#आजादी का दिन है फिर भी मन #खिन्न है

#आजादी का दिन है फिर भी मन #खिन्न है। #मतलब परस्तों की बढ़ती तादात से अब तो कुछ अच्छा होगा की नहीं बची लगती कोई #आस
हर साल के मुखिया सिरमोरों के मुख्य भाषण से लक्ष्य पूर्ति के साल वैसे के वैसे ही अधूरे रह जाते हैं, फिर भी भाषण देने वाले और उनके समर्थक #शर्मिंदा नहीं होते ?
#लानतें तो नाकारापन के लिए बहुत जमा है पर लेने वाला लेने को तैयार नहीं ऐसे में मन मसोसकर दिन विशेष का जश्न मनाते हैं और फिर से अपने अपने गोरख धंधों में पिसते जाते हैं।
खैर ये सब तो जगजाहिर सी बातें हैं जिनको करके कुछ होना जाना नहीं।
आज तो पुरानी यादें भी बड़ी अच्छी लगती है,जबकि आधुनकिता रग रग में नासूर बनके डस चुकी है।
वर्षों पहले आजादी के तराने गूंजते थे तब राह चलते भी अपना काम धाम छोड़ देश भक्ति के रंग में स्वयं को रंगते रहे ,आजकल तो स्वतः कार्यक्रम में कोई आता नहीं और बुलावों से आने वाले हाथ घड़ी या मोबाइल में समय देख देख कार्यक्रम कब खत्म हो और कब निकले की होड़ में लगे रहते हैं।
चारदीवारों में होने वाले आयोजन सबंन्धितों तलक सिमट गए हैं और राह चलते अंदर ना घुस पाएं के पुख्ता बंदोबस्त आयोजन कर्ता आजकल करते हैं। अब तो मंच संचालक उद्धघोषक खुद तालियां जयकारे लगाकर दूजों से लगवाते हैं।
खैर इस दिन की ख़ास बात #लड्डुओं के बिन पूरी होती नहीं ,वैसे भी आजकल कितने लोग आजकल आजादी के जश्न का लड्डू खाते हैं ये भी नहीं जल्द से नजर आता है।
हकीकत में तो इस साल अभी तलक #लड्डू दाने का स्वाद भरी पोस्ट भी किसी की नजर नहीं आई। खैर मनाओ आजादी का जश्न बहु् चर्चित छुट्टी के संग और हम करते हैं दादा की लड्डू वाली पोस्ट का।

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