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लोकतंत्र भीड़तंत्र में खोता नहीं ,कहने को बहुत कुछ है पर हम आप ही सच स्वीकारने को राजी नहीं

बात बात पर धरना देने ,इस्तीफे सामूहिक सौंपने ,जनता की अदालत का मजमा लगाने के आदि हो चुके नेता ईवीएम का विरोध तो करने में लगे हैं पर चुनाव का बहिष्कार या फिर जीती सीटें छोड़कर कोई धरना प्रदर्शन आंदोलन का रास्ता अपनाने से क्यों हिचखिचा रहे हैं। पक्ष तो अपने मन की करेगा फिर विपक्षी बार बार उसके जाल में फंसने क्यों चले जा रहे हैं। हर चुनाव में मशीनरी पर पराजित दोष लगाता है फिर भी सुधार नहीं होता, इसका हल्ला मचाने से सब बचते क्यों ,सिस्टम बनाने वाले भी पक्ष विपक्ष, फिर भी असल गलती कब कैसे किससे हुई ये आमजन तलक पहुंचातें क्यों नहीं। कितने भी घोटाले हो जाए पर नेताजी के असर नहीं और कोई गरीब पकड़ा जाए तो घर बार बिक जाए।  आजादी के बाद से किसी सवाल,बात,समस्या का कोई हल निकल कर आया हो ये कहीं दिखा नहीं। एक सवाल सुलझता नहीं दूजा आता जाता है।लोकतंत्र की विश्वसनीयता का आधार धरातल है किधर अब।  अगर लोकतंत्र की विश्वसनीयता ही बची रहती तो जन प्रतिनिधि बनने वालों की संख्या ही ना बढ़ती। लोकतंत्र की विश्वनीयता बनाये रखने के लिए सत्ता या विरोधी अपने हित छोड़ना नहीं स्वीकारेंगे इस हकीकत से हम अंजान रहकर...

काम का मिलता नहीं जस और तोहमतें पड़ती बार बार

चालीस-पचास लाख के खर्चा करके डॉक्टर बने और उसके बाद भी लानतें बार बार किसी ना किसी डॉक्टर के भाग में आये, ये मेरे देश में आजकल बहुत देखने को मिल रहा।  सरकारी अस्पतालों में भारी भीड़ का उपचार करते करते ना थकने वाले अधिकतर चिकित्सक कोई एक केस बिगड़ने पर किसी आक्रोश से घिर जाएं तो उनका सब्र कब तलक साथ देगा,ये आजकल कोई ना कह पाए।  हर सिक्के के दो पहलू होते बताये जाते हैं,पर हमको तो शायद शोले फिल्म में अमिताभ बच्चन के हाथ में रहना वाला सिक्का ही भाता लगता है,जिसकी चित-पट दोनों अपने  हित में रहें। आसमानी ताकतों के बाद धरती पर डॉक्टर को भगवान का दर्जा की बात बड़ी शान से हम करते रहते हैं और ये भगवान रोषित होते हैं तो बड़ा बुरा भला भी जोरों से कहते हैं। जब ऊपरवाले को किसी बाधा के लिए कसूरवार हम ठहराते तो जमीन पर भगवान का दर्जा प्राप्त इन चिकित्सकों को कसूरवार मान तत्काल न्याय पाने की जिद कैसे क्यों पकड़ते हैं ये विरोधाभासी व्यवहार समझ से परे है। सरकारी लोगों सहित परायों को कोसना सबसे सरलता भरा मार्ग बन गया है,लेकिन इसका निर्माण करने वाले सरकारी सिस्टम में व्याप्त खामियां दूर करने का ह...

