बजट ना आमजन ना ही सरकार को राहत दे पाए,तभी तो घाटा स्थान पक्का किये जाए

आम बजट जनता के हित में या सरकार के, ये समझ में नहीं आता।
बजट से सरकार और अवाम की परेशानी आजादी के बाद से अभी तलक तो दूर होते नहीं नजर आई।
हर साल बजट पेश होता है और पक्ष-विपक्ष में गुणगान भी, फिर भी कोई एक भी बात-या योजना किसी बजट की मुक्कमल नहीं होती।
कहने-लिखने को तो बजट जनता को राहत देने के लिए बनाते बताये जाते हैं,लेकिन सम्पूर्ण बजट में घोषित कोई सी बात आमजन को समझ में नहीं आती।
साल 2017 में समय बदलाव का नवाचार करते हुए पेश बजट में मध्यम वर्ग को राहत देने के सभी समाचार उजागर करने में तो लगे हैं पर राहत दिलाने वाले माध्यम कैसे प्राप्त होंगे ये राज कहीं छिपा दिए गए लगते हैं ?
अर्थशास्त्र का क्या गुणाभाग ये अवाम जानना नहीं चाहती,उसे तो बस रोजी-रोटी का प्रबन्ध करते रहने से मतलब।अर्थ शास्त्र भी इसी अवाम के रहन सहन से उतार चढ़ाव तय करता,पर सरकार लिखित जबानी करके जमीनी दशा सुधारने से बचती लगती हैं।
बजट देश की सत्तर फीसदी से ज्यादा लोगों को लाभ जब सरकार शीर्ष स्तर पर स्थापित संस्थानों-संवसम्भू लोगों पर नकेल डाल देगी तभी मिल पायेगा।
मध्यम वर्ग का अधिकांश हिस्सा निजी संस्थाओं में कार्य करता है और बजट सहित अभी तलक कोई सरकारी प्रयास उनका भला करने का कहीं सुनने में नहीं आया है। न्यूनतम वेतन पर काम करने वालों को सरकारी गजट के अनुसार तय वेतन कैसे मिले इसका उल्लेख कोई नेताजी-अधिकारी नहीं करता।
निजी संस्थान तो अपना हित देखते होंगे पर सरकारी कार्यालयों में ठेके-संविदा पर लोग न्यूनतम से न्यूनतम दिहाड़ी पर काम करते मिलेंगे।इस तरफ बजट में कोई ध्यान नहीं देना अधिकतम लोगों को टैक्स सहित अन्य राहत कैसे दे पायेगा समझ नहीं आता ?
किसानों सहित अन्य वर्गों को राहत का लिखित जबानी पिटारा हर बजट में खोला जाता है पर ये नियम अभी तलक नहीं बन पाया की कोई भी पात्र किसी दफ्तर में जाए और तत्काल राहत पा ले ?
सरल-सुविधाकरण की बातें भाषणों-कागजों में बड़े अच्छे से उकेरी जाती होंगी, लेकिन हकीकत में तो इस देश में खुद के नाम परिवर्तन के लिए कई कागजी कार्रवाई करते हुए इधर-उधर फेरे लगाने पड़ जाते हैं।
बजट पेश होता है और कई दिनों तलक बड़े बड़े बुद्धिजीवी इसके अक्षरों में छिपे लाभहानि का पोस्टमार्टम करते रहते हैं, ऐसे बजट को आमजन कैसे तथा राहत प्राप्त करे।
बजट आमजन का कहलाये इसके लिए सरकारी परिपाटी निस्पक्षता से काम करे तो बात अच्छे दिनों की बने।
किसी भी वर्ग के लिए घोषित आदेश-योजना का लाभ दिलाने की दिशा में सरकारी दण्ड फंड पात्रों को बिना रुकावट के मिले तो ही हर साल आने वाले बजट की सार्थकता रहेगी,अन्यथा तो हमने किया वो पुण्य और दूजे करें तो पाप के स्वर बेसुरे से बजते रहेंगे।

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