समस्या समस्या ना होकर जैसे कोई सुगंधित पुष्प होती है ,जिसे अंत नहीं बढ़ावा सरकारें देती लगती हैं।
समस्या समस्या ना होकर जैसे कोई सुगंधित पुष्प होती है ,जिसे अंत नहीं बढ़ावा सरकारें देती लगती हैं।
पहले क्या हुआ क्या नहीं ये जान नहीं सकते ,लेकिन जब से किसी के आंख,कान नाक सुचारु हुए तब से उसके सम्मुख जो भी समस्या आई वो अभी तलक मुक्ति का मार्ग ही पूरा तय नहीं कर पा रही।
कश्मीर हमारा सर है फिर भी बार बार उसके माथे से लहू की धारें फूटती हैं। वर्षों से काश्मीर एक मुद्दा सा बन गया लगता है ,वहां जो होता उसका हल्ला तो जानने,ना जानने वाले सारे देश में खूब मचाते हैं। कश्मीर जैसे ही हालात कई बार देश के अन्य राज्यों में भी खूब होते रहते हैं,पर हम तो ना जाने किस सोच से चलते सोचते हैं वो अनदेखा ही किये जाते हैं।
काश्मीरी लोगों को क्या चाहिए,क्या नहीं नहीं जैसी बातें कभी हमारे सामने आ नहीं पाती और उससे पहले ही वहां के अलगाव,हुड़दंग की कहानियाँ जोरों से छा जाती हैं।
कश्मीर की समस्या जैसे बरसों पुरानी होते हुए लोगों का लहू पीने में लगी है,वैसा ही कुछ देश के कुछ राज्यों में नक्सल वादी करने में लगे हैं। समस्या देश के कानून से खिलवाड़ की है पर कश्मीरी कुछ करता है तो अधिकतर लट्ठ लेकर जैसे उनपर टूट से पड़ते हैं। वहीं नक्सलवादी जानें लेते हैं तो पक्ष-विपक्ष में लोग उनके बखूबी आते जाते हैं।
दहशतगर्द किसी एक राज्य जात धर्म पार्टी का नहीं होता ,वो तो सामूहिक कुत्सित इरादों का पाला पोषा होता है ? कानून से खिलवाड़ कश्मीर में हो या छत्तीसगढ़, बंगाल,तमिलनाडु वो तो देश की ही हिस्से में हुआ ,फिर उसके अर्थों कारणों में अंतर कैसा।
पहले तो केंद्र में अलग सरकार और राज्य में अलग सरकार का टकराव समस्या से निपटने में बाधा बन जाता होगा। अभी तो समस्याग्रस्त राज्यों और केंद्र में एक ही पार्टी की सरकार है,फिर समस्या निपटाने में कौनसा दोष आड़े रहा है,इसका कहीं कोई अतापता दूर दराज तलक नजर नहीं आता। राजनीति की बिसात एक दूजे को समस्या में घिरा देख ने को बिछाए जाए तो समस्या का अंत नहीं,वरन विकरालता की तरफ ही जाए।
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