स्वच्छता अभियान फिर भी कूड़े कर्कट का मंजर आम

स्वच्छता अभियान फिर भी कूड़े कर्कट का मंजर आम,ऐसे में मेरा भारत में सरकारें भारी भरकम बजट को सफाई अभियान के सहारे करने लगी है बर्बाद। देश भर को खुले में शौच मुक्त कराने के जगह जगह प्रमाणपत्र पोस्टर इत्यादियों का अम्बार लगा दिया पर अतिक्रमण हटाए बिन खुले में शौच मुक्ति का अभियान अधूरा पड़ा है। 
बड़े बड़े शहरों में बसी कच्ची बस्तियां जिनमें ना कोई सरकारी सुविधा ना ही नजर, वहां के लोग मन में आये वहीं निवृत हो आते हैं रोज। ऐसे अतिक्रमण वाले स्थानों पर ना तो कोई शौचालय है,फिर भी सरकारी कारिंदे आंखें मूंद कागज भरने में जुटे लगते हैं। स्वच्छता अभियान के लिए फोटो खिंचवाने वाले और चुनाव में वोटों का जैसे तैसे जुगाड़ बिठाने वाले नेता भी नालों उजाड़ जमीन पर अतिक्रमण करके रहने वालों को खुले में शौच से रोकने की कोई पहल करना ही शायद भूल गए लगते हैं।
खुले में शौच मुक्ति के लिए विज्ञापन से लेकर ढोल नगाड़े बजाए जा चुके हैं पर सर्वाधिक गंदगी वाले स्थानों पर ये अभियान चलाने वाले कोई सार्थक प्रयास करने में असमर्थ से नजर आते हैं।
देश के बड़े भूभाग से गुजरने वाली रेल पटरियों के आजू बाजू पर रोजाना पसरने वाली गंदगी को ही रोक पाने में सफल हो जाएं स्वच्छता अभियान वाले तो आधे से ज्यादा कचरा ही खत्म हो जाए।
रेल की पटरियां के आसपास, छोटे बड़े नालों की ओट में व्यापक पैमाने पर गंदगी फैलाने का काम रोजाना जारी रहता,लेकिन स्वच्छता अभियान और खुले में शौच मुक्त भारत का सपना ऐसी जगहों पर पहुंचने में परेशानी अनुभव करता है ?
आंखों के सामने गंदगी फैलते देखते हैं पर कोई भला बुरा ना सुना जाए,ये सोचकर चुप रहते हैं। अभियान तो बड़े स्तर पर चलते हैं पर सुविधा पर्याप्त ना होने से जैसी जगह मिली वहीं खड़े हुए और बैठे रहते दिखते हैं लोग।
यात्री सुविधाओं वाले स्टेंडों के दीवार किनारे लोगों को तो आराम मिलता है,लेकिन राहगीरों को नाक खुलना रखना बड़ा मुश्किल होता है ?
कई ग्राम पंचायतों से लेकर शहरों के वार्डों को ओडीएफ के तमगे मिल चुके पर इनके नालों नदी, किनारों से गंदगी अभी तलक नहीं हटे ?

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