नियमों में खोट रहा या हुक्मरानों की मंशा में ये समझ नहीं आता। कुछ समझ पाएं उससे पहले ही कोई ना कोई घोटाले का उजागर होना जनता की गाढ़ी कमाई को लील जाता।

सरकार और सरकारी नियमों में खोट रहा या हुक्मरानों की मंशा में ये समझ नहीं आता। कुछ समझ पाएं उससे पहले ही कोई ना कोई घोटाले का उजागर होना जनता की गाढ़ी कमाई को लील जाता।
अबकी बार कमाई की खातिर जमा पूंजी पर लाइक ने कर दी मार,फिर भी ऐसी कंपनी के पदार्पण के समय कानून व्यवस्था नहीं चेती। कानून ने काम किया तब तलक इंफोब्लेज सहित कई नाम बदलने वाली कंपनी में 3700 करोड़ रूपये लोगों के फंस गए बताते हैं।
कोढ़ में खाज का काम तो ये हुआ अब की कंपनी के खाते सीज कर मामले की जांच करने वालों के शिकंजे में आ गई लोगों की पूंजी। बार बार ऐसी कंपनियां व्यापार करने आती है और लोगों की जमा पूंजी कोई मामला दर्ज होते ही कानूनी दांवपेंचों में स्वाहा हो जाती है, इतना कुछ होने के बावजूद सरकारी सिस्टम जनता को लूटते रहने से बचा पाने में असमर्थ नजर आता है ?
कहने वाले कहते हैं की लालच में ठगे जाते हैं लोग, पर हम तो कहते हैं की सरकारी सिस्टम-शिक्षा ही लालच पनपाने में लगे और लोगों को ठगने में लग जाए तो कोई कब तलक बच सकता है ?
गौर फरमाइए हमारी शिक्षा प्रणाली पर जो की वर्तमान में शर्तियां मुनाफा देने वाला धंधा-व्यापार हैं। गुरुजनों को माफ़ करना ये बातें कहते हुए सांप लौटते हैं छाती पर ,लेकिन इस अनदेखी दुःखदायी हकीकत से कभी ना कभी तो सामना करना ही पड़ेगा सबको।
ज्यादा नहीं आज से तीस-पैंतीस साल पहले तलक की शिक्षा आज के युग से बड़ी अच्छी थी, जिसमें हर साल योग्यता के अनुसार पढ़ने नहीं पढ़ने वालों की छंटनी तो कम से कम स्वविवेक से चलती रहती थी।
आठवी-दसवीं में आते आते विधार्थी अपना लक्ष्य तय करते हुए आगे क्या करना है की सोच रखते थे, आजकल तो दूसरा क्या करता है उसके अनुसार लक्ष्य बनाकर सिर पकड़ते हैं।
पहले की पढाई-शिक्षण संस्थानों में नम्बरों के आधार पर क्षेत्र तय होते थे और आजकल तो नम्बर हो या नहीं साम दाम दंड भेद की स्कीमों से कहीं ना कहीं एडमिशन ले बैठते हैं।
पहले सबसे होशियार को गणित-विज्ञान विषय मिलते थे, उसमें से भी होशियार को डॉक्टरी-इंजीनियरिंग में दाखिले मिलते थे। इससे रहने वाले कॉमर्स का रुख करते थे और इससे भी रह गए तो आर्ट्स में स्थान पाते थे। अब आर्ट्स में भी दाखिल नहीं मिलता वो अपना काम धंधा सम्भाल लेता था पर आजकल की तरह गली मोहल्ले में खुले संस्थानों में जाने की अंधी दौड़ का हिस्सा नहीं बनता था।
अब आजकल की शिक्षा-शिक्षण संस्थानों के हाल देखे तो ये ही लगता है की सरकारी स्तर से ही ठगने का खेल जोरों का चलता है पर सरकार तो सरकार है, इसलिए कोई इस पर चिंतन नहीं करता।
सीधी सी बात जितने भी संस्थान हैं उनकी सीटों के अनुरूप कितनों को रोजगार मिलता है इस पर मंथन-चिंतन किया जाए तो सरकारी स्तर पर चल रहा व्यापार रुके और देश का भविष्य माने जाने वाली पीढ़ी ठगी ना जाए।
हकीकत ऐसी की हजारों की संख्या में हर साल डॉक्टर-इंजीनियर शिक्षण संस्थानों की भारी भरकम फीस चुकाकर डिग्रियां लेते हैं, पर उनकी संख्या अनुसार एक चौथाई भी रोजगार उपलब्ध नहीं ?
सरकार शिक्षा प्रणाली का खोट दूर करते हुए जितने रोजगार उपलब्ध हो उतनी ही सीटें रखने की बाध्यता तय करे तो ये शिक्षा में होने वाली ठगी तो रुके।
कहते हैं बड़े बुजुर्ग की शिक्षा-संस्कार जीवन निर्माण में सहायक बनते हैं,लेकिन दूषित-लालच से परिपूर्ण व्यवस्था तो बार बार ठगी और ठगने वालों का ही सहारा बनती है।

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