एनकाउंटर पर बवाल मचता है, लेकिन अवाम की सुख शान्ति की शायद कोई चिंता नहीं लगती।

एनकाउंटर पर बवाल मचता है, लेकिन अपराधी-भगोड़े को देखते मार देना न्यायोचित ही लगता है। वैसे भी अदालतों में मुकदमों के अम्बार लगे हैं,एक आरोप पर फैसला हो नहीं पाता उससे पहले ही दस आरोपी और बढ़ जाते हैं। ऐसा ही चलता रहना अवाम की सुख शान्ति को लीलता रहता पर किसी को शायद कोई चिंता नहीं लगती।
देश में कानून व्यवस्था बनाये रखने की खातिर ही बनाये गए हैं, लेकिन जब इनका ही कोई मजाक उड़ाए और तोड़े तो ये राजद्रोह समान हो जाता है। आरोपी या अपराधियों के कानून तोड़ने से बनी स्तिथियां में उनको तत्काल दंड दिया जाना ही सर्वश्रेष्ठ है,ताकि भविष्य में कोई भी कानून तोड़ने से डरे।
भगोड़े का अंत होने से अच्छा कुछ हो नहीं सकता क्योंकि ये भगोड़े देश को बहुत नुक्सान देते रहे हैं।
एनकाउंटर पर विवाद होते हैं और मृतक को पीड़ित साबित करने के प्रयास, ये सब मेरे हिंदुस्तान में पक्ष-विपक्ष का पुराना राग-बिमारी है जिसका भी समुचित उपचार होना चाहिए।
वर्तमान दौर कुछ ऐसा हो चला है की कोई भी स्वार्थ पूर्ति के लिए अपने कदम आगे पीछे करेगा और ये तो जेल से भागने और सुरक्षाकर्मी की हत्या करने का जघन्य अपराध है ,ऐसे में हत्या के आरोपी को मार दिया तो क्या बिगड़ गया ,उल्टा ऐसे भगोड़ों के एनकाउंटर से कोई और मौत तो होने से बची।
ऐसे मामलों पर हो हल्ला करने के बजाए त्वरित गति से अदालतों में फैसला होने की व्यवस्थाएं बनाये जाने की मुहिम चले तो आमजन को राहत मिले। अदालत में कोई सा भी मामला हो उसका निपटारा एक तय समय सीमा में किया जाना सुनिष्चित करवाने के काम हो तो कोई बात बने।
रक्षा-देश विरोधी गतिविधियों के आरोपों से घिरे लोगों के खिलाफ अदालत जल्द से जल्द फैसले सुनाये और उनकी तरफदारी करने वालों को भी लपेटे तो कानून को ठेंगा दिखाने वालों की संख्या कम होने की राह बने।
देश के नागरिक को ही जेल में रखे और सीमा पार से आये लोगों को तत्काल बेदखल करे तो लोकतंत्र की चूलें हिले नहीं।
कहने को तो सबके लिए कानून है पर मेरे देश में नेताओं की नेतागिरी के चलते शक्ल देख के तिलक करने जैसा हाल है। देश का नागरिक एक वकील करने में असहाय सा लगता है,लेकिन गम्भीर आरोपों से घिरे लोगों के लिए बड़े बड़े वकील खड़े नजर आते हैं।
एनकाउंटर से तो साल में एक आध बार ही किसी की मौत होती है, उसके विपरीत न्याय नहीं मिलने या देरी से मिलने की वजह से थानों-अदालतों में नित रोज इंसानों की भीड़ बढ़ती हुई प्रताड़ना झेलती है। लोगों को अपने धन-सम्पति,मान-सम्मान के लिए अदालतों,थानों,सरकारी कार्यालयों में चक्कर पर चक्कर लगाते देखा जाता है.फिर भी ऐसी समस्याओं का पूर्णतया खात्मा करने के बजाए हमारे पक्ष-विपक्ष गम्भीर अपराधों-आरोपों से घिरे लोगों पर चर्चा करके ना जाने क्या पाने की जिद पर अड़ते हैं।
अब तो अदालतें ही कोई कठोर कदम उठाये ताकि उसके निर्णयों को तोड़ने वालों पर अंकुश लग सके।
अदालत में मामला चल रहा और उस दौरान कोई कानून तोड़ता है तो अदालत उसे पूर्ण दोषी मान उसका मामला किसी भी जगह ना चल पाए तो कानून से खिलवाड़ करने वालों को सबक मिले।

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