इतिहास पुनर्लेखन का दौर-शोर भाजपा सरकार बनने के बाद से जोरों पर है?
जो कुछ अभी तक पढ़ा-लिखा उसमें से कुछ झूठा मानकर हटा दिया तो कुछ ना सुना-पढ़ा उसे सच मानते हुए पाठ्यक्रमों का हिस्सा बना डाला।
इतिहास लिखने का ये सिलसिला ऐसा लगता है की आने वाले समय में जिसकी होगी सरकार वो चलाएगा अपना पाठ्यक्रम ? सत्ता परिवर्तन के साथ होता रहेगा पन्नों में नाम परिवर्तन ?
क्या सच है क्या झूठ उसको छोड़कर अभी तलक लगाए रट्टों को इतिहास का पुनर्लेखन करने वाले भुलाने की हलचल में लगे हैं।
ना जाने इतिहास में ऐसा क्या हुआ जो किताबें पढ़ते पढ़ते ये सवाल भी खड़े करता है की जो जान रहे हैं ,उसके पीछे के पन्ने तो लिखे ही नहीं गए और कहीं लिख दिए तो इस तरह से की वो पन्ना दबा दबा सा लगता है।
कुछ सवाल तो सदा जेहन में आते रहते हैं पर उनका जवाब कोई पाठ्यक्रम में नहीं मिलता और लोकतंत्र में सरकारी ठप्पा लगे बिना कोई बात सच्ची नहीं ?
शिक्षा के पाठ्यक्रमों में निष्पक्षता से इतिहास का समावेश होता तो शायद वर्तमान में गड़े मुर्दे का पुनः पोस्टमार्टम करके एफआर लगाने की नौबत ना आती ?
हिन्दुस्तान का इतिहास राजस्थान के बिना अधूरा है ,ये हकीकत है पर उसका पड़ौसी राज्य हरियाणा भी एक समृद्ध प्रदेश है ,जिसके इतिहास से हम बहुत अंजान हैं।
ऐसी ही बातें जिनका जवाब शायद ही मिले ,उनकी तरफ इतिहास में रूचि या लेखक मार्गदर्शन करें तो किसी विशेष प्रयोजन ,विचारधारा से लिखे जाने वाले किस्सों पर कुछ अंकुश तो लगे।
आजादी से पहले की हकीकत सामने आने पर तो लोकतंत्र के रहनुमा बने लोग ही वर्तमान हालातों के जिम्मेदार लगेंगे ये तय है।
1 -सब विवकानंदजी की जयन्ती मनाते हैं उनके आदर्शों को अपनाने पर जोर देंगे पर खेतड़ी के राजा को एक फूल तक अर्पित नहीं करते ?
2-दयानन्द सरस्वती के नाम से कई शिक्षण संस्थाएं बनती हैं पर उनका सहयोग करने वालों को पाठ्यक्रमों में स्थान नहीं ?
3-बनारस सहित देश के कई हिस्सों में स्वेच्छा से अपना धन-धरा लगाकर जनहित के लिए इमारतें बनवाने वालों का जिक्र तक नहीं होता ?
4-आजादी से पहले क्या हुआ उसका प्रत्य्क्षदर्शी तो कोई नजर जल्द से आएगा नहीं पर आजाद देश में भी कई घटनाक्रम हुए ,उनके तो कई चश्मदीद मिलेंगे ,फिर भी हकीकत नहीं आती ?
5-आपातकाल लगा ,भूस्वामी आंदोलन सहित बहुत कुछ लोगों ने भुगता पर इनके नायक खलनायक सरकारों के बनने-बिगड़ने के अनुसार परिवर्तनशील रहे?
6-वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने तो कई किस्से हुए ,ज्योति बसु उस वक्त को अपनी बड़ी भूल बता गए तो हरियाणा के चौधरी देवीलाल का क्या रोल रहा ये किताबी पाठ्यक्रम से छूट गया ?
7-कांग्रेस के हाथों से सत्ता गई तो विरोधी अपनी पीठ थपथपा कर शाबाशी लेने लगे, इसके पीछे खुद गांधी परिवार को कोसकर तत्कालीन तथ्यों की अनदेखी ?
पीवी नरसिम्हाराव (मौनी बाबा) का पीएम बनना और रेल मंत्रालय बरसों तलक कांग्रेस के हाथों से दूर रहना कांग्रेस को पतन की तरफ ले गया ,ऐसे तथ्यों की तरफ कोई पाठ्यक्रम नहीं ले जाता ?
हिन्दू-मुस्लिम वोटों का तिलिस्म नरसिम्हाराव के कार्यकाल में अयोध्या घटना से टूट गया पर ये भी भूलाने में नेता लगे ?
8-स्वतंत्र, रामराज्य,जनसंघ,जनता, भाजपा में आते आते नेता अपने जीवनदाताओं को भुला बैठे ?
राजस्थान में दांता ठाकुर मदनसिंहजी को भाजपाई भूल बैठे ?
9-आजादी के बाद से अभी तलक जो परिवर्तन हुए उनके कारण-प्रभाव का सच सामने लाने से क्या डर ये भी बड़ा झमेला लगता है ?
देवभूमि उत्तराखंड के टिहरी, नैनीताल ,देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, चमोल, नरेन्द्रनगर सहित कण-कण में इतिहास फिर भी अंजान ?
