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Showing posts from April, 2017

सफलता-असफलता के अर्थों में उलझे हम कूछ भी बुरा होने का दोष फटाफट दूसरे के माथे मंड देते हैं

सफलता-असफलता के अर्थों में उलझे हम कूछ भी बुरा होने का दोष फटाफट दूसरे के माथे मंड देते हे / कभी ये नही सोचते की इसमें कही न कही व्यक्तिगत दोष भी सबसे बड़ा गुनहगार हे ? खुद के मरे ही स्वर्ग मिलता हे ये सुना हे पर रविन्द्र के सुनाये किस्से ने इसे पुख्ता किया? अपनी बिगडती दशा से परेशान बाल कटिंग की दुकान चलाने वाला जब देखो भगवान को कोसता रहता की इतनी पूजा पाठ के बाद ये तूने केसा हाल किया / रोज रोज के ओल्मे मिलने से भगवान भी दुखी रहने  लगा / अब भगवान परेशान हो चला तो उसने बाल कटिंग की दुकान चलाने वाले की समस्या का निदान करने की सोची और रूप बदल कटिंग कराने पहुच गया/ भगवान बाल कटा रहे हे और काटने वाला भगवान को कोसे जा रहा हे / भगवान ने उससे पूछा की भाई तुम भगवान को इतना कोसते क्यों हो / दूकान वाला दुगने वेग से बोलने लगा की इतनी पूजा पाठ करता हु पर वो मेरी सुनता नही हे सुध नही लेता हे / ये बात सुनकर भगवान ने उसे दुकान के बाहर बेठे एक फटेहाल भिखारी दिखाया और बोले इसके बाल देखे तुमने / दुकान वाला बोला बहुत बड़े हे / भगवान ने पूछा तुमने काटे क्यों नही तो दुकानवाला बोला ये मेरे पास आया नही इस...

कर्ता धर्ता बस नाम शोहरत के पीछे भागते रहते हैं और असमय ही लोगों की जानों पर बन आती है

ये आज के दौर की विडंबना ही मानो की  कर्ता   धर्ता बस नाम शोहरत के पीछे भागते रहते हैं और असमय ही लोगों की जानों पर बन आती है।    एसी  में बैठकर बैठकें लेते रहना ,दौरे दर दौरे करकर सब ठीक है या ठीक कर देंगे जैसे रट्टे लगाते रहना आजकल हुक्मरानों का नजरिया है।  कोई घटना हो जाए और मामला बढ़ने लगे तो एक आध तो एपीओ या निलम्बित करके जांच बैठा देना ही मानो सरकार-प्रशासन का धर्म-कर्म  बन चुका है। सरकार-नेता बड़ी बड़ी बातें कर जाती हैं लेकिन असहायों की मौतें होने पर अनजानापन दर्शाते हुए मासूम बन जाते हैं। अचरज तो जब होता है की ऐसी घटनाएं सर्वेसर्वाओं की नाक के नीचे हो जाती है और इनको छींक तलक नहीं आती। सत्तारूढ़ दल के प्रदेश अध्यक्ष का निर्वाचन इलाके में ये मौतें शर्मिंदा होने वाले नेता को तलाशती है लेकिन कोई नजर नहीं आता तत्काल। मामला तूल पकड़ने लगता है तो सब आरोप-प्रत्यारोप के राशन पानी की एक दूजे पर बौछार करते नजर आ जाएंगे पर ऐसी विदारक घटना के लिए तत्काल इंतजाम नहीं किये जायेंगे, सिवा जांच के आदेश देने के। रोना तो तब आता है जब कोई नेता जन प्रतिनिधि किसी समारोह ...

