खेतों में पांव गंदे करने नहीं,फिर भी किसानों के लिए रोना भाता खूब
किसान भूखे मर रहा है, बर्बाद हो गया जैसे ताने मारते धरना-प्रदर्शनकारी मेहनत करने वाले अन्नदाता के हितों की बातें गुमराहों में घुमाने का खेल बड़ा अच्छा रचते हैं, फिर भी हम खेल खलियानों की बिगड़ती दशा पर असल बात क्या उस पर चर्चा नहीं करते ?
महंगाई के दौर में माना की खेती अब आसान काम नहीं माना जाता , लेकिन खेत-खेती से दूरी हमने कैसे कब क्यों बना ली ये जान लें तो खेती करना कुछ तो आसान हो जाएगा ?
अर्थ युग में सुविधाओं के आश्रित ऐसे हुए की कोई मजबूरी होने पर खेत और किसानों के भले का झंडा उठाने वाले लोग कभी किसी खेत की तरफ रुख करते होंगे। आजकल आधुनिकता भरे जीवन में टाइट जींस-टीशर्ट पहनने वाला नौजवान बच्चा बूढ़ा कई एकड़ बीघा जमीन का मालिक कागजों में भले ही होगा पर किसान मुक़्क़म्मल नहीं बन पाता है।
बड़े लोग जो हल्ला किसानों के लिए मचाते हैं,उनके लिए तो खेत किसी आरामगाह जैसे होते हैं।
आगे बढ़ने की होड़ में खेती भी ठेका प्रणाली का निवाला बन चुकी और लोग ज्यादा कमाने के फेर में खेत बेच आलीशान बिल्डिंगें बनवाने में रूचि रखते हैं। किसी किसान के हाल देखो पूछो तो साफ़ नजर आएगा की वर्तमान की अधिकतर पीढ़ियां खेती करने की इच्छुक नहीं तो कोई किसान अकेला कब तलक खेती करने का हिम्मत रख पायेगा ?
आजकल के अच्छे भले लोग खेत तो दूर की बात घर के आसपास पसरे सूखे पत्तों को भी उठाने से परहेज करते हैं। खेत में नहीं जाने वाला खेती और किसान के लिए शहरों में बैठे बैठे रोना भले ही रोता होगा,लेकिन खुले में पड़ा गोबर-कचरा में स्वयं के हाथ नहीं भरता।
खेत में जाए कोई तो कांटें भरी पगडंडी पर चलना किसे कहते हैं,उसका साक्षात् दर्शन हो जाए। किस धोरे-क्यारी में धार पानी की कम ज्यादा का भान हो जाए। बूंद बूंद पानी खेती में काम आये कागजों में उकेरा हुआ ही अच्छा लगता है,हकीकत में तो दिन का आराम और रात का ख्याल मिटता सा खेतों में काम करने से दिखता है।
खेत में दो चार दिन रात बिताओ और वहां काम करके फिर किसी किसान का दुःख दर्द कैसे क्या होता है बतलाओ तो कोई वाजिब समाधान निकले।
किसान आत्महत्या करता है,ये कहना बड़ा सरल है,लेकिन उसके आत्महत्या के पीछे क्या क्या कारण रहे उनका पता लगाना हमको नहीं भाता? मेहनतकश आत्महत्या करता है तो सारे सिस्टम पर सवाल खड़ा होता,लेकिन हम तो तेरा मेरा का झंडा लिए किसी असल कारण को मार तलक नहीं पाते।
किसान के प्रति दर्द दिखाना अच्छी बात। अगर सही में किसान का भला करना हो तो करो कोई ऐसा इंतजाम की वो महंगाई,ठगी,दलाली जैसे घेरों में ना फंस पाए और जितना भी बोया-काटा उसका सही दाम मिल जाए।
किसान के पास इतनी फुरसत नहीं की वो अपना घर छोड़कर जिंदाबाद मुर्दाबाद के नारे लगाए। कभी कोई भैंस के पाड़ा हुआ कभी गाय के बछड़ा के फेर में उलझा रहता है। दिन भर खेत और मविशियों की सार संभाल में किसान का दिन गुजरता है। समय बच गया तो घर परिवार रिश्तेदारियों को टटोलने का काम करता है।
हो हल्ला करके दूर दराज बैठे किसानों की मेहनत की खिल्ली उड़ाने और उसे मजबूर बताना ना जाने कब बंद होगा। अन्नदाता हकीकत में ही भूखे मरने लगा तो देश की जनसंख्या भी एकाएक कम हो जायेगी ये भी तथ्य हम करते हैं अनदेखा।
महंगाई के दौर में माना की खेती अब आसान काम नहीं माना जाता , लेकिन खेत-खेती से दूरी हमने कैसे कब क्यों बना ली ये जान लें तो खेती करना कुछ तो आसान हो जाएगा ?
