आंखों देखी सुहाती नहीं पराई अनदेखी खूब भाती

भाषा की बात हो या महिला-पुरुषों के रहन सहन, हक अधिकारों की बात ,इन का शोर विशेष पलों-आयोजनों पर कोई कुछ कह देता है तब ही मचता है। बाकी तो कौन क्या कहता-करता है इस पर रस्म अदायगी जैसा चलन मेरे मुल्क में आजादी के बाद से अनवरत चलता आ रहा है।
हाल ही में शरद यादव और विनय कटियार के उद्गारों पर महिलाओं के प्रति सहानुभूति दिखाने वाले पक्ष-विपक्ष में बातों की नोचानोंची में जुटे हैं पर आये दिन महिलाओं से सम्बद्ध मुद्दे-बिगड़े हालातों को मिटा पाने की पहल करना भूल जाते लगते हैं ?
घर, सड़क,कार्यालय इत्यादि तलक में रोजाना सभ्य-असभ्यता का चलन रहता पर जल्द से कोई टोका टोकी करने या शाबाशी देने की फुर्सत में नहीं दिखता,लेकिन नाम और नम्बर बढाने के मौकों पर बढ़ चढ़कर अपने को सबसे आगे रखता है ?
खासकर वर्तमान में महिलाओं और बच्चियों को लेकर विशेष अभियान चलाये जाते हैं, शिक्षित करने की योजनाओं के अम्बार हैं,फिर भी जब चाहा महिलाओं के हालात बदतर बता दिया जाता है। चर्चा करने वाले तमाम लोगों का महिला उत्थान में योगदान तलाशा जाए तो शायद ही कोई बिरला मिलेगा जिसने किसी अंजान का कोई भला किया होगा।
विडम्बना है की महिला अधिकारों की मंचों से बातें तो खूब होती हैं,लेकिन वास्तविकता में उनके दुःख दर्द की कोई चलाकर सुध नहीं लेता।
देश में महिलाओं से जुड़े मामलों के द्र्श्य कैसे होंगे इसका अंदाजा किसी महिला थाने में दर्ज कोई से भी दहेज मामले से पता चल जाएगा।
आजकल पुलिस थानों में महिला डेस्क अलग से काम करती बताते हैं और मानव अधिकारों से जुड़े लोग भी बड़े सक्रिय बताये जाते हैं ,इन सबके बावजूद महिलाओं को न्याय मिलने में देरी और कई बाधाएं व्याप्त रहना समझ से परे है।
कई थानों में महिला उत्पीड़न, दहेज के मामले दर्ज होते हैं और शादी के वक्त मिला साजोसामान जब्त किया जाता है। मामला निपटने तलक उस सामान का हाल क्या कैसा होता है ये महिला अधिकारों के रक्षक जानते हुए भी अनभिज्ञ रहते लगते हैं।
दहेज का सामान थानों में जैसी जहां जगह मिली रख दिया जाता है, खुले आसमान तलक बरसों तक सामान आंधी,धूल में सनता रहता है तो बरसात में भीगता रहकर कंडम होता है। ऐसे हालातों में एक तरफ तो पीड़ित महिला को हम न्याय दिलाने का ढिंढोरा पिटे जाते हैं, दूजी तरफ उसके नाम दर्ज पूंजी को कबाड़ बनने से रोक पाने की कोई मुहिम चलाना भूल जाते हैं।
रोजमर्रा में छोटी छोटी बातों पर ध्यान दिए बिन महिला को सम्मान तो सृष्टि के रचियता भी दिला पाने में असमर्थ होंगे।
कुछ इसी तरह का हाल नगरीय परिवहन सेवाओं का है, जहां जब तलक महिला ना बोले कोई उसे उसकी आरक्षित सीट नहीं देता।
महिला अधिकारों की बात कोई राजनेता के मुख से तो कतई अच्छी नहीं लगती।
एससी एसटी ओबीसी की बात करके तो इन वर्गों को तत्काल चुनाव लड़ा दिया जाएगा पर महिलाओं को ज्यादा लड़ाने से ये नेता भी परहेज करते हैं।


नेता हो या राजनैतिक पार्टियां ,चाहे इनका सर्वे सर्वा महिला हो वो भी महिलाओं को आगे बढाने से बचता हैं, ऐसे राग-हालातों से महिलाओं का भला बातों में भले हो जाए पर हकीकत तो खुद के मरे ही स्वर्ग मिले जैसे बदलेगी।

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