दंड बिना भय नहीं, भय बिन नहीं होती पालना
दंड बिना भय नहीं, भय बिन नहीं होती पालना, इनका अभाव आमजन को करता परेशान।
कोई परेशानी उजागर आते ही नियमों-कानून के सहारे समाधान की बात करते हैं, एक नहीं तो दूजा-तीजा की कड़ियां जोड़ते हुए न्याय पाओ की सीख देते हैं।
अब अदालतों में मुकदमों का हाल ऐसा की अपराध हुआ तो सब मानते हैं पर साक्ष्यों का पेच ऐसा फंसता है की कई मामलों में अपराधी कौन ये मुकदमा खत्म होने के बाद भी अदालत में तय नहीं हो पाता।
सरेआम किसी की हत्या होती है, या कोई अन्य जुर्म तो उसके अनुसार धाराओं में मामला दर्ज कार्रवाइयां होती रहती हैं। सरकारी नियमों के हिसाब से सहायता बंटती हैं, लेकिन अपराधी आरोपों को प्रमाणित नहीं किये जाने से बरी होते देखे जाते हैं।
सवाल सीधा सा उठता है बार बार की अगर अपराध हुआ है तो अपराधी भी होगा कोई ना कोई ,लेकिन ज्यादातर मामलों में अपराधी कोई भी नहीं होता और पीड़ित तमाम तरह की प्रताड़ना झेलने के बाद अपने नुकसान की भरपाई क्यों नहीं हो पाई ये सोचते ही रह जाता है।
कानून व्यवस्था आमजन के हित की सोचे तो अदालतों में होने वाले निर्णय किसी एक पक्ष को तो दंड दे,ऐसे कुछ प्रावधान करे ?
जिस तरह से बिजली-पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं का उपभोग करने पर सरकारें बिल राशि लेती है,ऐसा ही कुछ अदालतों में आये मुकदमों के नतीजों को लेकर किसी एक पक्ष को दोषी अनिवार्य मानते हुए दण्ड लगाना शुरू करे तो बात बात पर अपराध करने वाले और अदालतों में आवागमन करने वालों पर कुछ अंकुश सा लगे।
रसूखदार के मामले खत्म होने तलक पीड़ित के जीवन का अंतिम दौर शुरू हो जाता है। वकालात की किताबें तो पैरवी करने वाले एक सी पढ़ते हैं, लेकिन जिसकी फ़ीस ज्यादा उसके रिजल्ट शत प्रतिशत से आते हैं। भारी भरकम फीस लेने वाले पैरवीकर्ताओं के गुणाभाग से सरकारी सिस्टम असहाय सा होते रहता,लेकिन रात गई बात गई के अचूक फार्मूले की तरह बड़े से बड़ा जुर्म भी चुपी के अंधेरों में बार बार पनाह लेता है।
सबूतों,गवाहों,जिरहों में उलझी कानूनी पेचीदगियों को आजाद किये बिन आमजन को न्याय सरलता से सुलभ कैसे हो,इस पर कोई हुक्मरान ज्यादा जोर देता नहीं। हालात बद से बदतर हो रहे होंगे पर घटना को अंजाम देने वाले को समय पर दंड मिलता जल्द से दिखता नहीं।
हर साल कोई ना कोई वीभत्स घटना होती है और खूब हल्ला तत्काल मचता है,लेकिन जैसे जैसे मामला आगे बढ़ता है सब कुछ भूला देने वाला रिवाज चलता है। मामला अंत तलक पहुंचता है तो दोषी कौन ये भी भूला दिया जाता है।
आमजन से जुड़े मामले तो रसूखदारों के पैंतरों के आगे अदालतों की चौखट पर भूल भूलैया बनाने जैसे नजारों में फंसते जाते हैं, फरियादी प्रताड़नाओं से घिरा रहता है तो आरामदायक हालातों में आरोपी उसे चिढ़ाता रहता है।
रोजगार प्राप्त इंसान अगर किसी नियोक्ता के खिलाफ कोई वाद दायर करता है तो उसे उम्र के अंतिम पड़ाव तलक न्याय मिल जायेगा,ऐसा कोई जल्द से आसार नजर नहीं आता।
तमाम रजिस्टर्ड कागज,प्रमाण पत्र अदालतों में तारीख दर तारीख में धुंधले से होते जाते हैं,लेकिन वो सत्य हैं उसे साबित करने में जोर बड़े आते हैं।
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