की खातिर उन सवालों को चाहे लोग कर देते होंगे दरकिनार।
काला हो सफेद धन इससे बड़ी बात ये आया किसी के पास कैसे ,ऐसी नासुलझी गुत्थियां सुलझा ले हुक्मरान तो लोगों की लाइनें लगे ही ना कभी।
अभी तलक किसने कितना जमा कराया कैसे जमा हुआ के पन्ने छोड़ कुछ ख़ास वर्गों का पंचनामा करके कर दी जाए चोट तो 30 दिसम्बर से पहले ही इस नबम्बर में बैंकों पर जुटने वाली भीड़ हो जाए कम और इन ख़ास वर्गों से जमा हुआ धन ही अभी तलक जमा आमजन से काफी ज्यादा आ जाएगा।
बातें हैं बातों का क्या,कभी टैक्स लगा बातों पर तो कर देंगे कम पर नहीं लगने तलक तो सवालों के नम्बर सहित हल तलाशेंगे ही ?
सर्वप्रथम तो देश के सर्वोच्च सदन के वर्तमान-अतीत के सदस्यों के काम काज,धन की पड़ताल का कोई जज्बा दिखा दे तो इनके अधीन सारा सिस्टम ही सुधर जाए। जन प्रतिनिधियों को भारी भरकम वेतन-भत्ते जनता को सुख सुविधा की खातिर दिए जाने का हवाला दिया जाता है? फिर भी जनता का दुःख दर्द कम होने के बजाए बढ़ता ही जाता ? किसी व्यापारी-कालाबाजारी की धन सम्पदा इतनी जोर से नहीं बढ़ती जितना की किसी जन प्रतिनिधि की बढ़ती है। आमजन काम करता है और सकारात्मक परिणाम देता है तो उसको पैसा मिलता है नहीं तो काम धंधा भी ठप्प पड़ जाता है,लेकिन काम करे या नहीं जन प्रतिनिधयों का कारोबार तो सैंकड़ों फीसदी के रिकार्ड तोड़ते हुए भी फलता फूलता है। एमएलए-एमपी बनने से पहले किसी को चाय-पानी पिलाने से भी कतराते हुए खुद के खर्चे पूरे करने को भागा फिरने वाला आदरणीय भी लाभ सहित कुर्सी मिलते ही अचानक एसी मकानों-गाड़ियों का लुफ्त उठाने लगता है,पर ऐसी गिरगिट के रंग से भी ज्यादा रंग बदलने वाली स्तिथियों पर चुपी क्यों सधी साधी जाती है ये जनता समझ नहीं पाती या ये जिंदाबाद ये मुर्दाबाद के हो हल्ले करके भूल जाना चाहती है ?
अधिकतर कहते हैं की व्यापारी काला धन जमा करता है,पर उस व्यापारी ने उस धन को जमा कैसे किया कितना जतन क्या ये अनदेखा किया जाता है।
विजय माल्या भाग गया पर उसके किसी कर्मचारी ने फांकाकसी में आकर आत्महत्या की हो ये कोई बता नहीं सकता और नेताओं-सरकारी सिस्टम से त्रस्त कई लोग छोटे से धन राशि नहीं मिलने से जान गंवाते रहते हैं ,फिर भी हम जोड़ जुगाड़ से धन्ना सेठों को कोसते हुए आम जनता की दुश्वारियां बढाने वाले गैर तरीकों से धन जमा करने वाले नेताओं की जोरों से जय जयकार करते हैं ?
दिहाड़ी मजदूर की मेहनत का पूरा पैसा मेहनताना नही देने वाले को हम रोजाना रामा श्यामा करते हुए सलाम करते हैं पर कभी भी उसका बुरा हो या वो किसी को दर्द ना दे ऐसा जतन नहीं करते।
हकीकत में काला धन किसी की मजूरी मारकर,बेगारी करवाकर जमा किया हुआ है जो की कुछ उल्लेखित ख़ास वर्गों के पास ही जमा है।
बरसों तलक लोगों की गाड़ियों में जगह बनाने को जूझने वाला सरपंच,एमएलए-एमपी बनते ही खुद की गाड़ियां खरीदते नजर आते हैं,लेकिन ये पैसा आया किधर किस कोने से ये तलाशने में हमारा सिस्टम नदारद नजर आते हैं ?
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