समस्या समस्या ना होकर जैसे कोई सुगंधित पुष्प होती है ,जिसे अंत नहीं बढ़ावा सरकारें देती लगती हैं।

समस्या समस्या ना होकर जैसे कोई सुगंधित पुष्प होती है ,जिसे अंत नहीं बढ़ावा सरकारें देती लगती हैं। पहले क्या हुआ क्या नहीं ये जान नहीं सकते ,लेकिन जब से किसी के आंख,कान नाक सुचारु हुए तब से उसके सम्मुख जो भी समस्या आई वो अभी तलक मुक्ति का मार्ग ही पूरा तय नहीं कर पा रही। कश्मीर हमारा सर है फिर भी बार बार उसके माथे से लहू की धारें फूटती हैं। वर्षों से काश्मीर एक मुद्दा सा बन गया लगता है ,वहां जो होता उसका हल्ला तो जानने,ना जानने वाले सारे देश में खूब मचाते हैं। कश्मीर जैसे ही हालात कई बार देश के अन्य राज्यों में भी खूब होते रहते हैं,पर हम तो ना जाने किस सोच से चलते सोचते हैं वो अनदेखा ही किये जाते हैं। काश्मीरी लोगों को क्या चाहिए,क्या नहीं नहीं जैसी बातें कभी हमारे सामने आ नहीं पाती और उससे पहले ही वहां के अलगाव,हुड़दंग की कहानियाँ जोरों से छा जाती हैं। कश्मीर की समस्या जैसे बरसों पुरानी होते हुए लोगों का लहू पीने में लगी है,वैसा ही कुछ देश के कुछ राज्यों में नक्सल वादी करने में लगे हैं। समस्या देश के कानून से खिलवाड़ की है पर कश्मीरी कुछ करता है तो अधिकतर लट्ठ लेकर जैसे...

लिंग भेद का कहर पालतू पशुओं सहित इंसानी बस्ती में मातम मचाये पर हम रहें मौन

लिंग भेद का कहर पालतू पशुओं सहित इंसानी बस्ती में अनदेखे मातम की इमारत बनाने पर अड़ा हे पर हम मौन हे? गो वंश बचाने का दावा करने वाले बहुत हे तो हकीकत में काम करने वाले भी हे पर उनकी दिशा धुंधलाई सी लगती हे / गाय दूध देती हे तब तलक बहुत प्यारी लगती हे ; जेसे ही दूध देना बंद किया आँखों में खटकने लगती हे ? बछडी हो जाये तो मालिक खुश बछड़ा होते ही दुःख / बछड़ो का उपयोग हमारे बड़े बुजुर्ग अच्छे से करना जानते थे पर वर्तमान में बछड़े का उ पयोग केवल चमड़े तलक रह गया लगता हे ? पर्यावरण सरक्षंण में बछड़ो की भूमिका काया पलट जेसी हे पर मेरे देश के पर्यावरणविद्ध और गोवंश बचाने की मुहिम से जुड़े लोग ध्यान नही देते / इको फ्रेंडली वातावरण तेयार करने के लिए नई नेइ स्कीम लाते हे फिर भी सफल नही हो पाते / अगर एक प्रयास बछड़ो को यातायात साधन बनाने में किया जाये तो क्या बुरा हे / रिक्शा ऑटो रिक्शा का चलन हे तो बछडा गाड़ी चला के हो सकती हे पर्यावरण सरक्षंण की कोशिश/ इस तरह के छोटे छोटे उपायों से स्वदेशी ; आत्म निर्भरता ; गोवंश बचाने; खाद उत्पादन; पर्यावरण सरक्षंण जेसे अभियानों को मदद मिलेगी बाकी मर्जी हल्ला मचाने वाल...