खुद का खाया पिया दुःख दे तो भी दूजों का खाने के रास्ते खोजेंगे बहुत

तेरा तुझको ही अर्पण मेरा क्या लागे की सनातन बातों को दरकिनार करते हुए आजकल हर जगह बात बात का टैक्स चुपके चुपके से लागे है।  विगत साल में मचा नोटबंदी का धमाल नए साल से ही मेहनतकशों-ईमानदारों को जबरन करने लगा है परेशान, फिर भी पीड़ितों को हक अधिकारों की दुहाई देने वालों के प्रयास कोई राहत दे जाते ये लग नहीं रहा हाल फिलहाल।  देश में बैंकिंग सिस्टम में फंसता जा रहा है खाताधारक, पैसा जमा करवाने से लेकर निकलवाने तलक का टैक्स खुलेआम बढा रहा है दिनोंदिन मानसिक टेंशन।  सरकार का तो हर  व्यक्ति के पास हो खाता पूरा हो गया होगा भले ही,पर उस खाते को खुलवाने का हर्जाना खाताधारक को अब भुगतना पड़ रहा है। बैंकों की और से ट्रांजैक्शन चार्ज लगाने का सिलसिला चलाया जा रहा है। एक लिमिट के बाद एटीएम पर बेलेन्स की जानकारी लेने के रुपये काटे जाने लगे हैं। कई बैंक ११.५० से लेकर १०० रूपये काटने से भी नहीं चूक रहे। वैसे तो इस साल बैंक अपने कामकाज को व्यवस्थित तरीके से जमाते हुए अगले साल तलक के एडवांस में सेवा देने के नाम पर पैसा खूब वसूलने में जुटे लगते हैं। बैंकों को पैसा काटना ही है तो उसके सेव...
केंद्र में आश्चर्यजनक तरीके से मोदी की ताजपोशी हुई और उसके बाद अब क्या होगा आगे के गुणाभाग लगने लगे, कुछ वैसे ही यूपी में अकल्पनीय योगी आदित्यनाथ सीएम बन चुके और फिर से मोदी+योगी के सत्ता में रहते अब आगे क्या होगा के गुणाभाग अनसुलझते जा रहे हैं।  हिंदुत्व के सहारे आगे बढ़ने वाली भाजपा इस हिंदुत्व से भी आगे की दौड़ लगाने में जुटी है, मंजिल किधर खत्म होगी ये बातें किसी सिरे से किसी को शायद पकड़नी नहीं या फिर रणनीतियां कुछ ऐसी बनाते हैं रचनाकार की अभी क्या हुआ उसमें उलझते हैं सोचने  वाले और ये आगे की पायदान पर चढ़ चुके होते। शहरी लोगों की पार्टी गाँवों में जड़ें जमा चुकी और सवर्णों का बोलबाला कहलवाते कहलवाते एससी वोट बैंक कैसे अपने से भाजपा ने जोड़ा ये भी जल्द से पता नहीं चला। कुछ ऐसा ही हाल हिन्दू मुस्लिम का पेंच फ़ँसाये मुस्लिम वोटों को अपनी तरफ ना कर ले ,इसका अंदेशा भी खटकने लगा है। हिन्द+ऊ =हिन्दू और हिन्दू में से उर्दू का उ हटा दें तो केवल मात्र हिन्द रहता। ऐसे में मोदी सरकार तो सबका साथ सबका विकास करती लगती है। टिकट दिया नहीं और बिन चुनाव लड़े मुस्लिम को मंत्री बनाकर हिन्दू मुस्लि...

बलिदानी परिवार के उत्तराधिकारी खुद को अलग करके परिवार बचाने से हिचकने लगे

हाल के विधानसभाओं के सम्पन्न चुनावों से साफ़ संकेत मिलने के बावजूद गांधी परिवार नेतृत्व छोड़ने या फिर कोई बड़ा परिवर्तन करने के बारे में अपना मंतव्य जाहिर नहीं कर रहा। ये ही शैली कांग्रेस को गांधी परिवार की छत्र छाया से दूर करने की वजह जोरदार आने वाले समय में बन जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए।  आजादी के बाद से देश में सबसे ज्यादा राज करने के बावजूद इंदिरा गांधी के निधन के पश्चात राजीव गांधी के जिंदा रहते ही कांग्रेस के पतन की नींव उसके ही नेताओं ने रखना शुरू कर दी। गांध ी परिवार खुद के खानदानी इतिहास के सहारे उसके खिलाफ रचे जा रहे घटनाक्रमों को अनदेखा करता ही रहा और वर्तमान में हालात उसकी किसी नवांकुर पार्टी से भी बुरी हो गई है। वर्तमान में तमाम प्रयासों के बावजूद राहुल गांधी अपनी पार्टी को सम्मान दिला नहीं पा रहे हैं और खुद भी आगे क्या करना है ये बताने के बावजूद चुपी साधे फिर से एक और चुनाव का शायद इंतजार करने में लगे हैं? राहुल गांधी अभी भी कोई नई पहल किये बिन अपने पिटे पिटाये मोहरों के सहारे स्वयं का वजूद साबित करने में जुटे हैं और दूसरी तरफ तेजी से अपना दबदबा कायम करते जा...

