सरकारें अपने खुद के तरीकों सेचलती हैं पर आजकल उन्हें कैसे काम करना वो चर्चाएं कुछ ज्यादा ही बेमतलब की चलती हैं

वर्तमान में देश में लग रहा है। सरकारें अपने खुद के तरीकों से चलती हैं पर आजकल कयासबाजियां लगाकर उन्हें कैसे काम करना वो चर्चाएं कुछ ज्यादा ही बेमतलब की चलती हैं
आश्चर्यजनक तरीके से मोदी की ताजपोशी हुई। उसके बाद अब क्या होगा आगे के गुणा-भाग लगने लगे। कुछ वैसे ही यूपी में अकल्पनीय योगी आदित्यनाथ सीएम बन चुके हैं और फिर से मोदी+योगी के सत्ता में रहते अब आगे क्या होगा, के गुणा-भाग उलझते जा रहे हैं। 
हिंदुत्व के सहारे आगे बढ़ने वाली भाजपा इस हिंदुत्व से भी आगे की दौड़ लगाने में जुटी है। मंजिल किधर खत्म होगी, ये बातें किसी सिरे से किसी को शायद पकड़नी नहीं।
या फिर रणनीतियां कुछ ऐसी बनाते हैं रचनाकार कि अभी क्या हुआ ? उसमें उलझते हैं सोचने वाले और ये आगे की पायदान पर चढ़ चुके होते हैं। शहरी लोगों की पार्टी गाँवों में जड़ें जमा चुकी है और सवर्णों का बोलबाला कहलवाते कहलवाते एससी वोट-बैंक कैसे अपने से भाजपा ने जोड़ा, ये भी जल्द पता नहीं चला।
कुछ ऐसा ही हाल हिन्दू मुस्लिम का पेंच फ़ँसाये हुए है। मुस्लिम वोटों को भाजपा अपनी तरफ ना कर ले , इसका अंदेशा भी खटकने लगा है।
हिन्द+ऊ =हिन्दू और हिन्दू में से उर्दू का उ हटा दें तो केवल मात्र हिन्द रहता। ऐसे में मोदी सरकार तो "सबका साथ, सबका विकास" करती लगती है। टिकट दिया नहीं और बिन चुनाव लड़े मुस्लिम को मंत्री बनाकर हिन्दू मुस्लिम करने वालों को सोच में डालना भी कोई करतब अजब है ?

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