बलिदानी परिवार के उत्तराधिकारी खुद को अलग करके परिवार बचाने से हिचकने लगे

हाल के विधानसभाओं के सम्पन्न चुनावों से साफ़ संकेत मिलने के बावजूद गांधी परिवार नेतृत्व छोड़ने या फिर कोई बड़ा परिवर्तन करने के बारे में अपना मंतव्य जाहिर नहीं कर रहा।
ये ही शैली कांग्रेस को गांधी परिवार की छत्र छाया से दूर करने की वजह जोरदार आने वाले समय में बन जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए। 
आजादी के बाद से देश में सबसे ज्यादा राज करने के बावजूद इंदिरा गांधी के निधन के पश्चात राजीव गांधी के जिंदा रहते ही कांग्रेस के पतन की नींव उसके ही नेताओं ने रखना शुरू कर दी। गांधी परिवार खुद के खानदानी इतिहास के सहारे उसके खिलाफ रचे जा रहे घटनाक्रमों को अनदेखा करता ही रहा और वर्तमान में हालात उसकी किसी नवांकुर पार्टी से भी बुरी हो गई है।
वर्तमान में तमाम प्रयासों के बावजूद राहुल गांधी अपनी पार्टी को सम्मान दिला नहीं पा रहे हैं और खुद भी आगे क्या करना है ये बताने के बावजूद चुपी साधे फिर से एक और चुनाव का शायद इंतजार करने में लगे हैं?
राहुल गांधी अभी भी कोई नई पहल किये बिन अपने पिटे पिटाये मोहरों के सहारे स्वयं का वजूद साबित करने में जुटे हैं और दूसरी तरफ तेजी से अपना दबदबा कायम करते जा रहे मोदी उनको उठने तलक की जमीन नहीं देने पर अड़े हैं।
आरोप प्रत्यारोपों में खुद की हार छिपा कर विपक्षी की जीत कैसे हुई ये सच्चाई अनदेखी करते जाना ही कांग्रेस की पहचान बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही।
हालात को अनदेखा करने का नतीजा ही रहा की कांग्रेस का आधार माने जाने वाला दलित वोट बैंक कब उससे किनारा कर गया ये सोचना भी कांग्रेस मुनासिब नहीं समझ रहे और मोदी को बड़बोला बताते हुए फिर से सत्ता प्राप्ति के अबूझ सपने देखते हैं।
शहरों और सवर्णों की पार कहलाते कहलाते कब कोनसे मुहुर्त से भाजपा ने कांग्रेस से गांवों सहित दलित पिछड़ों को अपनी तरफ कर लिया, इसपर भी चर्चा के बजाए तेरा मेरा के खेल में जुटे हैं।

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