बड़े दिवस आ गये पर बिन कुछ धूम धडाका किये ओपचारिकता निभा गये

दो चार दिनों में बड़े बड़े दिवस आ गये पर लगा ऐसा की बिन कुछ धूम धडाका किये ओपचारिकता निभा गये 
जंगल में मंगल का अर्थ जाने बिना कंक्रीट का राज स्थापित करने वाले वानिकी दिवस पर वन और वन्य जीवों को बचाने का बखान कर गये पर जंगली जानवर किस मुकाम पर अपना आशियाना तलाशे वेसा कोई क्या इंतजाम किया या करेंगे उस पर चुपी साध गये 
चलता पानी जिसने देखा नही कभी खुद ने सहेजा नही वो देता हे आज ज्ञान की पानी बचाओ नही तो आगामी समय में मचने वाला हे जोरदार घमासान 
उपरवाला तो खूब बरसाता हे पर जमा करता अपनी जिम्मेदारी भूल बह जाने पर करते हे नीर को मजबूर
पानी-जंगल दोनों हे इंसानी करतूतों से पीड़ित पर हल्ला मचने के बाद भी दूर दूर तलक दिखाई नही देता कोई कर्णवीर
अतिक्रमण लील गये नदी नाले तो जंगल में आग लगाकर इंसानी बस्ती बसने बसाने के खेल हे निराले
ऐसी सूरत में नाम की खातिर मनाये जाने वाले दिवस सरकारी बजट का समतलीकरण भले ही कर जाये पर जमीनी हकीकत को कभी ना बदल पाएंगे
फिर भी हे कोई ना कोई उम्मीद जो हमारे गुरुवरों की नजर से जल जंगल के भले के लिए कभी ना कभी तो होगी पूरी। 

छल के दौर में बचाने का शोर मचा है। 
आज पांचसितारा कार्यक्रमों में जल दिवस मनाकर पानी बचाने के कशीदे काढ़े जा रहे हैं। बोतलबंद और वाटर प्यूरीफायर का पानी पीने वाले आमजन को जल संकट से अवगत करवा रहे हैं। 
पानी बचाने का शोर सुनकर खुद को बचाने की जुगत में जुटा इंसान भी भर्मित है की उसे तो ये नहीं पता की कितना पानी रोज खर्च करता है। कभी कटोती होती हे तो मोल खरीदता हे। 
खर्चे का पता चले तो बचत की राह बने। 
पानी ही बचाना हे तो सारे डिब्बाबंद पानी सहित सयंत्र करने होंगे बंद। जब खुद के हाथों से खींचेगा पानी और पड़ेंगे छाले तो अपने आप ही पानी का मितव्यतता से होने लगेगा उपयोग-उपभोग।

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