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#पदमावती के बारे में वे क्या जाने जो धूप-छाया से समय जानना भूल गए

# पदमावती  फिल्म से उपजा विवाद अतीत की अच्छाइयों को भूला देने का नतीजा है। धर्म-कर्म से बड़ी कोई शक्ति नहीं ये सीख मेवाड़ के घर-घर में आज भी दी जाती है। ऐसे में हकीकत को नकार किसी के वजूद को हिलाने का गुस्सा जौहर स्थल सहित चारों तरफ दिखा है।  शासक कोई भी हो वो अपने निशान छोड़ता है और ऐसे इंतजाम करता रहा की आने वक्त में भी उसका वजूद रहा ये लोग जाने। सब तरफ से निराशा हावी होने पर चिकित्कीय उपचार लेते हुए देव*देवियों,पितर थान,स्थानों पर पीड़ित कोई राहत पाने के लिए नतमस्तक हुआ दिखता,फि र भी कुछ आधुनिक बातों वाले ऐसा कुछ नहीं को ढोंग रचते हैं। कोई भी एक नजर नहीं आता जो टीका टोपी से दूर रहता होगा फिर भी अतीत में कोई शक्ति रही उसको कबूलता नहीं। मेवाड़ की धरा पर अभी भी ऐसे निशान मिल जाएंगे जिनके शोध हो जाएँ तो इतिहास को विकृत करने वालों के कालिख पुत जाए। आज इतिहास पुनरावकलोकन की दौड़ है और वोटों की चाहत में फायदा कौनसा पन्ना पुराना लिखा देगा ये होड़ है। लोग सवाल करते हैं की पदमावती थी भी क्या पर ऐसे लोग स्वयं में झांककर ये बताना नहीं चाहेंगे की उन्होंने अंतिम बार धूप-छाया से समय का अंदा...

खुद को जबरन सलाम ठुकवाने की आदतों का त्याग करोगे तो ही जनता का भला होगा

खुद को जबरन सलाम ठुकवाने की आदतों का त्याग करोगे और सामने वाले को जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाओगे तो ही जनता का भला होगा।  मीटिंगों, अभियानों, आदेश-निर्देशों के अम्बार लगाकर जनता का भला करने का दावा चंद पल भी अटूट नहीं रह पा रहा।  तेज रफ़्तार से किये जा रहे दौरों ने आमजन की जीवन की अति आवश्यकता शिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था को अव्यवस्था में बदलते हुए तोड़ सा दिया।  चिकित्सा से जुड़े सिस्टम को अभियानों, हड़तालों में धकेल दिया।  चिकित्साकर्मियों और मरीजों का व्यवहार एक दूसरे के प्रति खिन् नता उतपन्न करने सा होने के बावजूद सुधार का जमीनी स्तर पर प्रयास नहीं करते। उपचार से संतुष्ट नहीं होने वाला आरोपों की बौछार करता है तो उसकी बात को नकारता रहता है प्रशासन। जनता को राहत देने के लिए रात्रि चौपाल, प्रशासन आपके संग, सरकार आपके द्वार सहित ना जाने कितने तामझाम किये जाते हैं पर नतीजा ढाक के तीन पात से आगे नहीं बढ़ पाते। इंसान स्वस्थ-शिक्षित रहे तो बाकी के सारे दोष दूर करने में स्वयं ही सक्षम हो सकता है पर ऐसी सकारात्मक पहल करने से पैसा नहीं कमाया जा सकता। जब अर्थ युग में पैसे की माया हो तो...

#दंड बिन कोई प्रावधान सुरक्षित नहीं ?