जो कुछ अभी तक पढ़ा-लिखा उसमें से कुछ झूठा मानकर हटा दिया तो कुछ ना सुना-पढ़ा उसे सच मानते हुए पाठ्यक्रमों का हिस्सा बना डाला।
इतिहास लिखने का ये सिलसिला ऐसा लगता है की आने वाले समय में जिसकी होगी सरकार वो चलाएगा अपना पाठ्यक्रम ? सत्ता परिवर्तन के साथ होता रहेगा पन्नों में नाम परिवर्तन ?
क्या सच है क्या झूठ उसको छोड़कर अभी तलक लगाए रट्टों को इतिहास का पुनर्लेखन करने वाले भुलाने की हलचल में लगे हैं।
ना जाने इतिहास में ऐसा क्या हुआ जो किताबें पढ़ते पढ़ते ये सवाल भी खड़े करता है की जो जान रहे हैं ,उसके पीछे के पन्ने तो लिखे ही नहीं गए और कहीं लिख दिए तो इस तरह से की वो पन्ना दबा दबा सा लगता है।
कुछ सवाल तो सदा जेहन में आते रहते हैं पर उनका जवाब कोई पाठ्यक्रम में नहीं मिलता और लोकतंत्र में सरकारी ठप्पा लगे बिना कोई बात सच्ची नहीं ?
शिक्षा के पाठ्यक्रमों में निष्पक्षता से इतिहास का समावेश होता तो शायद वर्तमान में गड़े मुर्दे का पुनः पोस्टमार्टम करके एफआर लगाने की नौबत ना आती ?
हिन्दुस्तान का इतिहास राजस्थान के बिना अधूरा है ,ये हकीकत है पर उसका पड़ौसी राज्य हरियाणा भी एक समृद्ध प्रदेश है ,जिसके इतिहास से हम बहुत अंजान हैं।
ऐसी ही बातें जिनका जवाब शायद ही मिले ,उनकी तरफ इतिहास में रूचि या लेखक मार्गदर्शन करें तो किसी विशेष प्रयोजन ,विचारधारा से लिखे जाने वाले किस्सों पर कुछ अंकुश तो लगे।
आजादी से पहले की हकीकत सामने आने पर तो लोकतंत्र के रहनुमा बने लोग ही वर्तमान हालातों के जिम्मेदार लगेंगे ये तय है।
1 -सब विवकानंदजी की जयन्ती मनाते हैं उनके आदर्शों को अपनाने पर जोर देंगे पर खेतड़ी के राजा को एक फूल तक अर्पित नहीं करते ?
2-दयानन्द सरस्वती के नाम से कई शिक्षण संस्थाएं बनती हैं पर उनका सहयोग करने वालों को पाठ्यक्रमों में स्थान नहीं ?
3-बनारस सहित देश के कई हिस्सों में स्वेच्छा से अपना धन-धरा लगाकर जनहित के लिए इमारतें बनवाने वालों का जिक्र तक नहीं होता ?
4-आजादी से पहले क्या हुआ उसका प्रत्य्क्षदर्शी तो कोई नजर जल्द से आएगा नहीं पर आजाद देश में भी कई घटनाक्रम हुए ,उनके तो कई चश्मदीद मिलेंगे ,फिर भी हकीकत नहीं आती ?
5-आपातकाल लगा ,भूस्वामी आंदोलन सहित बहुत कुछ लोगों ने भुगता पर इनके नायक खलनायक सरकारों के बनने-बिगड़ने के अनुसार परिवर्तनशील रहे?
6-वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने तो कई किस्से हुए ,ज्योति बसु उस वक्त को अपनी बड़ी भूल बता गए तो हरियाणा के चौधरी देवीलाल का क्या रोल रहा ये किताबी पाठ्यक्रम से छूट गया ?
7-कांग्रेस के हाथों से सत्ता गई तो विरोधी अपनी पीठ थपथपा कर शाबाशी लेने लगे, इसके पीछे खुद गांधी परिवार को कोसकर तत्कालीन तथ्यों की अनदेखी ?
पीवी नरसिम्हाराव (मौनी बाबा) का पीएम बनना और रेल मंत्रालय बरसों तलक कांग्रेस के हाथों से दूर रहना कांग्रेस को पतन की तरफ ले गया ,ऐसे तथ्यों की तरफ कोई पाठ्यक्रम नहीं ले जाता ?
हिन्दू-मुस्लिम वोटों का तिलिस्म नरसिम्हाराव के कार्यकाल में अयोध्या घटना से टूट गया पर ये भी भूलाने में नेता लगे ?
8-स्वतंत्र, रामराज्य,जनसंघ,जनता, भाजपा में आते आते नेता अपने जीवनदाताओं को भुला बैठे ?
राजस्थान में दांता ठाकुर मदनसिंहजी को भाजपाई भूल बैठे ?
9-आजादी के बाद से अभी तलक जो परिवर्तन हुए उनके कारण-प्रभाव का सच सामने लाने से क्या डर ये भी बड़ा झमेला लगता है ?
देवभूमि उत्तराखंड के टिहरी, नैनीताल ,देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, चमोल, नरेन्द्रनगर सहित कण-कण में इतिहास फिर भी अंजान ?
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