हम किसी से कम नहीं हैं की तर्ज पर हुक्मरानों के ध्रतराष्ट्र मॉडल पर काम करना देश की तमाम समस्याओं को नई नई ऊंचाइयां का भ्र्रमण करवा ही देता है। उदारीकरण की नीतियों का हवाला देकर पोल में ढोल बज रहे हैं ?
अर्थव्यवस्था का हाल देखो तो हर उत्पाद-फसल, वस्तु अपना दाम बढ़वाने की होड़ में पीछे रहने को तैयार नहीं। 
उसके दाम बढ़ गए तो इसके भी अब दाम बढ़ जाने की बीमारी का प्रसार बिना रोक टोक के हो रहा है। 
जबसे मनमोहनजी ने उदारीकरण का पाठ लागू किया मानो तब से ही जनता की सांसे सांसत में अटक कर रह गई।
फिर चिदंबरम जी ने मनमोहन जी की मोहक नीतियों को परवान पर ऐसा चढ़ाया की वर्तमान में जेटलीजी भी कुछ नया कर पाने की सुध बुध में नहीं रहे।
आर्थिक मसलों को चलाने वाले वाहन के टायर कांग्रेस के होने से भाजपा सरकार तो सवारी समान होती जा रही है ? अब उसके पास तो इस आर्थिक नीतियों के वाहन का टायर पिंचर हो जाने पर स्टेपनी तक का सामान नहीं।
अब खुद की कोई नीति ना हो तो दूजों को राहत दे पाने की मंशा भी मन की बात बनकर आई गई हो जानी होती है।
अर्थशास्त्र के नियम का हमें पता नहीं पर उसमें उदारीकरण का तड़का लगाना उचित भी नहीं लगता।
सिस्टम के हाल इतने अच्छे होते जा रहे हैं की मुनाफाखोर ज्यादा से ज्यादा मुनाफाखोरी कर जाते हैं तब हमारे आका डेमेज कंट्रोल करने की हड़बड़ाहट में लग जाते हैं।
किसी भी उत्पाद-सामान का दाम चरम पर पहुंच जाए तो सांप निकलने के बाद उसे मारने की बजाए उसकी बनाई लकीर को पीटने की रस्म अदायगी करना प्राथमिकता हो जाता है ,पर इलाज कभी राहत भरा नहीं कर पाते।
मन में आया जब टमाटर,प्याज,दाल-चीनी के दामों में महंगाई अपना तड़का लगा देती है और जिम्मेदार लोग हल्ला मचने पर अंगड़ाई लेते हुए तमाशा खत्म होने का इन्तजार ही करते रह जाते हैं।

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