ओलम्पिक गया तो रात गई बात गई जैसी ही उसकी चमक और हमारी तैयारी अनदेखी हो गई। ऐसे हालातों में अगले ओलम्पिक का करो इन्तजार और उसमें कैसा रहे प्रदर्शन उसका ना करेगा कोई ख्याल,बस है तोबा मचाने का होता रहे आयोजन के वक्त धमाल?
ओलम्पिक में अभी तलक पदक नहीं मिला, ये जुमला-यादें हर ओलम्पिक के वक्त दोहराई जाती है। 
खेलों-खिलाडियों के प्रति हमारी भावनाएं रात बीती बात बीती से भी गई गुजरी सी लगती है। 
विदेशी खिलाडी से हमारे खिलाड़ियों की तुलना करके हम उम्मीदें तो बड़ी-बड़ी बांधते हैं पर धरातल पर खिलाड़ियों को प्रोत्साहन कितना देते हैं ये चर्चा करना ही नहीं चाहते हैं ?
हमारे खिलाड़ियों की उम्र से आधे उम्र का विदेशी खिलाड़ी पदकों के ढेर लगाता है तो केवल मात्र खिलाड़ी की कमी तो हम देख लेते हैं,पर उस विदेशी और हमारे बीच की आधारभूत सुविधाओं का आंकलन निष्पक्ष तरीके से हम करते ही नहीं।
हमारे ओलम्पिक में पिछड़ने का सबसे बड़ा कारण हमारे खिलाडियों में भविष्य को लेकर व्याप्त असुरक्षा है। खिलाड़ी अपने जीवनयापन की दौड़ में ऐसा उलझता है की वो अपना अधिकतर बल उसी की चिंता में खत्म कर देता है। इसी असुरक्षा के कारण हमारे खिलाडी प्रथम चरण की बाधाएं पार पार करते अंतिम चरण में थक से जाते हैं।
खेलों में प्रभुत्व बचपन से भविष्य को संवारने की चिंता में ही खो देते हैं तो किसी बड़ी प्रतियोगिता में पदक आएगा या नहीं ये अंतिम समय तलक सोचते हैं।
स्कूल-घरों में खेलों को बहुत कम लोग वरीयता देते हैं और बच्चों को पढो-लिखो में लगाए रखते हैं। खिलाड़ी को तो खेल से मतलब होता और हम खिलाड़ी-कम पढाकू ज्यादा बनाने में बच्चों को रूचि रखते हैं।
कहने को तो स्पोर्टस होस्टल्स खुले हुए हैं पर उनमें भी खेल के संग पढ़ाई का बोझ खिलाड़ी सम्पूर्ण बने कोई बच्चा उसके आड़ा आता है।
कहने को तो बहुत कुछ है पर खिलाड़ी के बचपन की जरूरतों की चर्चा से ही हमारे खेल-खिलाड़ी को हम कितने प्राथमिकता देते हैं साफ़ हो जाएगा।
बचपन में स्कूली गेम्स से लेकर कॉलेज स्तर का खिलाड़ी अपर्याप्त खुराक लेकर राष्ट्रीय टीम का झंडा उठाता है। ये ही बचपन की रही खुराक बड़े स्तर पर शरीर पर हावी होकर खिलाड़ी की राहों में बाधा उत्प्पन करती है।
किसी भी खिलाडी को रोज के चार-पांच घन्टे कम से कम अभ्यास के लिए चाहिए,लेकिन हमारा ख़िलाड़ी कॉपी-किताबों का बस्ता लिए खेल खेलने में लगा देखा जा सकता है।
खिलाड़ी को कम से कम एक किलो दूध-आधा किलो केला रोज की खुराक चाहिए,लेकिन हमारे अधिकतर खिलाड़ियों के परिजन घर खर्च चलाने की कसमकश में उलझे से रहते हैं।
खेलों में अगर परचम लहराना है तो तमाम खेलों के खिलाड़ियों को उनके भविष्य के प्रति आश्वश्त और सहारा देने का काम करना होगा। चाहे खिलाड़ी हारे जीते उसके जीवन यापन की व्यवस्थाएं करनी होगी। अगर खिलाड़ियों को खान-पान रहन सहन की सारी सुविधाएं देंगे हमारी उम्मीदों का बोझ उठा पाएंगे। 

पदक जीतने के बाद नोकरी देने की मानसिकता बदलकर खेलने की शुरुआत से ही उसे सहारा देने की नीति बने तो ये अंतिम समय तलक चलने वाला पदकों की आस का अकाल खिलाड़ी सुकाल-खुशहाली में बदल पाएंगे।

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