# दंड  बिन कोई प्रावधान सुरक्षित नहीं ? वैसे भी आजकल कोई राजा हरिशचन्द्र या भरत बनना नहीं चाहता। देश में परिवर्तन की मांग और व्यवस्थाओं में व्याप्त खामियों में सुधार ना चाहने वाले सारी हदें पार कर चुके हैं, फिर भी अपना-पराया की मोह माया में हमारे हुक्मरान-सिरमौर उलझे पड़े हैं।  घर-मोहल्ले से लेकर सरकारी मामलों में घिरे लोग अदालतों में घनचककर बने घूमते दिखते हैं, लेकिन ये दिलासा देने वाला कोई नहीं मिलता की मुकदमे का अंत कब होगा। कोई भी मामला-बात हो उसमें पक्ष-विपक्ष होता है और ज् यादा ही काढ़ खोज हो तो मध्यस्थ भी साथ होता है। जब किसी मामले में पक्ष-विपक्ष होते हैं तो यकीनन दोषी भी इनमें से कोई होता ही होगा। अब किसी मामले में कोई आरोपी बाइज्जत-सशर्त बरी किया जाता है तो उस मामले में दोषी कौन ये तय करने की भूल बार बार कैसे होती है,ये उलझन आज तलक सरकारी स्तर पर नहीं सुलझी लगती है? कब कैसे कहां क्यों किसने किया की चटखारे भरी बातें भले ही कागजों को भरने का काम करती होंगी पर किसी व्यवस्था से लाभ पीड़ितों को मिलेगा ये सुनिश्चित नहीं होता लगता है। किसी भी मामले का इंद्राज करते ही सुनिश्चि...

ऑनलाइन खरीददारी बंद करवा दीजिये और बाजारों में खरीददार बढ़वा दीजिये

ऑनलाइन खरीददारी बंद करवा दीजिये और बाजारों में खरीददार बढ़वा दीजिये। ये जीएसटी का असर जैसा रोना धोना छोड़कर कोई तो हकीकत क़बूलिये।  बचत को ऑनलाइन कंपनियां लील गई तो खरीददारी करने कैसे पहुंचेगा कोई बाजारों में। अधिकतर का हाल इससे ही पता चलता है की गुंजाइश नहीं होते हुए भी दस बीस हजार का मोबाइल रखना आम बात। खर्चे आमदनी से ज्यादा करके बैंकों-कंपनियों के कर्जदार बन चुके हैं बाजार के उपभोक्ता फिर भी इस कड़वे सच को दरकिनार कर सरकारी निति को कोसना हमने नहीं छोड़ा है।  देश-विदेश में अर्थश ास्त्री बड़े बड़े होंगे पर सर्वे और कागजों के दम पर चलते-चलाते रहने का उनका हुनर वास्तविकता सामने आने नहीं देता और सब मिलकर झूठ को बढ़ाते हुए अधिक दारुण परिस्थितियों का निर्माण करने कराने के सहभागी बनते हैं। किसी भी बात तथ्य में विरोधाभास का कोई स्थान नहीं होता, जहां विरोधाभास होने लगता है वहां सच झूठ से छिपता नजर आता है। कुछ बातें हैं अगर उनको सही माने तो मंदी कहीं नहीं हे,वरन हमारी जेब ही ठंडी पाई जा रही है। जन्म-मृत्यु ,खानपान,रहनसहन,आवाजाही सहित तमाम सुविधाएं ऑनलाइन उपलब्ध हैं और जिसकी जितनी गुंजाइश उसक...

हो हल्ले के बाद भी नहीं निकलता समाधान

वर्तमान में महिला सशक्तिकरण का आये दिन शोर मचने से तो लगता है की महिलाएं आज ये कहने की स्थिति में नहीं हैं की उनके साथ समानता, हक रोजगार जैसी कोई समस्या नहीं रही।  आये दिन महिला उत्पीड़न,लिंग भेद,दहेज जैसी लाइलाज समस्याओं का हो हल्ला रहता है।  कहने को तो सरकारें और नाना भांत के संग़ठन मौका मिलते ही या मौका प्रायोजित करके महिला अधिकार दिलाने का दम भरते हैं। ये दम भी कुछ दिनों बाद कहीं घूमने जैसे गुम होता नजर आता है।  फिर से महिला लाचार बेबस बनाने का जिक्र छिड़ता है तो महिला सश क्तिकरण की कसमें इरादे मंचों सड़कों से दिखाए जाते हैं पर महिलाओं से जुडी किसी भी समस्या का निदान नहीं हो पाता है। तरह तरह के आयोगों संगठनों के बावजूद एक ही बात बार बार दोहराया जाना कहीं कहीं उन परोकारों में ही कमियां दर्शा जाता है। वास्तव में महिलाओं को सशक्त बनाना है तो उनके लिए रोजगार की व्यवस्था कर दे सरकार तो बाद में कुछ भी करने की जरूरत ना पड़े। सरकारी नौकरियों में महिलाओं की उम्र की बाध्यता हटाने की आवाज उठे तो महिला आत्म विश्वास से लबरेज रहे। महिलाओं से संबन्धित्त विभागों में केवल महिला को ही नियु...

