बरस जा अब तो बरस जा । इतना मत तरसा-तडपा

बरस जा अब तो बरस जा ।
इतना मत तरसा-तडपा। 
अब तो बरस जा का हल्ला सुन इन्द्रदेव भी अध्यधिक विचलित होकर कहाँ बरसे की सोच में पड़े ।
ये देख इंद्र के चेले चपाटी भी धरती वालों का पूरा बायोडाटा खंगालने लगे ।
इंद्र के थोड़ा सा बरसते ही चेले चपाटी उनको रोक कर बोलते राजन क्यों इन मक्कारों के लिए अपनी उर्जा व्यर्थ में बहाते हो ।
एक तो सभ्य कहलाना पसंद करने वाले को आपसे बात करनी की तमीज नहीं और दिखावा करने में भी करता हे यकीन ।
इंद्र अब ज्यादा परेशान हो के सोचने लगे तो उनकी मंडली इंसानी फितरत का ढोल पीटने लगी ।
राजन माना की धरतीपुत्र जल संकट से जूझ रहा हे पर उसकी गलती का बोझ हम क्यों उठाये । हमने तो कभी भी अपने कर्तव्य से मुहं नहीं मोड़ा । ये तो इंसान हे जो सब उजाड़ अपनी वाणी की मधुरता भी खो बेठा
अब आपको आवाज देता हे वो भी देखो केसे अब तो बरस जा। अरे सीधा कह दे इंसान अब तो बरसता रहे तो क्या गलत होता ।
ये तो घर घर आये मेहमान को बेठाए बिना उसको विदाई देने समान बोली हे।
अब इसमें इन्द्रदेव आप की क्या गलती जेसा इंसान चाहता हे वेसा ही करते हो।
उसने बोला अब तो बरस जा और आप बरस कर चलते बने ।
अब इंसान करे मान मनहार की प्रभु बरसते रहो तो बने बात पर ये इंसान तो बरसने से पहले ही रिटर्न टिकट का भी कर देता हे इंतजाम ।

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