निंदा दर निंदा करने की लाइलाज बीमारी ने सारा डर मिटा दिया

निंदा दर निंदा करने की लाइलाज बीमारी ने सारा डर मिटा दिया ? अब तो एक पल निंदा की दूजे पल ही घर में आई खुशियों में सारी दिक्क्तें दूर हुई।  असर जिस पर हो उसकी निंदा करते तो अच्छे लगते हैं,लेकिन बेशर्मी की हदें पार कंरने वालों की निंदा करके वक्त जाया करने से क्या हासिल होगा,ये हम समझना नहीं चाहते ? हर समस्या का दोष विरोधी पर लादने की विकृत मानसिकता पाले खुद ने क्या किया ये भी भूलने लगते हैं। घर में खुद के आग लगे तो हम तमाम साधन झट से जुटा कर राहत पाते दिखते हैं ,लेकिन किसी और क ा घर जले तो अनजान बनकर अंत में अफ़सोस ही जाहिर करने के लतियल हो चले हैं। कर्तव्य निभाते हुए शहादत देने वालों की संख्या में इजाफा होने लगा है,फिर भी हमारा नाकारापन दोषियों पर अंकुश लगा नहीं पाता। शहीद तो गौरांवित करते जा रहे हैं,पर सिस्टम शर्मिंदगी उठाते हुए कोई सुधार नहीं कर पाता है ? छोटी छोटी बातों पर किसी ना किसी का सर कलम करवाने के घोषणकर्ता भी शहीदों की शहादत पर कुछ नहीं करते। सीमा पार की दहशत और आतंक से भी हम ढंग से निपट नहीं पाएं और घर में हमारे जवानों के खून सरे आम होने लगे हैं ? अभी तो शहीदों के घरों ...

बरसों पहले बनाये गये सविंधान की कुछ बातें वर्तमान में अनावश्यक

बरसों पहले आम नागरिको के हितो के लिए बनाये गये सविंधान की कुछ बातें वर्तमान में अनावश्यक सी होती जा रही हे /  मसलन किसी पद या काम के लिए ली जाने वाली सत्य-निष्ठा की शपथ की पालना व निभाने में बड़ी मुश्किलाते होने लगी हे / मन मारकर इंसान सत्य निष्ठा की बाते करता हे मोका आते ही सेवा भाव के फेर में जल्द से भूल भी जाता हे / अगर अतिशीघ्र इसे कानूनन तरीके से लुप्त कर दिया जाए तो सिस्टम से जुड़े जिम्मेदारी लेके बेठे लोगों को बड़ी राहत मिलेगी / ऐसा करते वक्त जनता की ना सोचना क्योंकि जनहित के जितने भी दावे इरादे बनाये गये हे वो पनपने से पहले ही मुरझाते देखे जा सकते हे / विद्यालयों में या किसी काम के कागजों में वर्णित सच्चाई इमानदारी के हलफनामा से भी समय खराब व दिमाग की नसों पर असर पड़ता हे क्योंकि कोई भी काम बेईमानी की मिलावट के बिना होना देश में बड़ा मुश्किलों से भरा हे /  बच्चा जन्मे या कोई मरे , विद्यालय में प्रवेश, नोकरी की मारामारी,शादी; तलाक,बिजली-पानी की जरूरत,बैंक, सरकारी-निजी कार्यालयों व जीवन यापन से सम्बन्धित कामों में नित रोज झूठ मक्कारी को सच बनाकर काम निकाला जाता हे / अब इससे ...

