कांग्रेसी बार बार की पराजय पर चर्चा मंथन किसी खुले स्थान पर करने के बजाए बंद कमरों में करके जलती आग में घी और डालने जैसे कामों में लगे हैं।
देश में सबसे ज्यादा सत्ता भोगने के बावजूद कांग्रेस अपने वजूद बचाने की जिद्दोजेहद में किसी चमत्कार की से बचने के भरोसे लगती है। कांग्रेस का जमीनी धरातल दिनोंदिन खिसकता ही गया पर ना तो कांग्रेस आलाकमान और ना ही इसके नेता उसे बचाने के लिए खुद पीछे हटने को तैयार होते लग रहे हैं।
शीर्ष कांग्रेस नेतृत्व की कार्यशैली के चलते आजादी के बाद से जिन जगह पर भाजपा का नामलेवा कोई नहीं होता था,उन जगह पर भी भाजपा के झंडे गड़ना आम हो चला है।
कांग्रेस अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है पर कांग्रेसी बार बार की पराजय पर चर्चा मंथन किसी खुले स्थान पर करने के बजाए बंद कमरों में करके जलती आग में घी और डालने जैसे कामों में लगे हैं।
देश तो बहुत बड़ा पर उसका एक राज्य राजस्थान में कांग्रेस की दशा से सम्पूर्ण कांग्रेस का वर्तमान हाल काम सामने आता है ?
कांग्रेस में केवलमात्र एक हाथ में सत्ता रही तब तलक विजेता रही और जैसे ही समानांतर सत्ता के कथित केंद्र रचे तब से ही पराजयों से घिरती गई। सोनिया गांधी के सर्वेसर्वा रहते ना जाने कौनसी सलाहकार मंडली ने राहुल गांधी को भी सोनिया के बराबर कांग्रेस नेतृत्व का केंद्र बना दिया और कोई सोनिया खेमा तो कोई राहुल खेमा का होने का दंभ भरते हुए एक दूजे को काट आगे बढ़ने में जुगत में जुटा रहा।
किसी वक्त कांग्रेस नेतृत्व में शीर्ष नेतृत्व एक जने के हाथ में रहता और बाकी नेता-कायकर्ता जैसा भी आलाकमान का आदेश निर्देश होता वैसा ही काम चाल चलता दिखता था। वर्तमान में शीर्ष नेतृत्व तो राहुल सोनिया दो जनों में बंटा ही,उसके अनुसार ही कांग्रेस के राज्य संगठनों में गांवों तलक में भी संगठन कई नेताओं का खेमेबाजी में विभक्त है। कोई राहुल गुट तो कोई सोनिया गुट में नजर आता हुए अपना वर्चस्व बनाने के लिए पार्टी तलक को हराने से बाज नहीं आता।
बात राजस्थान की करें तो राज्य में कांग्रेस के पास अशोक गहलोत से बड़ा नेता नहीं पर राहुल गांधी का खासमखास होने वाले नेताओं ने गहलोत को किनारा पकड़वाने का खेल रचा और कभी सीपी जोशी तो अब सचिन पायलट के खेमेबंदी में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को उलझा छोड़ा।
राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कार्यकारिणी सहित ब्लॉक स्तर पर नियुक्त पदाधिकारी केवलमात्र किसी खेमे में होने के चलते पदासीन होते लगते हैं। हालात कुछ ऐसे हैं की अगर पदाधिकारियों का लिखित परीक्षा लेकर अब तलक के प्रधानमंत्री,मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष कौन कौन रहा तो जवाब अधिकतर दे नहीं पाएंगे। किसी की नजरें इनायत होने पर कोई पहलवान बने और फिर उसे अखाड़े में उतरना पड़ता हो तो बिन ज्ञान मेहनत के कारण हार ही मिलती है,कुछ ऐसा ही राग हाल कांग्रेस कारवां का लगता है।
ज्यादातर कार्यकर्ता अतीत में दमदार रहे नेता की आमजन में चर्चा तलक नहीं करते,वो तो केवलमात्र अभी कौन भारी रहेगा उसका ही गुणगान करते नजर आते हैं ?गांव से लेकर जिला स्तर पर होने वाले कार्यक्रम केवलमात्र अपनी उपस्थिति दर्शाने तलक सिमट गए हैं और कोई समझदार कांग्रेसी किसी को हकीकत बताता है तो सबसे पहले उसी का पत्ता साफ़ करने का खेल आजकल कांग्रेस में चलता है।
अंत में कांग्रेस तब तलक ही जीतती रही जब तलक उसके अंदर सत्ता में रहने वाले और संगठन वाले अलग अलग कार्य में लगे रहे। आजकल तो संगठन वाला सत्ता प्राप्ति का लोभ नहीं छोड़ना चाहता और सत्ता से हटने वाला संगठन पर काबिज होना चाहता है।
जब तलक जमीन से जुड़े लोगों की तस्वीरों पर माल्यार्पण और यादों को उकेरा नहीं जाएगा तब तलक कांग्रेस का जीर्णोद्वार कोई नहीं कर पायेगा।
शीर्ष कांग्रेस नेतृत्व की कार्यशैली के चलते आजादी के बाद से जिन जगह पर भाजपा का नामलेवा कोई नहीं होता था,उन जगह पर भी भाजपा के झंडे गड़ना आम हो चला है।
कांग्रेस अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है पर कांग्रेसी बार बार की पराजय पर चर्चा मंथन किसी खुले स्थान पर करने के बजाए बंद कमरों में करके जलती आग में घी और डालने जैसे कामों में लगे हैं।
देश तो बहुत बड़ा पर उसका एक राज्य राजस्थान में कांग्रेस की दशा से सम्पूर्ण कांग्रेस का वर्तमान हाल काम सामने आता है ?
