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सफलता-असफलता के अर्थों में उलझे हम कूछ भी बुरा होने का दोष फटाफट दूसरे के माथे मंड देते हैं

सफलता-असफलता के अर्थों में उलझे हम कूछ भी बुरा होने का दोष फटाफट दूसरे के माथे मंड देते हे / कभी ये नही सोचते की इसमें कही न कही व्यक्तिगत दोष भी सबसे बड़ा गुनहगार हे ? खुद के मरे ही स्वर्ग मिलता हे ये सुना हे पर रविन्द्र के सुनाये किस्से ने इसे पुख्ता किया? अपनी बिगडती दशा से परेशान बाल कटिंग की दुकान चलाने वाला जब देखो भगवान को कोसता रहता की इतनी पूजा पाठ के बाद ये तूने केसा हाल किया / रोज रोज के ओल्मे मिलने से भगवान भी दुखी रहने  लगा / अब भगवान परेशान हो चला तो उसने बाल कटिंग की दुकान चलाने वाले की समस्या का निदान करने की सोची और रूप बदल कटिंग कराने पहुच गया/ भगवान बाल कटा रहे हे और काटने वाला भगवान को कोसे जा रहा हे / भगवान ने उससे पूछा की भाई तुम भगवान को इतना कोसते क्यों हो / दूकान वाला दुगने वेग से बोलने लगा की इतनी पूजा पाठ करता हु पर वो मेरी सुनता नही हे सुध नही लेता हे / ये बात सुनकर भगवान ने उसे दुकान के बाहर बेठे एक फटेहाल भिखारी दिखाया और बोले इसके बाल देखे तुमने / दुकान वाला बोला बहुत बड़े हे / भगवान ने पूछा तुमने काटे क्यों नही तो दुकानवाला बोला ये मेरे पास आया नही इस...

कर्ता धर्ता बस नाम शोहरत के पीछे भागते रहते हैं और असमय ही लोगों की जानों पर बन आती है

ये आज के दौर की विडंबना ही मानो की  कर्ता   धर्ता बस नाम शोहरत के पीछे भागते रहते हैं और असमय ही लोगों की जानों पर बन आती है।    एसी  में बैठकर बैठकें लेते रहना ,दौरे दर दौरे करकर सब ठीक है या ठीक कर देंगे जैसे रट्टे लगाते रहना आजकल हुक्मरानों का नजरिया है।  कोई घटना हो जाए और मामला बढ़ने लगे तो एक आध तो एपीओ या निलम्बित करके जांच बैठा देना ही मानो सरकार-प्रशासन का धर्म-कर्म  बन चुका है। सरकार-नेता बड़ी बड़ी बातें कर जाती हैं लेकिन असहायों की मौतें होने पर अनजानापन दर्शाते हुए मासूम बन जाते हैं। अचरज तो जब होता है की ऐसी घटनाएं सर्वेसर्वाओं की नाक के नीचे हो जाती है और इनको छींक तलक नहीं आती। सत्तारूढ़ दल के प्रदेश अध्यक्ष का निर्वाचन इलाके में ये मौतें शर्मिंदा होने वाले नेता को तलाशती है लेकिन कोई नजर नहीं आता तत्काल। मामला तूल पकड़ने लगता है तो सब आरोप-प्रत्यारोप के राशन पानी की एक दूजे पर बौछार करते नजर आ जाएंगे पर ऐसी विदारक घटना के लिए तत्काल इंतजाम नहीं किये जायेंगे, सिवा जांच के आदेश देने के। रोना तो तब आता है जब कोई नेता जन प्रतिनिधि किसी समारोह ...