भूकम्प के झटके और किसान की मौत कुम्भ के मेले में बिछड़े भाइयो जेसे

आज के हालातों में भूकम्प के झटके और किसान की मौत कुम्भ के मेले में बिछड़े भाइयो जेसे लगते हे  दोनों को ही हल्के में लिया जाता हे फिर कोई हल्ला नुक्सान होता हे तो डेमेज कंट्रोल का किसी ने किसी को जिम्मा दिया जाता हे / दोनों ही बाते होने पर किसी की मौत पर शहनाई बजाने-बजवाने जेसा मक्कारी फेरब किया जाता हे / भूकम्प के झटकों की एसी तस्वीर पेश की जाती हे जेसे थाली में रखा भोजन बिना कुछ किये सीधे मुह में पहुच जाये / घर खर्च  चलाने के झटको के मुकाबले भूकम्प के झटके तो कुछ नही फिर भी खबरनवीस इतना हल्ला मचाते हे की अब तो मानो प्रलय से कोई नही बचेगा/ दहशत इतनी की डरने के बजाये लोग फ़ोन ले के अपने मिलने वालों को अपनी तस्वीर टीवी पर आने का संदेशा हंसते हंसते सुनाते हे / बिल्डिंगो से जान बचाकर दीवारों के सहारे ऐसे खड़े होते हे की बिल्डिंग भले ही गिर जाए पर दीवार हिलेगी तक नही / सुबह आये भूकम्प की दहशत शाम तलक बरकरार रखते हे / इस दोरान भूकम्प के झटकों से केसे बचा जाए ये कोई नही बताता उल्टा डराता रहता हे / जान बचाने वाले को कहा रुकने की फुर्सत रहती हे उसे तो हकीकत में केवल भागने की लगी रहती पर ...

बुराई चाव से दुलार कर अपनाते हैं और अच्छाई को दुत्कार करके

बुराई चाव से दुलार कर अपनाते हैं और अच्छाई को दुत्कार करके अनहोनी को अपने पास बुलाकर पछताते हैं। कोई भी सामाजिक बुराई सामने आते ही संस्कार-संस्कृति को पुनः आगे बढ़ाने का हो हल्ला करके बात ठंडी होते हुए ही घिसे पिटे पुर्जों की तरह समय काटंने लगते हैं।  माना की समस्याएं गहरी हैं पर उनके जन्म की राहें भी आसपास से ही खुदी पड़ी हैं।  घर से लेकर बाजार तलक आजादी मनमानी का झुनझुना थामे हम आये दिन किसी न किसी अत्याचार-अपराध का रोजना जोरों से रोते हैं,लेकिन कुछ दुविधा बनी सुविधाएं छोड़ शांति की प्राप्ति का छोटा सा जतन नहीं कर पाते हैं।  कहने को तो कोई भी किसी को बुराई की राह पर चलने की सीख नहीं देता है,फिर भी ऐसा क्या घटता बढ़ता है जो बुराई में ही इंसान लिप्त होता जाता है। संस्कार भी ऐसे बुरे नहीं दिए जाते की कोई किसी का दुःख बढ़ाये,पर पल पल में कहीं ना कहीं दुःखदायी घटनाएं होती ही जाए है।  शेष बातें फिर कभी हाल फिलहाल देनी है उपस्थिति कहीं ?

स्वच्छता अभियान फिर भी कूड़े कर्कट का मंजर आम

स्वच्छता अभियान फिर भी कूड़े कर्कट का मंजर आम,ऐसे में मेरा भारत में सरकारें भारी भरकम बजट को सफाई अभियान के सहारे करने लगी है बर्बाद। देश भर को खुले में शौच मुक्त कराने के जगह जगह प्रमाणपत्र पोस्टर इत्यादियों का अम्बार लगा दिया पर अतिक्रमण हटाए बिन खुले में शौच मुक्ति का अभियान अधूरा पड़ा है।  बड़े बड़े शहरों में बसी कच्ची बस्तियां जिनमें ना कोई सरकारी सुविधा ना ही नजर, वहां के लोग मन में आये वहीं निवृत हो आते हैं रोज। ऐसे अतिक्रमण वाले स्थानों पर ना तो कोई शौचालय है,फिर भी सरका री कारिंदे आंखें मूंद कागज भरने में जुटे लगते हैं। स्वच्छता अभियान के लिए फोटो खिंचवाने वाले और चुनाव में वोटों का जैसे तैसे जुगाड़ बिठाने वाले नेता भी नालों उजाड़ जमीन पर अतिक्रमण करके रहने वालों को खुले में शौच से रोकने की कोई पहल करना ही शायद भूल गए लगते हैं। खुले में शौच मुक्ति के लिए विज्ञापन से लेकर ढोल नगाड़े बजाए जा चुके हैं पर सर्वाधिक गंदगी वाले स्थानों पर ये अभियान चलाने वाले कोई सार्थक प्रयास करने में असमर्थ से नजर आते हैं। देश के बड़े भूभाग से गुजरने वाली रेल पटरियों के आजू बाजू पर रोजाना पसरने वाली ग...

