चुनाव भले ही समान आचार संहिता के डंडे तले लड़े जाते होंगे,लेकिन सत्ता पाने की जोड़तोड़ में राज्यों-क्षेत्रों में सब बंटते जाते हैं।
चुनाव भले ही समान आचार संहिता के डंडे तले लड़े जाते होंगे,लेकिन सत्ता पाने की जोड़तोड़ में राज्यों-क्षेत्रों में सब बंटते जाते हैं।
कोई सा भी चुनाव हो, नेता तो हर सौ पच्चास कोस पर पहुंचते ही अपनी कही बातों से जरूर पलटते ही हैं। चुनाव आयोग भी कितने नोटिस दे, ये समस्या बड़ी भयंकर है।
आजकल तो कोई शिकायत होने से पहले कोई स्वेच्छा से कार्रवाई करना ही नहीं चाहता तो चुनाव आयोग ऐसी कु-परिपाटी से कैसे रह पाए अछूता।
चुनाव की निगाहों को चुंधिया देते हैं नेता-दल और हर कागजी कार्रवाई भर देते हैं घूम घुमाकर। अधिकतर प्रत्याशियों का खाने-पिने का खर्चा ही इतना होता है,जितना वो चुनाव आयोग को सम्पूर्ण चुनाव में हुआ खर्चा बताते हैं। ये लेनदेन की अलिखित होड़ ना जाने कैसे लिखित में नहीं आ पाती और धड़ाधड़ सरकारें बनती-उजड़ती जाती है।
चुनावों में अगर चुनाव आयोग की तय राशि के भीतर ही प्रत्याशियों का खर्च होता तो वर्तमान के अधिकतर नेता निर्वाचित ही नहीं हो पाते और लोकतंत्र के चुनावी मेले में कुछ सामान्य धन वाले लोग आगे बढ़ते नजर आते।
चुनाव आयोग के पास स्वयं का स्टॉफ भी सिमित और बंदिशें भी लगते हैं तो चुनाव में पारदर्शिता की कमी पनपती है।
कागजों और खिंची गई लकीरों को पार किये बिन किसी भी काम को सलीके से पूरा नहीं किया जा सकता, वैसा ही रवैया सरकारी सिस्टम का लगता है।
समस्याएं तो जग जाहिर हैं,पर समाधान भी समस्याओं के आजू बाजू में बिखरते उड़ते रहते हैं। जरूरत तो समाधानों को जकड़कर समस्या से टकराने की है।
ज्यादा कुछ नहीं चुनाव आयोग दो चार बातों को लेकर ही प्रत्याशियों पर नकेल डाल ले तो आचार संहिता में दर्ज प्रावधानों को धत्ता बताने तो खुद के कान पकड़ लेंगे यकीनन।
मतदान केंद्रों की फोटोग्राफी आजकल खूब होती है, लेकिन इस फोटोग्राफी में चुनाव आयोग के फरमान की अनदेखी करने वाले फंसते नहीं। अगर चुनाव की घोषण से लेकर मतदान के दिन तक चुनाव वाले क्षेत्रों के रास्तों सहित राजनैतिकदलों-नेताओं के भंडारे तलक का फोटोग्राफी हो तो कौन बचेगा। गाड़ी धन,दारु, नोट, बल सहित ना जाने क्या क्या मतदान तलक परवान पर होता है। ये सारी बातें सबको पता होती हैं,लेकिन चुनाव आयोग के कार्मिकों और जिम्मेदार लोगों के सामने ना जाने कैसे नहीं पाती।
कहने तो पक्ष-विपक्ष में भी आरोप-प्रत्यारोपों का दौर खुलेआम चलता है और मनमाफिक चुनाव आयोग के निर्देशों की अवेहलना करने का खेल होता।
अधिकतर लोग जब मानते हैं की चुनावों में निर्देशों को धत्ता धड़ल्ले से बताया जाता है, लेकिन इनकी रोकथाम के सारे तोड़ बेकार क्यों हो जाते हैं, ये किसी के जल्द से समझ में नहीं आया या जान बूझकर समझना नहीं चाहते ?
Comments
Post a Comment