समस्या समस्या ना होकर जैसे कोई सुगंधित पुष्प होती है ,जिसे अंत नहीं बढ़ावा सरकारें देती लगती हैं।

समस्या समस्या ना होकर जैसे कोई सुगंधित पुष्प होती है ,जिसे अंत नहीं बढ़ावा सरकारें देती लगती हैं। पहले क्या हुआ क्या नहीं ये जान नहीं सकते ,लेकिन जब से किसी के आंख,कान नाक सुचारु हुए तब से उसके सम्मुख जो भी समस्या आई वो अभी तलक मुक्ति का मार्ग ही पूरा तय नहीं कर पा रही। कश्मीर हमारा सर है फिर भी बार बार उसके माथे से लहू की धारें फूटती हैं। वर्षों से काश्मीर एक मुद्दा सा बन गया लगता है ,वहां जो होता उसका हल्ला तो जानने,ना जानने वाले सारे देश में खूब मचाते हैं। कश्मीर जैसे ही हालात कई बार देश के अन्य राज्यों में भी खूब होते रहते हैं,पर हम तो ना जाने किस सोच से चलते सोचते हैं वो अनदेखा ही किये जाते हैं। काश्मीरी लोगों को क्या चाहिए,क्या नहीं नहीं जैसी बातें कभी हमारे सामने आ नहीं पाती और उससे पहले ही वहां के अलगाव,हुड़दंग की कहानियाँ जोरों से छा जाती हैं। कश्मीर की समस्या जैसे बरसों पुरानी होते हुए लोगों का लहू पीने में लगी है,वैसा ही कुछ देश के कुछ राज्यों में नक्सल वादी करने में लगे हैं। समस्या देश के कानून से खिलवाड़ की है पर कश्मीरी कुछ करता है तो अधिकतर लट्ठ लेकर जैसे...

लिंग भेद का कहर पालतू पशुओं सहित इंसानी बस्ती में मातम मचाये पर हम रहें मौन

लिंग भेद का कहर पालतू पशुओं सहित इंसानी बस्ती में अनदेखे मातम की इमारत बनाने पर अड़ा हे पर हम मौन हे? गो वंश बचाने का दावा करने वाले बहुत हे तो हकीकत में काम करने वाले भी हे पर उनकी दिशा धुंधलाई सी लगती हे / गाय दूध देती हे तब तलक बहुत प्यारी लगती हे ; जेसे ही दूध देना बंद किया आँखों में खटकने लगती हे ? बछडी हो जाये तो मालिक खुश बछड़ा होते ही दुःख / बछड़ो का उपयोग हमारे बड़े बुजुर्ग अच्छे से करना जानते थे पर वर्तमान में बछड़े का उ पयोग केवल चमड़े तलक रह गया लगता हे ? पर्यावरण सरक्षंण में बछड़ो की भूमिका काया पलट जेसी हे पर मेरे देश के पर्यावरणविद्ध और गोवंश बचाने की मुहिम से जुड़े लोग ध्यान नही देते / इको फ्रेंडली वातावरण तेयार करने के लिए नई नेइ स्कीम लाते हे फिर भी सफल नही हो पाते / अगर एक प्रयास बछड़ो को यातायात साधन बनाने में किया जाये तो क्या बुरा हे / रिक्शा ऑटो रिक्शा का चलन हे तो बछडा गाड़ी चला के हो सकती हे पर्यावरण सरक्षंण की कोशिश/ इस तरह के छोटे छोटे उपायों से स्वदेशी ; आत्म निर्भरता ; गोवंश बचाने; खाद उत्पादन; पर्यावरण सरक्षंण जेसे अभियानों को मदद मिलेगी बाकी मर्जी हल्ला मचाने वाल...

निंदा दर निंदा करने की लाइलाज बीमारी ने सारा डर मिटा दिया

निंदा दर निंदा करने की लाइलाज बीमारी ने सारा डर मिटा दिया ? अब तो एक पल निंदा की दूजे पल ही घर में आई खुशियों में सारी दिक्क्तें दूर हुई।  असर जिस पर हो उसकी निंदा करते तो अच्छे लगते हैं,लेकिन बेशर्मी की हदें पार कंरने वालों की निंदा करके वक्त जाया करने से क्या हासिल होगा,ये हम समझना नहीं चाहते ? हर समस्या का दोष विरोधी पर लादने की विकृत मानसिकता पाले खुद ने क्या किया ये भी भूलने लगते हैं। घर में खुद के आग लगे तो हम तमाम साधन झट से जुटा कर राहत पाते दिखते हैं ,लेकिन किसी और क ा घर जले तो अनजान बनकर अंत में अफ़सोस ही जाहिर करने के लतियल हो चले हैं। कर्तव्य निभाते हुए शहादत देने वालों की संख्या में इजाफा होने लगा है,फिर भी हमारा नाकारापन दोषियों पर अंकुश लगा नहीं पाता। शहीद तो गौरांवित करते जा रहे हैं,पर सिस्टम शर्मिंदगी उठाते हुए कोई सुधार नहीं कर पाता है ? छोटी छोटी बातों पर किसी ना किसी का सर कलम करवाने के घोषणकर्ता भी शहीदों की शहादत पर कुछ नहीं करते। सीमा पार की दहशत और आतंक से भी हम ढंग से निपट नहीं पाएं और घर में हमारे जवानों के खून सरे आम होने लगे हैं ? अभी तो शहीदों के घरों ...

