काम का मिलता नहीं जस और तोहमतें पड़ती बार बार
चालीस-पचास लाख के खर्चा करके डॉक्टर बने और उसके बाद भी लानतें बार बार किसी ना किसी डॉक्टर के भाग में आये, ये मेरे देश में आजकल बहुत देखने को मिल रहा। सरकारी अस्पतालों में भारी भीड़ का उपचार करते करते ना थकने वाले अधिकतर चिकित्सक कोई एक केस बिगड़ने पर किसी आक्रोश से घिर जाएं तो उनका सब्र कब तलक साथ देगा,ये आजकल कोई ना कह पाए। हर सिक्के के दो पहलू होते बताये जाते हैं,पर हमको तो शायद शोले फिल्म में अमिताभ बच्चन के हाथ में रहना वाला सिक्का ही भाता लगता है,जिसकी चित-पट दोनों अपने हित में रहें। आसमानी ताकतों के बाद धरती पर डॉक्टर को भगवान का दर्जा की बात बड़ी शान से हम करते रहते हैं और ये भगवान रोषित होते हैं तो बड़ा बुरा भला भी जोरों से कहते हैं। जब ऊपरवाले को किसी बाधा के लिए कसूरवार हम ठहराते तो जमीन पर भगवान का दर्जा प्राप्त इन चिकित्सकों को कसूरवार मान तत्काल न्याय पाने की जिद कैसे क्यों पकड़ते हैं ये विरोधाभासी व्यवहार समझ से परे है। सरकारी लोगों सहित परायों को कोसना सबसे सरलता भरा मार्ग बन गया है,लेकिन इसका निर्माण करने वाले सरकारी सिस्टम में व्याप्त खामियां दूर करने का ह...