आंखों देखी सुहाती नहीं पराई अनदेखी खूब भाती
भाषा की बात हो या महिला-पुरुषों के रहन सहन, हक अधिकारों की बात ,इन का शोर विशेष पलों-आयोजनों पर कोई कुछ कह देता है तब ही मचता है। बाकी तो कौन क्या कहता-करता है इस पर रस्म अदायगी जैसा चलन मेरे मुल्क में आजादी के बाद से अनवरत चलता आ रहा है। हाल ही में शरद यादव और विनय कटियार के उद्गारों पर महिलाओं के प्रति सहानुभूति दिखाने वाले पक्ष-विपक्ष में बातों की नोचानोंची में जुटे हैं पर आये दिन महिलाओं से सम्बद्ध मुद्दे-बिगड़े हालातों को मिटा पाने की पहल करना भूल जाते लगते हैं ? घर, सड़क,कार्यालय इत्यादि तलक में रोजाना सभ्य-असभ्यता का चलन रहता पर जल्द से कोई टोका टोकी करने या शाबाशी देने की फुर्सत में नहीं दिखता,लेकिन नाम और नम्बर बढाने के मौकों पर बढ़ चढ़कर अपने को सबसे आगे रखता है ? खासकर वर्तमान में महिलाओं और बच्चियों को लेकर विशेष अभियान चलाये जाते हैं, शिक्षित करने की योजनाओं के अम्बार हैं,फिर भी जब चाहा महिलाओं के हालात बदतर बता दिया जाता है। चर्चा करने वाले तमाम लोगों का महिला उत्थान में योगदान तलाशा जाए तो शायद ही कोई बिरला मिलेगा जिसने किसी अंजान का कोई भला किया होगा। व...