देश में मोदी के बाद योगी, लेकिन राजस्थान में वसुंधरा राजे की रवानगी कब होगी अबूझ पहेली

देश में तो मोदी के बाद कौन की पहेली योगी ने आकर सुलझा सी दी है, लेकिन राजस्थान में वसुंधरा राजे की रवानगी कब होगी की गुत्थी एक अबूझ पहेली को दिनोंदिन बढ़ावा दिए जा रही है। 
राजस्थान में ना जाने इस बार जब से वसुंधरा राजे की सरकार बनी तब से उनके जाने और ना जाने किस किस को संभावित सीएम के रूप में आगे बढाने की खूब होड़ चली है। 
कभी वसुंधरा राजे दिल्ली चले जाए या फिर ओम माथुर राजस्थान आये तो सत्ता के बारे में चर्चाओं के चटखारों का बाजार बार बार गर्म होकर बर्फ से भी ज्यादा ठंडा होने का क्रम चलता रहता है। कोई सत्ता-संगठन की बातें करने केंद्र का नियुक्त पर्यवेक्षक आता है तो तमाम खबरची फटाफट अब वसुंधरा की सीएम से विदाई तय लगती है के सुर ताल बजा बैठते हैं,लेकिन बार बार की तरह फिर से अभी नहीं जायेगी वसुंधरा कहते हुए शायद कोई भूल सुधार की गुंजाइश भी तत्काल फैंकते हैं। 
कयासबाजियों का खेल हालातों को अनदेखा करता है, हकीकत में सत्ता का मुखिया किसी जगह कौन होगा का अंजाम अप्रत्याशित चेहरों के शीर्ष पर आने के बाद पता चलता है। 
राजस्थान में हाल फिलहाल भाजपा नेतृत्व के पास वसुंधरा जैसा कद्दावर नेता नहीं है,जो अपने पाले में बीस-तीस एमएलए भी खुलेआम दिखा सकता हो,ऐसे में सार्वजनिक तौर पर शक्ति का प्रदर्शन करवाने में माहिर वसुंधरा को भाजपा आलाकमान कैसे हटा पायेगा जैसे सवाल का जवाब भी किसी के पास नहीं लगता। 
राजनैतिक हालातों को देखें तो राज्य में एक सीट पर हो रहे उपचुनाव के नतीजे और उसके बाद में गुजरात विधानसभा के परिणामों के बाद ही शायद राजस्थान में सीएम बदलेगा। 
सीएम बदलेगा तो वसुंधरा के स्थान पर कौन आये इस पर भी किसी वर्तमान विधायक-मंत्री का दावा मजबूत नहीं किया जा सकता,क्योंकि अगर वसुंधरा जायेगी तो भी उत्तराधिकारी का चयन सहमति के बिना होने नहीं देगी। 
पीएम मोदी के कामों को देखते हुए लगता नहीं की वो किसी जनाधार विहीन नेता को राज्य में बागडोर सौंपेंगे,ऐसे में अन्य राज्यों में बने सीएम और राजस्थान में चलने वाले भावी नामों की तुलना की जाए तो भी काफी हद तलक साफ़ होता है की जिसका जनाधार किसी क्षेत्र में होगा वो ही वसुंधरा के बाद होगा। ऐसे में ओम माथुर का नाम तो केवलमात्र समर्थक होने के नाते खुद को तसल्ली देना जैसा ही है। ओम माथुर कद्दावर होने के साथ मोदी के खासमखास भले ही कहलाते होंगे पर राजस्थान में भाजपा की परम्परागत सीट से भी वो जीत पाएंगे,मुमकिन नहीं लगता। 
अभी तलक सीधे चुनाव से दूर रहे माथुर को भी ये भी भान होगा की संगठन चलाना और चुनाव लड़ाने से भी मुश्किल भरी राहें स्वयं के चुनाव लड़ने पर सामने आती हैं। 
कयासबाजियों में सब उलझे हैं तो कुछ शगूफा वसुंधरा के जाने के बाद संभावित सीएम के दावेदारों का यहां भी सुझा है। कुछ ऐसे नाम भी हैं जो मोदी की पसन्द हैं तो जनता में भी स्वीकार्य होंगे ,ऐसे में युवा नेतृत्व के तौर पर सांसद से मंत्री बने राज्यवर्धनसिंह डार्क हॉर्स ( छुपा रुस्तम ) साबित हो जाएं तो बड़ी बात नहीं। बीकानेट सांसद अर्जुन मेघवाल के हाल भी राज्य के कई जिलों में हुए दौरों ने भी कुछ अलग कहानी बनाई पर मेघवाल का नाम जाट राजपूतों दोनों से हाथ धो देने जैसा काम कर जाता भी लगता है। 
संघ और मोदी की पसंद गुलाबचंद कटारिया पर शायद वसुंधरा राजी सहमत हो जाए तो भोला सा हाल का गृहमंत्री सीएम बन जाए। 
सबसे अप्रत्याशित नाम पाली सांसद पीपी चौधरी का रहना होगा, वैसे भी कई राज्यों में जाट नेतृत्व विहीन कर दिए गए हैं तो सीरवी-जाट को सीएम बना कोई बैलेंस का काम हो जाए। 
वसुंधरा के बाद कौन की दौड़ में सबसे आगे ओम माथुर के समर्थक तो दुआ करें की अमित शाह गुजरात का सीएम नहीं बनना चाहें,ताकि संगठन में भाई साहेब के लिए कोई नया स्टॉप नहीं बने और मोदी की असीम कृपा से एक बार तो सीएम पद की शपथ जैसे तैसे ले लें।

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