अर्थ युग में सुविधाओं के आश्रित ऐसे हुए की कोई मजबूरी होने पर खेत और किसानों के भले का झंडा उठाने वाले लोग कभी किसी खेत की तरफ रुख करते होंगे। आजकल आधुनिकता भरे जीवन में टाइट जींस-टीशर्ट पहनने वाला नौजवान बच्चा बूढ़ा कई एकड़ बीघा जमीन का मालिक कागजों में भले ही होगा पर किसान मुक़्क़म्मल नहीं बन पाता है।
बड़े लोग जो हल्ला किसानों के लिए मचाते हैं,उनके लिए तो खेत किसी आरामगाह जैसे होते हैं।
आगे बढ़ने की होड़ में खेती भी ठेका प्रणाली का निवाला बन चुकी और लोग ज्यादा कमाने के फेर में खेत बेच आलीशान बिल्डिंगें बनवाने में रूचि रखते हैं। किसी किसान के हाल देखो पूछो तो साफ़ नजर आएगा की वर्तमान की अधिकतर पीढ़ियां खेती करने की इच्छुक नहीं तो कोई किसान अकेला कब तलक खेती करने का हिम्मत रख पायेगा ?
आजकल के अच्छे भले लोग खेत तो दूर की बात घर के आसपास पसरे सूखे पत्तों को भी उठाने से परहेज करते हैं। खेत में नहीं जाने वाला खेती और किसान के लिए शहरों में बैठे बैठे रोना भले ही रोता होगा,लेकिन खुले में पड़ा गोबर-कचरा में स्वयं के हाथ नहीं भरता।
खेत में जाए कोई तो कांटें भरी पगडंडी पर चलना किसे कहते हैं,उसका साक्षात् दर्शन हो जाए। किस धोरे-क्यारी में धार पानी की कम ज्यादा का भान हो जाए। बूंद बूंद पानी खेती में काम आये कागजों में उकेरा हुआ ही अच्छा लगता है,हकीकत में तो दिन का आराम और रात का ख्याल मिटता सा खेतों में काम करने से दिखता है।
खेत में दो चार दिन रात बिताओ और वहां काम करके फिर किसी किसान का दुःख दर्द कैसे क्या होता है बतलाओ तो कोई वाजिब समाधान निकले।
किसान आत्महत्या करता है,ये कहना बड़ा सरल है,लेकिन उसके आत्महत्या के पीछे क्या क्या कारण रहे उनका पता लगाना हमको नहीं भाता? मेहनतकश आत्महत्या करता है तो सारे सिस्टम पर सवाल खड़ा होता,लेकिन हम तो तेरा मेरा का झंडा लिए किसी असल कारण को मार तलक नहीं पाते।
किसान के प्रति दर्द दिखाना अच्छी बात। अगर सही में किसान का भला करना हो तो करो कोई ऐसा इंतजाम की वो महंगाई,ठगी,दलाली जैसे घेरों में ना फंस पाए और जितना भी बोया-काटा उसका सही दाम मिल जाए।
किसान के पास इतनी फुरसत नहीं की वो अपना घर छोड़कर जिंदाबाद मुर्दाबाद के नारे लगाए। कभी कोई भैंस के पाड़ा हुआ कभी गाय के बछड़ा के फेर में उलझा रहता है। दिन भर खेत और मविशियों की सार संभाल में किसान का दिन गुजरता है। समय बच गया तो घर परिवार रिश्तेदारियों को टटोलने का काम करता है।
हो हल्ला करके दूर दराज बैठे किसानों की मेहनत की खिल्ली उड़ाने और उसे मजबूर बताना ना जाने कब बंद होगा। अन्नदाता हकीकत में ही भूखे मरने लगा तो देश की जनसंख्या भी एकाएक कम हो जायेगी ये भी तथ्य हम करते हैं अनदेखा।
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