खेतों में पांव गंदे करने नहीं,फिर भी किसानों के लिए रोना भाता खूब

किसान भूखे मर रहा है, बर्बाद हो गया जैसे ताने मारते धरना-प्रदर्शनकारी मेहनत करने वाले अन्नदाता के हितों की बातें गुमराहों में घुमाने का खेल बड़ा अच्छा रचते हैं, फिर भी हम खेल खलियानों की बिगड़ती दशा पर असल बात क्या उस पर चर्चा नहीं करते ? महंगाई के दौर में माना की खेती अब आसान काम नहीं माना जाता , लेकिन खेत-खेती से दूरी हमने कैसे कब क्यों बना ली ये जान लें तो खेती करना कुछ तो आसान हो जाएगा ? अर्थ युग में सुविधाओं के आश्रित ऐसे हुए की कोई मजबूरी होने पर खेत और किसानों के भले का  झंडा उठाने वाले लोग कभी किसी खेत की तरफ रुख करते होंगे। आजकल आधुनिकता भरे जीवन में टाइट जींस-टीशर्ट पहनने वाला नौजवान बच्चा बूढ़ा कई एकड़ बीघा जमीन का मालिक कागजों में भले ही होगा पर किसान मुक़्क़म्मल नहीं बन पाता है। बड़े लोग जो हल्ला किसानों के लिए मचाते हैं,उनके लिए तो खेत किसी आरामगाह जैसे होते हैं। आगे बढ़ने की होड़ में खेती भी ठेका प्रणाली का निवाला बन चुकी और लोग ज्यादा कमाने के फेर में खेत बेच आलीशान बिल्डिंगें बनवाने में रूचि रखते हैं। किसी किसान के हाल देखो पूछो तो साफ़ नजर आएगा की वर्तमान की अधिकतर पीढ़ियां...

कांग्रेसी बार बार की पराजय पर चर्चा मंथन किसी खुले स्थान पर करने के बजाए बंद कमरों में करके जलती आग में घी और डालने जैसे कामों में लगे हैं।

देश में सबसे ज्यादा सत्ता भोगने के बावजूद कांग्रेस अपने वजूद बचाने की जिद्दोजेहद में किसी चमत्कार की से बचने के भरोसे लगती है। कांग्रेस का जमीनी धरातल दिनोंदिन खिसकता ही गया पर ना तो कांग्रेस आलाकमान और ना ही इसके नेता उसे बचाने के लिए खुद पीछे हटने को तैयार होते लग रहे हैं।  शीर्ष कांग्रेस नेतृत्व की कार्यशैली के चलते आजादी के बाद से जिन जगह पर भाजपा का नामलेवा कोई नहीं होता था,उन जगह पर भी भाजपा के झंडे गड़ना आम हो चला है।  कांग्रेस अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है पर कांग्रेस ी बार बार की पराजय पर चर्चा मंथन किसी खुले स्थान पर करने के बजाए बंद कमरों में करके जलती आग में घी और डालने जैसे कामों में लगे हैं। देश तो बहुत बड़ा पर उसका एक राज्य राजस्थान में कांग्रेस की दशा से सम्पूर्ण कांग्रेस का वर्तमान हाल काम सामने आता है ? कांग्रेस में केवलमात्र एक हाथ में सत्ता रही तब तलक विजेता रही और जैसे ही समानांतर सत्ता के कथित केंद्र रचे तब से ही पराजयों से घिरती गई। सोनिया गांधी के सर्वेसर्वा रहते ना जाने कौनसी सलाहकार मंडली ने राहुल गांधी को भी सोनिया के बराबर कांग्रेस नेतृत्व का केंद्र...

