कानून के दायरे भी हैसियत-चमत्कार देखकर कोई सजा मुकर्रर करते होंगे,जब ही तो नित रोज ठगी करने वाले आराम से पनपते देखे जाते हैं।

कानून के दायरे भी हैसियत-चमत्कार देखकर कोई सजा मुकर्रर करते होंगे,जब ही तो नित रोज ठगी करने वाले आराम से पनपते देखे जाते हैं।
कोई कंपनी या काम करके लोगों को लालच में फांसता है तो किसी को नुकसान हो तो ठगी का मामला दर्ज होता है। फिर भी इतने बरस आजादी के बीतने के बावजूद लोकतंत्र के नाम पर वादों-घोषणाओं के सहारे आमजन को ठगे जाने का कोई मामला दर्ज आज तलक नहीं होता दिखा।
आमजन सहित मतदाताओं के हितों की रक्षा को कई कानून बनाये गए होंगे,पर किसी एक में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं ,जिसके तहत वादे-घोषणा पूरा नहीं करने वाले को सजा हो सके।
चुनाव आयोग लोकतंत्र की अहमियत बनाये रखने की तमाम कोशिशों के बावजूद नेताओं के कुप्रयासों-हरकतों को पूरा थाम नहीं पाया लगता है। शायद इसी पोल में ढोल बजाते हुए हर चुनाव में नेता वादों-घोषणाओं के अद्र्श्य घोड़े पर सवार होकर जनता की उम्मीदों को तोड़ने और खुद का दामन भरने के हित साधते हैं।
देश और अवाम की के सुकून के लिए चुनाव आयोग सहित सरकारी सिस्टम अब तो ऐसा जोखिम नेताओं पर लादे जिससे ध्यान हटाते ही दोषी सीधा सजा पाए या चुनाव लड़ने के लायक ही ना रह पाए।
चुनावी-खर्चे की बंदिशें हो या चंदे की लिमिट ये सब बेमानी होगी जब तलक कोई वादा-घोषणा पूरी करने का रास्ता ना हो।
तमाम निगरानी चुनाव आयोग करता है तो एक वादे-घोषणा पूरी हुए या नहीं इसके लिए भी अलग से प्रकोष्ठ खोल दे। जो कहा पूरा ना कर पाए नेता उसे चुनाव लड़ने से तत्काल अयोग्य kr दे।
जब वादे-घोषणा पर निगरानी होगी तो आम जनता कम से कम ठगी जायेगी।

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