सुविधाएं हमारे लिए,परेशानियां तुम्हारे हिस्से में ? ऐसे विधेयक-नियमों तले समरसता कैसे जन्म ले।

सुविधाएं हमारे लिए,परेशानियां तुम्हारे हिस्से में ? ऐसे विधेयक-नियमों तले समरसता कैसे जन्म ले।
नियमों का सरलीकरण करने की हर सरकार बातें बहुत करती हैं और कोई नया नियम या संशोधन जरूर करती रहती है। सब करने के बावजूद नियमों में रची बसी जटिलताएं ईमानदार-मेहनतकशों को समय समय पर परेशान करती हैं ?
कहने को तो हम आजाद हैं,लेकिन पग पग पर नियमों की बेड़ियों में जकड़े से लगते हैं, जिसके पास है सत्ता का दम वो ही मन माफिक काम करते हैं।
एक को उजाड़कर दूसरे को बसाने का खेल आजादी के बाद से सब खेलने में लगे हैं, कोई जीतता है तो कोई हारता ये सिलसिला देश में खूब फला फूला है।
नियमों में जटिलता-भेदभाव का मकड़जाल बसता है,शायद इसीलिए कोई ना कोई नियम विरोधाभास को अनवरत आजाद देश में जन्म देता रहा है।
नेतागिरी के मुफीद रहने वाले मुद्दे और कमियां तो लोग तत्काल चर्चा में लाते हैं,पर अवाम को लाभ देने वाली बातें चुपके से गोल कर जाते हैं।
आजादी के बाद बनी सरकार हो या वर्तमान सबका एक ही ध्येय वोट बैंक बनाओ राज जैसे तैसे करते जाओ ही रहता आया है।
गरीबों-पीड़ितों को हक दिलाने का बीड़ा ऐसा उठाया की जो था पास वो भी दूर होता चला गया। आरक्षण की कुरीति ऐसे पनपाई की गधा घोड़े की जगह दौड़ा और घुड़सवार जब चाहे तब उसके नीचे दबता जाए।
सबको समानता का ढिंढोरा पीटते पीटते अधिकतरों के छुटवा दिए काम और बेरोजगारी का बांट दिया चहुंओर भरपूर प्रसाद।
महिला हक की बातें हवाबाजी की कलाकारियों में फंसते गई तो घर परिवार टूटने की खातिर अदालतों की फेरी लगाने को हो गए मजबूर।
कानून का ऐसा प्रचार किया की लोग अंकुश मुक्त होकर थानों के कागज भरने का मोह बांध बैठे और अपनों से दूर हो बैठे।
एक छोटी सी बात भी सरकार कर दे पूरी तो कुछ समानता की बात दिखे।


आरक्षण पीढ़ी दर पीढ़ी दिया अच्छा किया होगा शायद, पर जिनकों नहीं मिला उनकी औलादों ने तो शायद बुरा नहीं किया। अगर बाप-दादाओं की करनी की सजा औलादों को मिलना सही मानती है सरकारें-नेता तो फिर किसी जुर्म में सजायाफ्ता नेता के परिवार पर भी चुनाव लड़ने की पाबंदी लगाने से दूरी क्यों।

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