#सवाईसिंहधमोरा , समाज हित के अलावा खुद का निज हित नही देखा

#सवाईसिंहधमोरा चकाचोंध भरे रास्तों पर #सादगी सम्पूर्ण जीवन में रही। #स्वच्छ्ता विचारों की कूट कूट के भरी। ज्ञान का भंडार फिर भी कोई गुमान नहीं। छोटे बड़े में कोई भेद ना करते हुए मार्गदर्शन करते रहना बड़प्पन रहा। अकेले दिखते तो भी विशाल दिखते और भीड़ में भी विशाल ही दिखते। साथ आया उसे आगे बढ़ाने के रास्ते ही तैयार किये चाहे खुद जहां थे वहीं खड़े रहे। खुद #सवाईसिंहधमोरा साहेब ने कभी जो किया उसका जिक्र ना किया पर यदा कदा उनके साथी रहे आदरणीयों के थोड़े बहुत लिखे से उनका कद विशालकाय ही उभर कर सामने आया। भारत सरकार के प्रसार मंत्रालय का आकाशवाणी हो या सामाजिक क्षेत्र धमोरा साहेब हर जगह सर्वश्रेष्ठ नजर आये। आजाद राजस्थान का कोई सा भी आंदोलन रहा उसमें भागीदारी रही। सर्वाधिक लोगों को स्नेह देने और सम्पर्क सूत्र बाँधने में भी आगे रहे। पद कद की लालसा लिए जमाने में किसी संत की भांति जीवन यापन करने वाला कोई धमोरा साहेब की तरह नजर भी नहीं आता लगता है अब। #श्रीपालजीशक्तावत के कहे गए शब्द और पीड़ा अब ह्रद्य को कटोच रही है। धमोरा साहेब को याद करते हुए श्रीपालजी ने चिं...

#आजादी का दिन है फिर भी मन #खिन्न है

#आजादी का दिन है फिर भी मन #खिन्न है। #मतलब परस्तों की बढ़ती तादात से अब तो कुछ अच्छा होगा की नहीं बची लगती कोई #आस हर साल के मुखिया सिरमोरों के मुख्य भाषण से लक्ष्य पूर्ति के साल वैसे के वैसे ही अधूरे रह जाते हैं, फिर भी भाषण देने वाले और उनके समर्थक #शर्मिंदा नहीं होते ? #लानतें तो नाकारापन के लिए बहुत जमा है पर लेने वाला लेने को तैयार नहीं ऐसे में मन मसोसकर दिन विशेष का जश्न मनाते हैं और फिर से अपने अपने गोरख धंधों में पिसते जाते हैं। खैर ये सब तो जगजाहिर सी बातें हैं जिनको करके कुछ होना जाना नहीं। आज तो पुरानी यादें भी बड़ी अच्छी लगती है,जबकि आधुनकिता रग रग में नासूर बनके डस चुकी है। वर्षों पहले आजादी के तराने गूंजते थे तब राह चलते भी अपना काम धाम छोड़ देश भक्ति के रंग में स्वयं को रंगते रहे ,आजकल तो स्वतः कार्यक्रम में कोई आता नहीं और बुलावों से आने वाले हाथ घड़ी या मोबाइल में समय देख देख कार्यक्रम कब खत्म हो और कब निकले की होड़ में लगे रहते हैं। चारदीवारों में होने वाले आयोजन सबंन्धितों तलक सिमट गए हैं और राह चलते अंदर ना घुस पाएं के पुख्ता बंदोबस्त आय...