एक दलीय सिस्टम लोकतंत्र कहलाता नहीं और बहुदलीय बेडा गर्क करने से बाज नहीं आता

आजादी के तत्काल बाद के हालात भारतीय राजनीति में उभर चुके हैं ? आजादी मिलने के बाद कांग्रेस से मुकाबले के लिए अलग अलग प्रांतों में क्षेत्रीय दलों-नेताओं के हाथों में कमान थी, कुछ वैसा ही हाल वर्तमान में उभरने लगा है।
देश के चारों कोने हो या मध्य भाग, वर्तमान में सत्ता किसी एक के हाथ में रह पाए सब मिल बांटकर राज करें जैसे परिदृश्य का निर्माण करने में लगी है।
मतदाता विकल्प की तलाश में हैं और तनिक भी बड़े दलों का विकल्प उभरा की उसे सर माथे पर रखने को आतुर नजर आते हैं। बड़े राजनैतिक दल भी अपनी पुरानी लीकों-अहम को त्याग राज्यों में छोटे दलों के अधीन खुद को सत्ता में बनाये रखने का लालच छोड़ नहीं पा रहे हैं।
कहने को देश में पूर्ण बहुमत के साथ मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार है,लेकिन देश के कई राज्यों में उसका आधार क्षेत्रीय दलों-नेताओं के तले दबा दबा सा लगता है। केंद्र का कोई भी आदेश राज्यों के हितों के आड़े आने से पूर्ण होता नहीं लगता और पूर्ण बहुमत से बनी मोदी सरकार किसी अल्पमत की सरकार से ज्यादा बेबस सी होते जा रही है।
देश की संसद का रास्ता तय करने वाले यूपी में कांग्रेस आत्महत्या करने जैसा कदम अखिलेश की समाजवादी पार्टी से समझौता करके उठा चुकी तो भाजपा घरेलू कलह से अपने मंसूबे पूरे करने में असक्षम होते जा रही है। केंद्र और राज्य में परस्पर विरोधी सरकार बनने का खामियाजा विकास कार्यों पर पड़ता है,फिर भी इस बात को अनदेखा कर हर कोई सत्ता से चिपके रहने का मन मारकर समझौता करना चाहता है।
हिंद का शीश जम्मू-काश्मीर केंद्र और राज्य सरकार के टकराव भरी नीतियों से एक अलग अछूत सा होने का बरसों से दंश भोग रहा है ,लेकिन सारे राजनैतिक दल अपने कसमें वादे भूल मिली जुली सरकार बनाने का लोभ नहीं छोड़ पाते।
लोकतंत्र लोगों के भले के लिए बना बताते हैं और वर्तमान में उक्त लोकतंत्र अवाम के गले का जंजाल बना नजर आता है।
देश में राजनैतिक दल-नेता खुद को जीवित रखने की खातिर देश-अवाम के हितों की बलि देते हिचकते नहीं।
केंद्र के उलट दिल्ली राज्य में बनी सरकार का कार्यकाल अधिकतर परस्पर टकराव में ही निकल गया तो तमिलनाडू में अम्मा की बीमारी-मौत और अब सत्ता की लड़ाई में गुजर रहा।


बिहार, महाराष्ट्र,बंगाल में भी केंद्र सरकार के विरोधी दलों की सरकार। ऐसे राज्यों में केवल मात्र संसद(लोकसभा ) का बहुमत कैसे कोई निर्देशों की पालना करा पाए ,ये चुनाव आयोग सहित तम्माम सुधार आयोगों को भी समझ नहीं आता। इसीलिए केवल मात्र चुनाव का इन्तजार रहता लगता है।

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