कर्ता धर्ता बस नाम शोहरत के पीछे भागते रहते हैं और असमय ही लोगों की जानों पर बन आती है
ये आज के दौर की विडंबना ही मानो की कर्ता धर्ता बस नाम शोहरत के पीछे भागते रहते हैं और असमय ही लोगों की जानों पर बन आती है। एसी में बैठकर बैठकें लेते रहना ,दौरे दर दौरे करकर सब ठीक है या ठीक कर देंगे जैसे रट्टे लगाते रहना आजकल हुक्मरानों का नजरिया है।
कोई घटना हो जाए और मामला बढ़ने लगे तो एक आध तो एपीओ या निलम्बित करके जांच बैठा देना ही मानो सरकार-प्रशासन का धर्म-कर्म बन चुका है।
सरकार-नेता बड़ी बड़ी बातें कर जाती हैं लेकिन असहायों की मौतें होने पर अनजानापन दर्शाते हुए मासूम बन जाते हैं।
अचरज तो जब होता है की ऐसी घटनाएं सर्वेसर्वाओं की नाक के नीचे हो जाती है और इनको छींक तलक नहीं आती।
सत्तारूढ़ दल के प्रदेश अध्यक्ष का निर्वाचन इलाके में ये मौतें शर्मिंदा होने वाले नेता को तलाशती है लेकिन कोई नजर नहीं आता तत्काल।
मामला तूल पकड़ने लगता है तो सब आरोप-प्रत्यारोप के राशन पानी की एक दूजे पर बौछार करते नजर आ जाएंगे पर ऐसी विदारक घटना के लिए तत्काल इंतजाम नहीं किये जायेंगे, सिवा जांच के आदेश देने के।
रोना तो तब आता है जब कोई नेता जन प्रतिनिधि किसी समारोह में जाकर तो आर्थिक सहायता मंजूर करता है लेकिन असहायों के लिए तत्काल कोई राशि अपने कोटे से नहीं देता।
संसद में सांसदों के कथनों और उनकी भूमिका से तो लगता है की नियम कानून कमेटियां और सत्ता परिवर्तन के सिवा कुछ हुआ ही नहीं देश में ?
किसी भी मुद्दे पर बहस कर लेते हैं पर जवाब देखो देखेंगे और करेंगे के सिवा कुछ सुनने को नहीं मिलता।
कोई भी समस्या हो उसका तोड़ भी पूरा नहीं होता लगता।
जो भी सत्ता में रहा ,उसने पूर्ववर्ती पर विनाश का ठीकरा फोड़ दिया और हम अब करेंगे का राग अलाप दिया।
कई तो मात्र चुनावी तैयारी का ही अभ्यास करते नजर आते हैं तो कई अपना इलाका-राज्य छोड़ दूसरे की बात करने में अभ्यस्त लगते हैं।
खुद के घर की समस्या भूल पड़ौसी के दर की सुध लेने में भी बड़ा मजा आ रहा लगता है बड़े सदनों के लोगों को। एक पल में हंस देते हैं तो दूजे पल में जोरदार हंगामा भी कर देते हैं।
कोई घटना हो जाए और मामला बढ़ने लगे तो एक आध तो एपीओ या निलम्बित करके जांच बैठा देना ही मानो सरकार-प्रशासन का धर्म-कर्म बन चुका है।
सरकार-नेता बड़ी बड़ी बातें कर जाती हैं लेकिन असहायों की मौतें होने पर अनजानापन दर्शाते हुए मासूम बन जाते हैं।
अचरज तो जब होता है की ऐसी घटनाएं सर्वेसर्वाओं की नाक के नीचे हो जाती है और इनको छींक तलक नहीं आती।
सत्तारूढ़ दल के प्रदेश अध्यक्ष का निर्वाचन इलाके में ये मौतें शर्मिंदा होने वाले नेता को तलाशती है लेकिन कोई नजर नहीं आता तत्काल।
मामला तूल पकड़ने लगता है तो सब आरोप-प्रत्यारोप के राशन पानी की एक दूजे पर बौछार करते नजर आ जाएंगे पर ऐसी विदारक घटना के लिए तत्काल इंतजाम नहीं किये जायेंगे, सिवा जांच के आदेश देने के।
रोना तो तब आता है जब कोई नेता जन प्रतिनिधि किसी समारोह में जाकर तो आर्थिक सहायता मंजूर करता है लेकिन असहायों के लिए तत्काल कोई राशि अपने कोटे से नहीं देता।
संसद में सांसदों के कथनों और उनकी भूमिका से तो लगता है की नियम कानून कमेटियां और सत्ता परिवर्तन के सिवा कुछ हुआ ही नहीं देश में ?
किसी भी मुद्दे पर बहस कर लेते हैं पर जवाब देखो देखेंगे और करेंगे के सिवा कुछ सुनने को नहीं मिलता।
कोई भी समस्या हो उसका तोड़ भी पूरा नहीं होता लगता।
जो भी सत्ता में रहा ,उसने पूर्ववर्ती पर विनाश का ठीकरा फोड़ दिया और हम अब करेंगे का राग अलाप दिया।
कई तो मात्र चुनावी तैयारी का ही अभ्यास करते नजर आते हैं तो कई अपना इलाका-राज्य छोड़ दूसरे की बात करने में अभ्यस्त लगते हैं।
खुद के घर की समस्या भूल पड़ौसी के दर की सुध लेने में भी बड़ा मजा आ रहा लगता है बड़े सदनों के लोगों को। एक पल में हंस देते हैं तो दूजे पल में जोरदार हंगामा भी कर देते हैं।
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