देश में मोदी के बाद योगी, लेकिन राजस्थान में वसुंधरा राजे की रवानगी कब होगी अबूझ पहेली

देश में तो मोदी के बाद कौन की पहेली योगी ने आकर सुलझा सी दी है, लेकिन राजस्थान में वसुंधरा राजे की रवानगी कब होगी की गुत्थी एक अबूझ पहेली को दिनोंदिन बढ़ावा दिए जा रही है।  राजस्थान में ना जाने इस बार जब से वसुंधरा राजे की सरकार बनी तब से उनके जाने और ना जाने किस किस को संभावित सीएम के रूप में आगे बढाने की खूब होड़ चली है।  कभी वसुंधरा राजे दिल्ली चले जाए या फिर ओम माथुर राजस्थान आये तो सत्ता के बारे में चर्चाओं के चटखारों का बाजार बार बार गर्म होकर बर्फ से भी ज्यादा ठंडा होने का क्रम चलता रहता है। कोई सत्ता-संगठन की बातें करने केंद्र का नियुक्त पर्यवेक्षक आता है तो तमाम खबरची फटाफट अब वसुंधरा की सीएम से विदाई तय लगती है के सुर ताल बजा बैठते हैं,लेकिन बार बार की तरह फिर से अभी नहीं जायेगी वसुंधरा कहते हुए शायद कोई भूल सुधार की गुंजाइश भी तत्काल फैंकते हैं।  कयासबाजियों का खेल हालातों को अनदेखा करता है, हकीकत में सत्ता का मुखिया किसी जगह कौन होगा का अंजाम अप्रत्याशित चेहरों के शीर्ष पर आने के बाद पता चलता है।  राजस्थान में हाल फिलहाल भाजपा नेतृत्व के पास वसुंधरा जैसा क...

लोकतंत्र भीड़तंत्र में खोता नहीं ,कहने को बहुत कुछ है पर हम आप ही सच स्वीकारने को राजी नहीं

बात बात पर धरना देने ,इस्तीफे सामूहिक सौंपने ,जनता की अदालत का मजमा लगाने के आदि हो चुके नेता ईवीएम का विरोध तो करने में लगे हैं पर चुनाव का बहिष्कार या फिर जीती सीटें छोड़कर कोई धरना प्रदर्शन आंदोलन का रास्ता अपनाने से क्यों हिचखिचा रहे हैं। पक्ष तो अपने मन की करेगा फिर विपक्षी बार बार उसके जाल में फंसने क्यों चले जा रहे हैं। हर चुनाव में मशीनरी पर पराजित दोष लगाता है फिर भी सुधार नहीं होता, इसका हल्ला मचाने से सब बचते क्यों ,सिस्टम बनाने वाले भी पक्ष विपक्ष, फिर भी असल गलती कब कैसे किससे हुई ये आमजन तलक पहुंचातें क्यों नहीं। कितने भी घोटाले हो जाए पर नेताजी के असर नहीं और कोई गरीब पकड़ा जाए तो घर बार बिक जाए।  आजादी के बाद से किसी सवाल,बात,समस्या का कोई हल निकल कर आया हो ये कहीं दिखा नहीं। एक सवाल सुलझता नहीं दूजा आता जाता है।लोकतंत्र की विश्वसनीयता का आधार धरातल है किधर अब।  अगर लोकतंत्र की विश्वसनीयता ही बची रहती तो जन प्रतिनिधि बनने वालों की संख्या ही ना बढ़ती। लोकतंत्र की विश्वनीयता बनाये रखने के लिए सत्ता या विरोधी अपने हित छोड़ना नहीं स्वीकारेंगे इस हकीकत से हम अंजान रहकर...