चुनाव भले ही समान आचार संहिता के डंडे तले लड़े जाते होंगे,लेकिन सत्ता पाने की जोड़तोड़ में राज्यों-क्षेत्रों में सब बंटते जाते हैं।
चुनाव भले ही समान आचार संहिता के डंडे तले लड़े जाते होंगे,लेकिन सत्ता पाने की जोड़तोड़ में राज्यों-क्षेत्रों में सब बंटते जाते हैं। कोई सा भी चुनाव हो, नेता तो हर सौ पच्चास कोस पर पहुंचते ही अपनी कही बातों से जरूर पलटते ही हैं। चुनाव आयोग भी कितने नोटिस दे, ये समस्या बड़ी भयंकर है। आजकल तो कोई शिकायत होने से पहले कोई स्वेच्छा से कार्रवाई करना ही नहीं चाहता तो चुनाव आयोग ऐसी कु-परिपाटी से कैसे रह पाए अछूता। चुनाव की निगाहों को चुंधिया देते हैं नेता-दल और हर कागजी कार्रवाई भर देते हैं घूम घुमाकर। अधिकतर प्रत्याशियों का खाने-पिने का खर्चा ही इतना होता है,जितना वो चुनाव आयोग को सम्पूर्ण चुनाव में हुआ खर्चा बताते हैं। ये लेनदेन की अलिखित होड़ ना जाने कैसे लिखित में नहीं आ पाती और धड़ाधड़ सरकारें बनती-उजड़ती जाती है। चुनावों में अगर चुनाव आयोग की तय राशि के भीतर ही प्रत्याशियों का खर्च होता तो वर्तमान के अधिकतर नेता निर्वाचित ही नहीं हो पाते और लोकतंत्र के चुनावी मेले में कुछ सामान्य धन वाले लोग आगे बढ़ते नजर आते। चुनाव आयोग के पास स्वयं का स्टॉफ भी सिमित और बंदिशें भी लगते हैं...