कांग्रेस में केवलमात्र एक हाथ में सत्ता रही तब तलक विजेता रही और जैसे ही समानांतर सत्ता के कथित केंद्र रचे तब से ही पराजयों से घिरती गई। सोनिया गांधी के सर्वेसर्वा रहते ना जाने कौनसी सलाहकार मंडली ने राहुल गांधी को भी सोनिया के बराबर कांग्रेस नेतृत्व का केंद्र बना दिया और कोई सोनिया खेमा तो कोई राहुल खेमा का होने का दंभ भरते हुए एक दूजे को काट आगे बढ़ने में जुगत में जुटा रहा।
किसी वक्त कांग्रेस नेतृत्व में शीर्ष नेतृत्व एक जने के हाथ में रहता और बाकी नेता-कायकर्ता जैसा भी आलाकमान का आदेश निर्देश होता वैसा ही काम चाल चलता दिखता था। वर्तमान में शीर्ष नेतृत्व तो राहुल सोनिया दो जनों में बंटा ही,उसके अनुसार ही कांग्रेस के राज्य संगठनों में गांवों तलक में भी संगठन कई नेताओं का खेमेबाजी में विभक्त है। कोई राहुल गुट तो कोई सोनिया गुट में नजर आता हुए अपना वर्चस्व बनाने के लिए पार्टी तलक को हराने से बाज नहीं आता।
बात राजस्थान की करें तो राज्य में कांग्रेस के पास अशोक गहलोत से बड़ा नेता नहीं पर राहुल गांधी का खासमखास होने वाले नेताओं ने गहलोत को किनारा पकड़वाने का खेल रचा और कभी सीपी जोशी तो अब सचिन पायलट के खेमेबंदी में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को उलझा छोड़ा।
राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कार्यकारिणी सहित ब्लॉक स्तर पर नियुक्त पदाधिकारी केवलमात्र किसी खेमे में होने के चलते पदासीन होते लगते हैं। हालात कुछ ऐसे हैं की अगर पदाधिकारियों का लिखित परीक्षा लेकर अब तलक के प्रधानमंत्री,मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष कौन कौन रहा तो जवाब अधिकतर दे नहीं पाएंगे। किसी की नजरें इनायत होने पर कोई पहलवान बने और फिर उसे अखाड़े में उतरना पड़ता हो तो बिन ज्ञान मेहनत के कारण हार ही मिलती है,कुछ ऐसा ही राग हाल कांग्रेस कारवां का लगता है।
ज्यादातर कार्यकर्ता अतीत में दमदार रहे नेता की आमजन में चर्चा तलक नहीं करते,वो तो केवलमात्र अभी कौन भारी रहेगा उसका ही गुणगान करते नजर आते हैं ?गांव से लेकर जिला स्तर पर होने वाले कार्यक्रम केवलमात्र अपनी उपस्थिति दर्शाने तलक सिमट गए हैं और कोई समझदार कांग्रेसी किसी को हकीकत बताता है तो सबसे पहले उसी का पत्ता साफ़ करने का खेल आजकल कांग्रेस में चलता है।
अंत में कांग्रेस तब तलक ही जीतती रही जब तलक उसके अंदर सत्ता में रहने वाले और संगठन वाले अलग अलग कार्य में लगे रहे। आजकल तो संगठन वाला सत्ता प्राप्ति का लोभ नहीं छोड़ना चाहता और सत्ता से हटने वाला संगठन पर काबिज होना चाहता है।
जब तलक जमीन से जुड़े लोगों की तस्वीरों पर माल्यार्पण और यादों को उकेरा नहीं जाएगा तब तलक कांग्रेस का जीर्णोद्वार कोई नहीं कर पायेगा।
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