निंदा दर निंदा करने की लाइलाज बीमारी ने सारा डर मिटा दिया

निंदा दर निंदा करने की लाइलाज बीमारी ने सारा डर मिटा दिया ? अब तो एक पल निंदा की दूजे पल ही घर में आई खुशियों में सारी दिक्क्तें दूर हुई। 
असर जिस पर हो उसकी निंदा करते तो अच्छे लगते हैं,लेकिन बेशर्मी की हदें पार कंरने वालों की निंदा करके वक्त जाया करने से क्या हासिल होगा,ये हम समझना नहीं चाहते ?
हर समस्या का दोष विरोधी पर लादने की विकृत मानसिकता पाले खुद ने क्या किया ये भी भूलने लगते हैं। घर में खुद के आग लगे तो हम तमाम साधन झट से जुटा कर राहत पाते दिखते हैं ,लेकिन किसी और का घर जले तो अनजान बनकर अंत में अफ़सोस ही जाहिर करने के लतियल हो चले हैं।
कर्तव्य निभाते हुए शहादत देने वालों की संख्या में इजाफा होने लगा है,फिर भी हमारा नाकारापन दोषियों पर अंकुश लगा नहीं पाता। शहीद तो गौरांवित करते जा रहे हैं,पर सिस्टम शर्मिंदगी उठाते हुए कोई सुधार नहीं कर पाता है ?
छोटी छोटी बातों पर किसी ना किसी का सर कलम करवाने के घोषणकर्ता भी शहीदों की शहादत पर कुछ नहीं करते। सीमा पार की दहशत और आतंक से भी हम ढंग से निपट नहीं पाएं और घर में हमारे जवानों के खून सरे आम होने लगे हैं ?
अभी तो शहीदों के घरों में मातम व्याप्त है और हम बेशर्मी से दिल्ली एमसीडी के चुनावों में हार जीत का गुणाभाग में जुटे हैं। नेताओं को बधाइयां देकर खुद के नंबर बढ़ाना भाता है पर शहीद के घर सांत्वना देने जाने में जोर।

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