देश का भविष्य युवाओं के हाथों में सुरक्षित है, ये कहने-सुनने में बड़ा अच्छा लगता है ,वहीं जब इन्हीं युवाओं को खुद के भविष्य के प्रति असुरक्षित देखकर सब ख़्वाब डरावने से लगते हैं। देश में युवाओं को जोशीला,बुद्धिमान,प्रगति का कारक सहित तमाम विकास के लिए सहायक उपमाओं से नवाजा जाता है फिर भी युवा वर्ग आक्रोशित होते हुए दिग्भर्मित ज्यादा नजर आता है।
किसी भी सिस्टम की रीढ़ युवा ही होता है, लेकिन ये युवा वर्तमान में टूटा टूटा सा लगता है। सरकारी सहित हमारे जीवन में व्याप्त तमाम सिस्टमों में युवाओं को वरीयताएं देने की बातें होते रहने के बावजूद युवाओं का बार बार विरोधी रवैया अख्तियार करना युवा वर्ग के असंतोष को उजागर-जाहिर करता रहता है। 
युवाओं के अनवरत प्रतिरोध के रास्ते पर चलने की वजहें या तो हम दूर ही नहीं करना चाहते या डरते हैं की युवाओं को उनका मुकाम मिल गया तो बाकी वर्गों को अपने स्थान से हाथ धोना पड़ेगा ? 
सामाजिक परिवेश----प्राचीन काल से युवा अपने मन में अपने अधिकार-हक प्राप्ति के लिए संघर्ष करते हुए वर्तमान में पहुंचा और ये बात उसको कुंठा की राह पर चलने का कारण बनती गई। महाभारत काल में एकलव्य का अंगूठा काटकर गुरु को अर्पित करने की घटना ने गुरु दक्षिणा का महत्व तो कायम किया पर उससे ज्यादा प्रतिभावान से भेदभाव करने की सोच का बीजारोपण किया। आज भी प्रतिभावान चेहते के फेर में ढेर होता जाता है। वहीं अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए कर्ण के खिलाफ रचे चक्र ने भी वर्तमान में आते आते जुगाड़ प्रवृति को सिर माथे चढ़ा दिया। 
आजादी का संघर्ष हुआ तो महात्मा गांधी सहित बड़े नामों के नीचे चन्द्रशेखर आजाद,भगतसिंह ,बिस्मिल जैसे युवाओं का योगदान कम करके दिखाने का खेल चला। हर परिवर्तन-क्रांति में युवाओं को अपराजित हथियार की तरह इस्तेमाल तो किया जाता रहा पर उसे उस परिवर्तन-क्रांति के बाद पनपे सिस्टम से दरकिनार किया जाता रहा।
साल सतहतर का दौर भी युवाओं के नाम रहा, जब जेपी आंदोलन में युवा ने अपनी भूमिका से अविष्वसनीय सत्ता परिवर्तन कराया ,लेकिन चंद जगहों को छोड़कर कहीं पर भी युवाओं को सत्ता में भागीदार नहीं बनाया। हालिया सालों में देश में हुए सत्ता परिवर्तन की बात करें तो युवाओं के दम पर सरकारें बनी पर ,कहीं भी युवा वर्ग को राहत मिले ,ऐसी शुरुआत होती नजर नहीं आई।
शिक्षा पूरी करने के तलक बड़े बड़े सपने पाले युवा रोजगार की तलाश में निकलता है तो सिमित दायरे में सिमटे अवसरों में वो बेरोजगारों की भीड़ में खड़ा खुद को पाता है।
बचपन से जवानी तलक अच्छे जीवन यापन करने की उम्मीदों पर काम धंधा नहीं मिलने से तुषारापात बार बार होता है। टोटली मुनाफे का जरिया बन चुकी शिक्षा प्रणाली आज के युवा को ना घर का ना किसी घाट पर आसरा लेने लायक छोड़ रही है। चकाचौंध की होड़ में प्रथम कक्षा से लेकर सम्पूर्ण पढ़ाई मानो भेड़ चाल होती जा रही है। 
पचास-सौ किलोमीटर में पग पग पर खुले संस्थानों में अपार डिग्री-डिप्लोमा धारी हर साल निकलते हैं पर उनके लिए रोजगार के साधन-द्वार ऊंट के मुंह में जीरा समान साबित होते हैं। तमाम तरह के तानों,मुश्किलों से जूझते हुए कोई अपनी पढ़ाई इस आस में पूरी करता है की कभी तो सफलता मिलेगी पर बेकारी की गलियों में खड़ा होकर ठगा जाने के सिवा उसको कुछ महसूस नहीं होता। 
एक युवा को कोई अच्छा पैकेज देता है,उस बात को भुनाकर असंख्य युवाओं को भर्मित्त करने का खेल अनवरत चलता है। 
सत्ता प्राप्ति के लिए युवाओं को सब्जबाग दिखाकर सहयोगी बना तो लिए जाता है पर उनको सर्वोच्च पदों पर बैठाने से परहेज किया जाता है।

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