खुद का खाया पिया दुःख दे तो भी दूजों का खाने के रास्ते खोजेंगे बहुत

तेरा तुझको ही अर्पण मेरा क्या लागे की सनातन बातों को दरकिनार करते हुए आजकल हर जगह बात बात का टैक्स चुपके चुपके से लागे है। 
विगत साल में मचा नोटबंदी का धमाल नए साल से ही मेहनतकशों-ईमानदारों को जबरन करने लगा है परेशान, फिर भी पीड़ितों को हक अधिकारों की दुहाई देने वालों के प्रयास कोई राहत दे जाते ये लग नहीं रहा हाल फिलहाल। 
देश में बैंकिंग सिस्टम में फंसता जा रहा है खाताधारक, पैसा जमा करवाने से लेकर निकलवाने तलक का टैक्स खुलेआम बढा रहा है दिनोंदिन मानसिक टेंशन। 
सरकार का तो हर व्यक्ति के पास हो खाता पूरा हो गया होगा भले ही,पर उस खाते को खुलवाने का हर्जाना खाताधारक को अब भुगतना पड़ रहा है।
बैंकों की और से ट्रांजैक्शन चार्ज लगाने का सिलसिला चलाया जा रहा है।
एक लिमिट के बाद एटीएम पर बेलेन्स की जानकारी लेने के रुपये काटे जाने लगे हैं। कई बैंक ११.५० से लेकर १०० रूपये काटने से भी नहीं चूक रहे। वैसे तो इस साल बैंक अपने कामकाज को व्यवस्थित तरीके से जमाते हुए अगले साल तलक के एडवांस में सेवा देने के नाम पर पैसा खूब वसूलने में जुटे लगते हैं।
बैंकों को पैसा काटना ही है तो उसके सेवा उत्पादों में किसी उपभोक्ता से भेदभाव भी नहीं किया जाए ये सुनिश्चित अभी तलक हुआ नहीं। छोटी छोटी पगार दिहाड़ी वाले लोग दो चार महीने में एक आध बार बड़ी मुश्किल से बैंक में पैसा जमा करवाने घुसते हैं और अब उनकी छोटी सी पूंजी में से भी ट्रांजैक्शन चार्ज लगाकर और छोटी करने का काम बैंक करने में जुटे हैं।
बैंकों की अंदुरुनी कहानी बड़े लोग घाटे की अजब बताते हैं, पर ये घाटे मुनाफे की सीधा साधा उपभोक्ता प्यादा कोई बनाया जा रहा ये गले से निचे नहीं उतरे। कहने को तो बड़े बुजुर्ग कहते रहते हैं की जितनी बड़ी चादर उतने ही पांव पसारो फिर ये बैंक कैसे फ़टी चादर के बावजूद अपने पांव उघाड़े उघाड़े स्थापित होते हैं।
कहने को तो बैंक गरीबों को बड़ा सहारा देते हैं, लेकिन हकीकत में औपचारिकताओं के नाम पर ऋण देने में आनाआना कानी करते हुए टरकाते हैं। इसके उलट कोई बड़ा आदमी,चालाक व्यापारी डिफाल्टर होते हुए ऋण का आवदेन करेगा तो उसकी फाइलों में इधर का पन्ना उधर करके मनमाफिक राहत देने का काम शुरू हो जाता है।
बैंकों की शिकायत भी अजीब सी लगती है, जब कोई ब्यान आता है की लोग ऋण तो लेते हैं पर चुकाते नहीं ,ये भी आधा सच आधा झूठ है। गरीब,मध्यमवर्गीय लोगों के कोई ऋण चुकाने पर बैंक के कारिंदे और रिकवरी वाले घर आने और कहीं बाहर निकलने के रास्ते तलक बंद करवा देते हैं,ऐसे हालातों में या तो मर जाओ ,या फिर जैसे तैसे लिया हुआ चुकाना ही पड़ता है। इसके विपरीत बड़े बड़े लोग नई नई कलाकारियों से बैंकों का पैसा तो हजम करते ही हैं ,उसके साथ फिर से कोई नया ऋण लेने की जुगत भी सेट कर लेते हैं।
ट्रांजैक्शन चार्ज सहित भांत भांत के चार्जेज लगाने के बजाए बैंक बड़े रसूखदारों का गला पकड़ खुद का घाटा भरे तो बैंकिंग सिस्टम से परेशान लोगों को सही मायने में कुछ तो राहत मिले।
पात्रता की गलियां चौड़ी करके पहले खाताधारकों को कुछ तो अपने सेवा उत्पादों की सौगातें तो फिर चाहे टैक्स लो। दिया कुछ नहीं,उलट हमारे दिए को ही लूट लेने का कलयुग में जतन किया।

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