हो हल्ले के बाद भी नहीं निकलता समाधान

वर्तमान में महिला सशक्तिकरण का आये दिन शोर मचने से तो लगता है की महिलाएं आज ये कहने की स्थिति में नहीं हैं की उनके साथ समानता, हक रोजगार जैसी कोई समस्या नहीं रही। 
आये दिन महिला उत्पीड़न,लिंग भेद,दहेज जैसी लाइलाज समस्याओं का हो हल्ला रहता है। 
कहने को तो सरकारें और नाना भांत के संग़ठन मौका मिलते ही या मौका प्रायोजित करके महिला अधिकार दिलाने का दम भरते हैं। ये दम भी कुछ दिनों बाद कहीं घूमने जैसे गुम होता नजर आता है। 
फिर से महिला लाचार बेबस बनाने का जिक्र छिड़ता है तो महिला सशक्तिकरण की कसमें इरादे मंचों सड़कों से दिखाए जाते हैं पर महिलाओं से जुडी किसी भी समस्या का निदान नहीं हो पाता है।
तरह तरह के आयोगों संगठनों के बावजूद एक ही बात बार बार दोहराया जाना कहीं कहीं उन परोकारों में ही कमियां दर्शा जाता है।
वास्तव में महिलाओं को सशक्त बनाना है तो उनके लिए रोजगार की व्यवस्था कर दे सरकार तो बाद में कुछ भी करने की जरूरत ना पड़े।
सरकारी नौकरियों में महिलाओं की उम्र की बाध्यता हटाने की आवाज उठे तो महिला आत्म विश्वास से लबरेज रहे।
महिलाओं से संबन्धित्त विभागों में केवल महिला को ही नियुक्ति देने का कानून बनाने की पैरवी करे और ऐसा कानून बने तो महिला निश्चिंत हो।
हकीकत में सरकारें और सक्षम जिम्मेदार लोग महिलाओं के हितों की बात करते हैं तो उनको अमलीजामा पहनाने से हिचके नहीं।
निकल जाए आदेश की किसी भी उम्र की महिला हो उसके रोजगार की गारंटी है। महिलाओं से संबंध विभागों में केवल मात्र महिला की ही नियुक्तियां होगी।
बस हो या रेल महिला आरक्षण सीट चाहे ख़ाली जाए पर उस पर महिला के सिवा कोई ना बैठेगा।
नियम बने तो ऐसे की महिला अपने आश्रितों को संभाल सके ना की कोई समस्या आने पर वो किसी पर आश्रित रहे।
तत्काल राहत मिले ऐसे काम करे सरकारें तो महिला का भला हो नहीं तो दहेज प्रकरणों जैसे ही अदालतों में महिला सशक्तिकरण के मामले चिढ़ाते रहेंगे।
जब बंदर बांट हो ही रही है तो मात्र शक्ति को ज्यादा से ज्यादा दिया ताकि आने वाली पीढ़ी को तो कोई नया रास्ता मिले।

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