बरसों पहले बनाये गये सविंधान की कुछ बातें वर्तमान में अनावश्यक

बरसों पहले आम नागरिको के हितो के लिए बनाये गये सविंधान की कुछ बातें वर्तमान में अनावश्यक सी होती जा रही हे /  मसलन किसी पद या काम के लिए ली जाने वाली सत्य-निष्ठा की शपथ की पालना व निभाने में बड़ी मुश्किलाते होने लगी हे / मन मारकर इंसान सत्य निष्ठा की बाते करता हे मोका आते ही सेवा भाव के फेर में जल्द से भूल भी जाता हे / अगर अतिशीघ्र इसे कानूनन तरीके से लुप्त कर दिया जाए तो सिस्टम से जुड़े जिम्मेदारी लेके बेठे लोगों को बड़ी राहत मिलेगी / ऐसा करते वक्त जनता की ना सोचना क्योंकि जनहित के जितने भी दावे इरादे बनाये गये हे वो पनपने से पहले ही मुरझाते देखे जा सकते हे / विद्यालयों में या किसी काम के कागजों में वर्णित सच्चाई इमानदारी के हलफनामा से भी समय खराब व दिमाग की नसों पर असर पड़ता हे क्योंकि कोई भी काम बेईमानी की मिलावट के बिना होना देश में बड़ा मुश्किलों से भरा हे /  बच्चा जन्मे या कोई मरे , विद्यालय में प्रवेश, नोकरी की मारामारी,शादी; तलाक,बिजली-पानी की जरूरत,बैंक, सरकारी-निजी कार्यालयों व जीवन यापन से सम्बन्धित कामों में नित रोज झूठ मक्कारी को सच बनाकर काम निकाला जाता हे / अब इससे ...

भूकम्प के झटके और किसान की मौत कुम्भ के मेले में बिछड़े भाइयो जेसे

आज के हालातों में भूकम्प के झटके और किसान की मौत कुम्भ के मेले में बिछड़े भाइयो जेसे लगते हे  दोनों को ही हल्के में लिया जाता हे फिर कोई हल्ला नुक्सान होता हे तो डेमेज कंट्रोल का किसी ने किसी को जिम्मा दिया जाता हे / दोनों ही बाते होने पर किसी की मौत पर शहनाई बजाने-बजवाने जेसा मक्कारी फेरब किया जाता हे / भूकम्प के झटकों की एसी तस्वीर पेश की जाती हे जेसे थाली में रखा भोजन बिना कुछ किये सीधे मुह में पहुच जाये / घर खर्च  चलाने के झटको के मुकाबले भूकम्प के झटके तो कुछ नही फिर भी खबरनवीस इतना हल्ला मचाते हे की अब तो मानो प्रलय से कोई नही बचेगा/ दहशत इतनी की डरने के बजाये लोग फ़ोन ले के अपने मिलने वालों को अपनी तस्वीर टीवी पर आने का संदेशा हंसते हंसते सुनाते हे / बिल्डिंगो से जान बचाकर दीवारों के सहारे ऐसे खड़े होते हे की बिल्डिंग भले ही गिर जाए पर दीवार हिलेगी तक नही / सुबह आये भूकम्प की दहशत शाम तलक बरकरार रखते हे / इस दोरान भूकम्प के झटकों से केसे बचा जाए ये कोई नही बताता उल्टा डराता रहता हे / जान बचाने वाले को कहा रुकने की फुर्सत रहती हे उसे तो हकीकत में केवल भागने की लगी रहती पर ...