बड़े दिवस आ गये पर बिन कुछ धूम धडाका किये ओपचारिकता निभा गये

दो चार दिनों में बड़े बड़े दिवस आ गये पर लगा ऐसा की बिन कुछ धूम धडाका किये ओपचारिकता निभा गये  जंगल में मंगल का अर्थ जाने बिना कंक्रीट का राज स्थापित करने वाले वानिकी दिवस पर वन और वन्य जीवों को बचाने का बखान कर गये पर जंगली जानवर किस मुकाम पर अपना आशियाना तलाशे वेसा कोई क्या इंतजाम किया या करेंगे उस पर चुपी साध गये  चलता पानी जिसने देखा नही कभी खुद ने सहेजा नही वो देता हे आज ज्ञान की पानी बचाओ नही तो आगामी समय में मचने वाला हे जोरदार घमासान  उपरवाला तो खूब ब रसाता हे पर जमा करता अपनी जिम्मेदारी भूल बह जाने पर करते हे नीर को मजबूर पानी-जंगल दोनों हे इंसानी करतूतों से पीड़ित पर हल्ला मचने के बाद भी दूर दूर तलक दिखाई नही देता कोई कर्णवीर अतिक्रमण लील गये नदी नाले तो जंगल में आग लगाकर इंसानी बस्ती बसने बसाने के खेल हे निराले ऐसी सूरत में नाम की खातिर मनाये जाने वाले दिवस सरकारी बजट का समतलीकरण भले ही कर जाये पर जमीनी हकीकत को कभी ना बदल पाएंगे फिर भी हे कोई ना कोई उम्मीद जो हमारे गुरुवरों की नजर से जल जंगल के भले के लिए कभी ना कभी तो होगी पूरी।  छल के दौर में बचाने का शो...

सरकारें अपने खुद के तरीकों सेचलती हैं पर आजकल उन्हें कैसे काम करना वो चर्चाएं कुछ ज्यादा ही बेमतलब की चलती हैं

वर्तमान में देश में लग रहा है। सरकारें अपने खुद के तरीकों से चलती हैं पर आजकल कयासबाजियां लगाकर उन्हें कैसे काम करना वो चर्चाएं कुछ ज्यादा ही बेमतलब की चलती हैं आश्चर्यजनक तरीके से मोदी की ताजपोशी हुई। उसके बाद अब क्या होगा आगे के गुणा-भाग लगने लगे। कुछ वैसे ही यूपी में अकल्पनीय योगी आदित्यनाथ सीएम बन चुके हैं और फिर से मोदी+योगी के सत्ता में रहते अब आगे क्या होगा, के गुणा-भाग उलझते जा रहे हैं।  हिंदुत्व के सहारे आगे बढ़ने वाली भाजपा इस हिंदुत्व से भी आगे की दौड़ लगाने में जुटी है। मंजिल किधर खत्म होगी, ये बातें किसी सिरे से किसी को शायद पकड़नी नहीं। या फिर रणनीतियां कुछ ऐसी बनाते हैं रचनाकार कि अभी क्या हुआ ? उसमें उलझते हैं सोचने वाले  और ये आगे की पायदान पर चढ़ चुके होते हैं। शहरी लोगों की पार्टी गाँवों में जड़ें जमा चुकी है और सवर्णों का बोलबाला कहलवाते कहलवाते एससी वोट-बैंक कैसे अपने से भाजपा ने जोड़ा, ये भी जल्द पता नहीं चला। कुछ ऐसा ही हाल हिन्दू मुस्लिम का पेंच फ़ँसाये हुए है। मुस्लिम वोटों को भाजपा अपनी तरफ ना कर ले , इसका अंदेशा भी खटकने लगा है। हिन्द+ऊ =हिन्दू और हिन्द...